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महिलाओं में स्तन कैंसर की जांच के लिए नमो शक्ति रथ को दिखाई झंडी, "नो सी, नो टच" तकनीक से स्क्रीनिंग

महिलाओं में स्तन कैंसर की जांच के लिए नमो शक्ति रथ को दिखाई झंडी, "नो सी, नो टच" तकनीक से स्क्रीनिंग
Jan 14, 2026, 07:55 AM
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Posted By Gaandiv

वाराणसी : प्रधानमंत्री के “स्वस्थ नारी–सशक्त परिवार” अभियान से प्रेरित नमो शक्ति रथ पहल के अंतर्गत वाराणसी में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक महत्त्वपूर्ण और दूरदर्शी कदम उठाया गया है. इस पहल का उद्देश्य महिलाओं में स्तन कैंसर की जल्दी पहचान, निवारक देखभाल और मुफ़्त घर-घर "नो सी, नो टच" स्क्रीनिंग के माध्यम से समय रहते उपचार सुनिश्चित करना है. इसी पप्रिेक्ष्‍य में बुधवार की सुबह जिले में कुल 20 वैन को मंडलायुक्त एस.राजलिंगम व राज्यसभा सदस्‍य कार्तिकेय शर्मा ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया. बताया कि महिलाओं में बढ़ रहे स्तन कैंसर पर रोकथाम लग सके इसलिए अभियान चलाया जा रहा है. यह सभी वैन AI तकनीक से सुसज्जित है और हर आवश्यक संसाधन मौजूद हैं.


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कार्तिकेय शर्मा ने कहा, महिलाएं डरे नहीं आगे बढ़े जांच करवाए जिससे समय रहते समस्या का निदान हो सके. वहीं मंडलायुक्त एस.राजलिंगम ने कहा,महिलाओ में 20 से 25 प्रतिशत ब्रेस्ट कैंसर सामने निकल कर आ रहा है जिसे रोकना मोदी सरकार का उद्देश्य भी है और इसी परिप्रेक्ष्य में यह अभियान शुरु किया गया है..इस नमो शक्ति रथ का संचालन मण्डलायुक्त एस. राजलिंगम एवं जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार के दिशा निर्देशन में आईटीवी फाउंडेशन के सहयोग से किया जा रहा है, जो नीति, तकनीक और ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच सशक्त तालमेल का उदाहरण है.


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इस पहल में डव्लूएचओ द्वारा अनुशंसित कैंसर रोकथाम की सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं को स्थानीय स्तर पर व्यवहार में लाया जा रहा है. महिलाओं में स्तन कैंसर एक गंभीर स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन चुका है; स्तन कैंसर भारतीय महिलाओं में सबसे आम कैंसर है, जिसमें प्रतिवर्ष लाखों नए मामले सामने आते हैं और लगभग 60 प्रतिशत मामलों का पता देर से तीसरे या चौथे स्टेज में चलता है, जिसे समय पर स्क्रीनिंग से काफी हद तक रोका जा सकता है. मोबाइल वैन नमो शक्ति रथ के माध्यम से डोर स्टेप स्क्रीनिंग मॉडल के माध्यम से उन महिलाओं तक पहुंच बनाई जायेगी, जो अब तक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रही हैं.


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ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में दूरी, लागत, समय और सामाजिक झिझक जैसी बाधाओं को देखते हुए मोबाइल स्क्रीनिंग वैन को सबसे प्रभावी माध्यम माना गया है. यह मॉडल महिलाओं को समानता, गरिमा और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करेगी. नमो शक्ति रथ पहल में स्तन कैंसर स्क्रीनिंग के लिए एआई-पावर्ड थर्मल इमेजिंग तकनीक (थर्मलाइटिक्स) का उपयोग किया जायेगा, जो नॉन-इनवेसिव, रेडिएशन-फ्री और बिना संपर्क की जांच पद्धति है.


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इस पहल को सर्वप्रथम वाराणसी के 290 ग्राम पंचायतें, नगर निगम के 92 वार्डों एवं गंगापुर के 12 वार्डों में प्रारंभ किया जा रहा है. इसके तहत लगभग 7.50 लाख महिलाएं 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग की हैं, जिन तक पहुंच बनाकर स्तन कैंसर की स्क्रीनिंग किया जाना है. इस कार्यक्रम के लिए 20 नमो शक्ति वैन का संचालन किया जाएगा.

इस कार्यक्रम में आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचओ) और पंचायत कर्मियों के सहयोग से समुदाय में जागरूकता एवं महिलाओं को निर्धारित स्थलों पर स्क्रीनिंग कराने जैसे अन्य महत्वपूर्ण कार्य किये जाएंगे. इस कार्यक्रम को जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के समन्वय से संचालित किया जा रहा है. वैन शेड्यूलिंग, रूटिंग और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है.

