वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार विजय सिंह जूनियर नहीं रहे, गुरुग्राम के मेदांता हास्पिटल में ली आखिरी सांस

वाराणसी - बनारस के वरिष्ठ पत्रकार विजय सिंह जूनियर नहीं रहे. सोमवार की सुबह गुरुग्राम के मेदांता हास्पिटल में उन्होंने आखिरी सांस ली. एक सप्ताह पहले ब्रेन हैमरेज के कारण उन्हें वहां भर्ती कराया गया था. उनके निधन की खबर मिलते ही पूर्वांचल के पत्रकारों में शोक की लहर दौड़ गई. वह अपने पीछे पत्नी, एक पुत्र और तीन पुत्रियों को छोड़ गए. पत्रकारिता जगत में उनके कुछ तकिया कला को लेकर उन्हें हमेश याद रखा जाएगा. पत्रकारों के बीच विजय सिंह जूनियर एक हंसते-हंसाते हुए शख्स थे. वह ऐसे पल भी शब्दों की फुलझड़ी छोड़ सकते थे. जब इसकी जरूरत न हो, अपेक्षा नहीं हो या तब भी जब ऐसा करना आपत्तिजनक तक लग जाए! रोक-टोंक, निषेध, आपत्ति आदि कुछ भी यदि सामने आ जाए तो इसे चुटकी में उड़ाते हुए वह फिर हंस देते. '' छोड़िए यह सब... खुश रहिए और सबको खुश रखिए... आइए, एक-एक कप चाय लड़ा ली जाए! .'' का बाऊजी , का पुराने, का बुढऊ, जल्दी कर, हमरे पास टाइम नहीं हव... किसी को बोलने वाले विजय जल्द ही साथ छोड़ गए.

गांडीव, काशी वार्ता, दैनिक जागरण में अपनी सेवाएं देने वाले विजय किसी परिचय के मोहताज नहीं थे. क्राइम रिपोर्टिंग में उनके पैनी नजर हमेशा से रही. ऐसा प्यारा इंसान इस तरह अचानक रुखसत हो लेगा, सोचना संभव नहीं था, लेकिन जहां असंभव भी सहज संभव हो, वही तो यह दुनिया है.
पत्रकारिता से नाम में जुड़ा था जूनियर शब्द
विजय सिंह के नाम में जूनियर शब्द जोडे जाने का भी एक इतिहास है. दरअसल, विजय एक फोटोग्राफर के तौर पर पत्रकारिता में प्रवेश किया था. उस समय एक वरिष्ठ फोटोग्राफर विजय सिंह भी मशहूर थे. एक समय दोनों फोटोग्राफर थे इसलिए यह चिन्हीकरण करना पड़ा. बाद में जूनियर रिपोर्टर में प्रमोट हो गए लेकिन लोगों की जुबान ने नाम से यह शब्द नहीं हटने दिया.
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