एसएस हास्पिटल को अरसे बाद मिला नियमित चिकित्सा अधीक्षक

वाराणसीः बीएचयू के कार्यकारी परिषद की मंजूरी के बाद जनरल सर्जरी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. पुनीत को सर सुंदरलाल चिकित्सालय का नियमित चिकित्सा अधीक्षक नियुक्त किया गया है. अस्पताल के स्थापना (1926) से लेकर अब तक 30 से अधिक वरिष्ठ प्रोफेसर इस गरिमामयी पद पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं.
प्रो. पुनीत ने अपनी ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई बीएचयू आईएमएस से किया है. दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल के रजिस्ट्रार रहे. कई हास्पिटल में काम करने के बाद किंग जार्ज मेडिकल कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त हुए. फिर बीएचयू से एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर जुड़े फिर सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष बने. इन्हें रायल कालेज आफ फीजिशनय एंड सर्जरी ग्लासगो से पुरस्कार भी प्रदान किया गया है. इस पद के 14 वरिष्ठ डाक्टरों को शार्टलिस्ट किया गया था. इस नियुक्ति की योग्यताओं (7 वर्ष के प्रशासनिक अनुभव की अनिवार्यता) को लेकर छात्र गुटों के विरोध और इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) के कारण यह पद हाल ही में भारी विवादों में रहा है. एमएस का मुख्य दायित्व सर सुंदरलाल अस्पताल की संपूर्ण चिकित्सा व्यवस्था, ओपीडी (OPD) संचालन, क्रय सेल और मरीजों के लिए प्रशासनिक नीतियों का प्रबंधन करना है.
• बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के सर सुंदरलाल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक पद का एक लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। इस पद पर संस्थान के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी प्रोफेसरों की नियुक्ति होती रही है.

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लेकिन ज्यादातर की नियुक्ति नियिमत नहीं रही.
प्रो. पुनीत से ठीक पहले प्रो. केके गुप्ता ने चिकित्सा अधीक्षक के रूप में एक लंबा कार्यकाल संभाला. इनके समय में अस्पताल के विस्तार और ओपीडी के आधुनिकीकरण के कई कार्य हुए. प्रो. एसके माथुर भी एमएस का पद संभाल चुके हैं. चिकित्सा विज्ञान संस्थान (IMS) के वरिष्ठ सर्जन, जिन्होंने अस्पताल के प्रशासनिक सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
• कार्डियोलाजी/मेडिसिन से जुड़े वरिष्ठ चिकित्सक प्रो. ओपी उपाध्याय कई वर्षों तक अस्पताल के एमएस रहे। इनके कार्यकाल में सुपर स्पेशियलिटी ब्लाक से जुड़ी योजनाएं आगे बढ़ीं. प्रो. वीके शुक्ला न केवल अस्पताल के एमएस रहे, बल्कि बाद में आईएमएस के निदेशक और बीएचयू के रेक्टर के पद तक भी पहुंचे. प्रो. एके खन्ना जनरल सर्जरी विभाग के विख्यात सर्जन रहे. इन्होंने सर सुंदरलाल अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया. आईएमएस के माइक्रोबायोलाजी विभाग के प्रोफेसर प्रो. टीएम महापात्रा भी एमएस रहे हैं. एमएस रहे प्रो. गजेंद्र सिंह न्यूरोसर्जरी विभाग के बेहद सम्मानित चिकित्सक रहे जिन्होंने अस्पताल की इमरजेंसी और न्यूरो सुविधाओं के संचालन में बड़ा योगदान दिया.
एमएस पद को लेकर रहा विवाद
सरसुंदर लाल चिकित्सालय में एमएस पद पर भी विवाद रहा.
इस विवाद में मुख्य रूप से चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता, वित्तीय घोटालों के आरोप और प्रशासनिक खींचतान शामिल है.
जुलाई के पहले व दूसरे सप्ताह में इस पद के लिए इंटरव्यू प्रक्रिया के दौरान छात्रों ने कुलपति आवास और होल्कर भवन का घेराव किया था. नियमों के मुताबिक, एमएस पद के उम्मीदवार के पास 300 या अधिक बेड वाले अस्पताल के वरिष्ठ पद पर न्यूनतम सात साल का व्यावहारिक प्रशासनिक अनुभव होना अनिवार्य है. प्रदशर्न करने वाले छात्रों ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने नियमों को दरकिनार करते हुए सामान्य विभागाध्यक्ष या नोडल अधिकारी के कार्य को ही प्रशासनिक अनुभव मान लिया और कई ऐसे चेहरों को शार्टलिस्ट कर लिया जिन पर पहले से गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप थे. छात्रों का मुख्य विरोध ट्रामा सेंटर के पूर्व प्रभारी डा. सौरभ सिंह को उम्मीदवार बनाए जाने पर था, जिनके खिलाफ पहले से सीबीआई (CBI) और लोकायुक्त की कतिपय शिकायतें लंबित होने का दावा किया जा रहा था. नियुक्ति की घोषणा होने के बाद भी कई दिनों तक नए एमएस को आधिकारिक तौर पर कार्यभार (चार्ज) नहीं सौंपा जा रहा था. कुलपति कार्यालय का घेराव करने वाले छात्रों ने आरोप लगाया था कि पुराने अधिकारियों के वित्तीय अधिकार तत्काल सीज नहीं किए जा रहे हैं, जिससे अस्पताल के वित्तीय और प्रशासनिक रिकॉर्ड्स में हेरफेर की आशंका है.



