सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया के बीच सिर्फ व्यापार नहीं, डीएनए का भी नाता था: प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे

वाराणसी। राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय (एनएफएसयू) के वाराणसी परिसर में शुक्रवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने प्राचीन डीएनए विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के बीच संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं था, बल्कि दोनों क्षेत्रों की प्राचीन आबादी के बीच आनुवंशिक संबंध भी रहे हैं। प्राचीन डीएनए के अध्ययन से इन सभ्यताओं के बीच लोगों की आवाजाही और संपर्क के नए प्रमाण सामने आए हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता एनएफएसयू वाराणसी परिसर के प्रभारी निदेशक प्रो. सतीश कुमार ने की। उन्होंने कहा कि एनएफएसयू बनारस अपने विद्यार्थियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयासरत है। आधुनिक प्रयोगशालाओं, शोध और वैश्विक स्तर के शिक्षण के माध्यम से फॉरेंसिक विज्ञान की नई पीढ़ी तैयार करने पर संस्थान का विशेष जोर है।
डीएनए ने खोले प्राचीन संपर्क के राज
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि पुरातात्विक साक्ष्य लंबे समय से सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया के बीच संपर्क की पुष्टि करते रहे हैं। मेसोपोटामिया के प्राचीन ग्रंथों में मेलुह्हा का उल्लेख, वहां मिली सिंधु सभ्यता की मुहरें और मनके दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापारिक संबंधों का प्रमाण देते हैं। अब प्राचीन डीएनए के अध्ययन से यह संकेत भी मिला है कि व्यापारिक मार्गों के जरिए केवल वस्तुओं का ही आदान-प्रदान नहीं हुआ, बल्कि लोगों की आवाजाही भी हुई।
उन्होंने बताया कि पोलैंड के वैज्ञानिकों के साथ किए गए शोध में सीरिया की मध्य यूफ्रेट्स घाटी स्थित टेल अशारा (प्राचीन तेरका) और टेल मसाइख (प्राचीन कार-अस्सुरनासिरपाल) से मिले चार व्यक्तियों के दांतों के डीएनए का विश्लेषण किया गया। ये मानव अवशेष लगभग 2650 ईसा पूर्व से 700 ईस्वी तक के कालखंड से संबंधित हैं।
अध्ययन में दक्षिण एशियाई मूल के माइटोकॉन्ड्रियल हैपलोग्रुप एम4बी1, एम49 और एम61 पाए गए। प्रो. चौबे के अनुसार, ये वंश भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन समय से मौजूद रहे हैं। वर्तमान सीरिया में इनकी मौजूदगी बेहद कम है, जबकि भारत, पाकिस्तान और हिमालयी क्षेत्र में इनके प्रमाण मिलते हैं।
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व्यापार मार्गों से पहुंचे होंगे लोग
प्रो. चौबे ने संभावना जताई कि ये लोग व्यापार मार्गों के जरिए पश्चिम एशिया पहुंचे व्यापारी परिवारों के सदस्य हो सकते हैं या फिर इससे भी पुराने प्रवास का हिस्सा रहे हों। उन्होंने कहा कि राखीगढ़ी से मिले प्राचीन जीनोम और इंडस पेरिफेरी से जुड़े बाद के अध्ययनों ने भी पश्चिमी एशिया के साथ आनुवंशिक संबंधों की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं।
उन्होंने कहा कि डीएनए इतिहास का ऐसा प्रमाण है, जिसे समय के साथ आसानी से मिटाया नहीं जा सकता। पुरातत्व से व्यापारिक संबंधों के प्रमाण पहले से मौजूद थे, लेकिन प्राचीन डीएनए ने इन क्षेत्रों के बीच मानव संपर्क और आनुवंशिक संबंधों को समझने का नया रास्ता दिया है।
व्याख्यान के दौरान छात्रों और शिक्षकों ने प्राचीन डीएनए की तकनीक, उसके विश्लेषण और फॉरेंसिक विज्ञान में इसकी उपयोगिता को लेकर सवाल किए। प्रो. चौबे ने कहा कि फॉरेंसिक विज्ञान अब केवल अपराध जांच तक सीमित नहीं है। डीएनए जैसी तकनीकों की मदद से प्राचीन सभ्यताओं के बीच संबंध, मानव प्रवास और पहचान से जुड़े सवालों के जवाब भी तलाशे जा रहे हैं।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. सतीश कुमार ने अतिथि वक्ता का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे व्याख्यान विद्यार्थियों को प्रयोगशाला और पाठ्यक्रम से आगे जाकर शोध की व्यापक संभावनाओं को समझने का अवसर देते हैं। एनएफएसयू वाराणसी परिसर फिलहाल जाल्हूपुर में संचालित हो रहा है, जबकि स्थायी परिसर राजातालाब क्षेत्र के शहंशाहपुर में प्रस्तावित है।