169 साल पहले 282 सैनिकों के साथ हुई बर्बरता को 12 साल पहले जान सकी दुनिया...
169 साल पहले 282 सैनिकों के साथ हुई बर्बरता को 12 साल पहले जान सकी दुनिया...
वाराणसी: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों की बर्बरता का शिकार बने 282 भारतीय सैनिकों का अंतिम संस्कार अब काशी में किया जाएगा. उनकी अस्थियों को मोक्ष दिलाने के उद्देश्य से उनके संभावित वंशज भी इस ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे. 169 वर्ष पहले हुई इस घटना की जानकारी दुनिया को करीब 12 वर्ष पहले मिली, जबकि वैज्ञानिक शोध और डीएनए परीक्षण के जरिए इन शहीदों की पहचान संभव हो सकी.पंजाब के अमृतसर जिले के अजनाला में वर्ष 2014 में एक कुएं से 282 मानव कंकाल मिले थे. शुरुआत में माना गया कि ये 1947 के विभाजन के दौरान मारे गए लोगों के अवशेष हैं. लेकिन काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट, सीसीएमबी हैदराबाद समेत देश-विदेश के वैज्ञानिकों की टीम ने डीएनए और आइसोटोप अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला कि ये 1857 में शहीद हुए बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सैनिक थे, जिनकी जड़ें गंगा घाटी यानी उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से जुड़ी थीं.एक किताब से खुला इतिहास का राज.पंजाब के इतिहासकार एवं शोधकर्ता सुरिंदर कोचर को अंग्रेज अधिकारी फ्रेडरिक हेनरी कूपर की पुस्तक "क्राइसिस इन पंजाब: फ्रॉम 10 मई अनटिल फॉल ऑफ दिल्ली" मिली. इसमें लिखा था कि मियां मीर में तैनात बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की 26वीं रेजीमेंट के सैनिकों ने 1857 में विद्रोह कर दिया था. अंग्रेजों ने 218 सैनिकों को रावी नदी के किनारे गोली मार दी, जबकि 282 सैनिकों को अजनाला लाकर 237 को गोली मारने के बाद 45 सैनिकों को जिंदा कुएं में फेंक दिया और मिट्टी-चूने से कुएं को बंद कर दिया. बाद में उस स्थान पर गुरुद्वारा बना दिया गया. वर्ष 2014 में उसी कुएं की खुदाई के दौरान ये कंकाल मिले.डीएनए जांच से मिली पहचानपंजाब विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के डॉ. जे.एस. सहरावत के नेतृत्व में बीएचयू, बीरबल साहनी संस्थान और सीसीएमबी के वैज्ञानिकों ने डीएनए और आइसोटोप अध्ययन किया. दोनों अध्ययनों ने पुष्टि की कि ये सैनिक पंजाब के नहीं बल्कि गंगा घाटी क्षेत्र के निवासी थे. इस घटना को दुनिया की सबसे जघन्य ऐतिहासिक घटनाओं में भी गिना जाता है.दक्षिण भारत से आए संभावित वंशजडीएनए सैंपल देने वाराणसी पहुंचे कृतेश तिवारी, जो वर्तमान में दक्षिण भारत के संथूर कस्बे में रहते हैं, बताते हैं कि उनके पूर्वजों का मानना रहा है कि उनका परिवार अजनाला में शहीद हुए सैनिकों का वंशज है. इसी दावे की पुष्टि के लिए उन्होंने qअपना डीएनए सैंपल दिया है. उनका कहना है कि यदि वैज्ञानिक जांच में यह साबित होता है कि उनका परिवार उन्हीं सैनिकों का वंशज है, तो यह उनके लिए गर्व और भावनात्मक संतोष का विषय होगा.2022 से जारी है शोधडॉ. ज्ञानेश्वर चौबे बताते हैं कि वर्ष 2022 से उनकी टीम अजनाला के 282 शहीद सैनिकों पर शोध कर रही है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 में कुएं से मिले कंकालों के अध्ययन से पता चला कि इनमें बड़ी संख्या में गंगा घाटी के लोग थे, जिनमें कई कान्यकुब्ज ब्राह्मण भी शामिल थे। समय के साथ इनके कई परिवार दक्षिण भारत के संथूर क्षेत्र में जाकर बस गए.ALSO READ: रथयात्रा मेला प्लास्टिक मुक्त घोषित, पॉलीथिन इस्तेमाल करने वालों पर नगर निगम की कार्रवाईडॉ. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि जब इस शोध को प्रकाशित किया गया तो कनाडा से समीर पांडेय नामक व्यक्ति का फोन आया। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में लगभग सात पीढ़ी पहले एक सदस्य लापता हो गए थे, जो 1857 में उसी बटालियन में कार्यरत थे और संभवतः अजनाला नरसंहार के शिकार हुए. इसके बाद संभावित वंशजों की तलाश शुरू की गई.उन्होंने कहा कि डीएनए परीक्षण के जरिए वंशजों की पहचान सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है. शोध पूरा होने के बाद अजनाला से मिले सभी शहीद सैनिकों की अस्थियों का काशी में पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा, ताकि 169 साल बाद उन्हें सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई मिल सके.
रथयात्रा मेला प्लास्टिक मुक्त घोषित, पॉलीथिन इस्तेमाल करने वालों पर नगर निगम की कार्रवाई
रथयात्रा मेला प्लास्टिक मुक्त घोषित, पॉलीथिन इस्तेमाल करने वालों पर नगर निगम की कार्रवाई
वाराणसी: ऐतिहासिक तीन दिवसीय रथयात्रा मेले को नगर निगम ने प्लास्टिक (पॉलीथिन) मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया है। मेले में स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए नगर निगम ने व्यापक तैयारियां की हैं। साथ ही प्रतिबंधित पॉलीथिन का उपयोग करने वाले दुकानदारों के खिलाफ अभियान चलाकर चालान और जुर्माने की कार्रवाई भी की जा रही है।नगर निगम के अनुसार पूरे मेला क्षेत्र में 24 घंटे तीन शिफ्टों में विशेष सफाई व्यवस्था लागू की गई है, ताकि श्रद्धालुओं को स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण मिल सके। निगम की टीमें स्थायी और अस्थायी दुकानदारों से संपर्क कर उन्हें दुकान के सामने डस्टबिन रखना, प्रतिबंधित प्लास्टिक का उपयोग न करना और ग्राहकों को केवल कपड़े के थैले उपलब्ध कराने के निर्देश दे रही हैं।नगर निगम ने स्पष्ट किया है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले दुकानदारों के खिलाफ मौके पर चालान कर जुर्माना वसूला जा रहा है। वहीं, जोनल स्वास्थ्य अधिकारी के नेतृत्व में आईसी एक्टिविटी टीम लाउडस्पीकर के जरिए दुकानदारों और श्रद्धालुओं को सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने के लिए जागरूक कर रही है।ALSO READ: वाराणसी की 30 महिलाएं बनी 'सोलर दीदी', नियुक्ति पत्र पाकर खिले चेहरेइसके अलावा मेला क्षेत्र में "स्वच्छ काशी, सुंदर काशी" और "थैला अपना साथ लाएं, प्लास्टिक को दूर भगाएं" जैसे संदेशों वाले पोस्टर भी लगाए गए हैं। नगर निगम ने सभी श्रद्धालुओं और व्यापारियों से प्लास्टिक मुक्त रथयात्रा मेला बनाने में सहयोग की अपील की है।
वाराणसी की 30 महिलाएं बनी 'सोलर दीदी', नियुक्ति पत्र पाकर खिले चेहरे
वाराणसी की 30 महिलाएं बनी 'सोलर दीदी', नियुक्ति पत्र पाकर खिले चेहरे
वाराणसी : भारत सरकार की प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना के अंतर्गत संचालित 'सोलर दीदी' अभियान के तहत वाराणसी में 30 महिलाओं को रोजगार प्रदान किया गया. आर्क सूर्य शक्ति प्राइवेट लिमिटेड की ओर से आयोजित चयन एवं नियुक्ति कार्यक्रम में चयनित महिलाओं को नियुक्ति पत्र सौंपे गए. साथ ही उन्हें सौर ऊर्जा से संबंधित तकनीकी प्रशिक्षण, कार्य प्रणाली और जनजागरूकता अभियान से जुड़ी जिम्मेदारियों की जानकारी दी गई.कार्यक्रम में आर्क सूर्य शक्ति प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक (सीएमडी) अभिषेक सिंह 'चंचल' ने कहा कि प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. उन्होंने उत्तर प्रदेश नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विकास अभिकरण (यूपीनेडा) की भूमिका की भी सराहना करते हुए कहा कि इस योजना के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के साथ रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि महिला सशक्तीकरण किसी भी विकसित राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत है. 'सोलर दीदी' अभियान महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उन्हें स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका भी प्रदान कर रहा है. चयनित महिलाएं अब लोगों को योजना की जानकारी देंगी और सोलर संयंत्र लगाने के लिए प्रेरित करेंगी.अभिषेक सिंह ने बताया कि आर्क परिवार फाउंडेशन समाज सेवा के अपने संकल्प के तहत सौर ऊर्जा के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने का कार्य लगातार कर रहा है. संस्था ऐसे परिवारों तक पहुंच रही है, जो जानकारी के अभाव या आर्थिक कारणों से सोलर संयंत्र नहीं लगवा पा रहे हैं. फाउंडेशन उन्हें प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना, सरकारी सब्सिडी, बैंक ऋण और आवेदन प्रक्रिया की पूरी जानकारी देने के साथ आवश्यक मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराता है. जरूरतमंद परिवारों को संस्था अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग भी प्रदान करती है.ALSO READ: कैंट स्टेशन के बाहर महिलाओं से अश्लील हरकत, एंटी रोमियो टीम ने दो युवकों को किया गिरफ्तारउन्होंने कहा कि फाउंडेशन कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के माध्यम से उद्योग जगत को भी स्वच्छ ऊर्जा अभियान से जोड़ने का प्रयास कर रहा है. उनका मानना है कि सरकार, उद्योग, सामाजिक संस्थाओं और आम नागरिकों के संयुक्त प्रयास से ही भारत ऊर्जा आत्मनिर्भर और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार राष्ट्र बन सकता है. उन्होंने कहा कि सौर ऊर्जा अपनाना केवल बिजली बिल कम करने का माध्यम नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी भी है.