विवादों के घेरे में रहा बीएचयू ट्रामा सेंटर

वाराणसीः नई नियुक्ति से पहले बीएचयू ट्रामा सेंटर के प्रभारी प्रो. सौरभ सिंह रहे. उनके कार्यकाल के दौरान कई विवाद सामने आए. इनमें मेडिकल उपकरणों की खरीद में करोड़ों रुपये की कथित अनियमितताओं का मामला रहा. इसके साथ गलत पहचान के कारण मरीजों का गलत आपरेशन, इलाज में लापरवाही के साथ ही तथा प्रशासनिक मनमानी जैसे गंभीर मामले रहे हैं.
बीएचयू ट्रामा सेंटर में सबसे अधिक हो हल्ला मचा उपकरणों के खरीद के मामले में. ट्रामा सेंटर में मशीनों और मेडिकल उपकरणों की खरीद में करोड़ों रुपये के घोटाले, टेंडर नियमों के उल्लंघन और टैक्स चोरी के आरोप लगे है.
मुख्य रूप से ओएनजीसी (ONGC) के सीएसआर फंड से हुई 21.89 करोड़ की कुल खरीद और विशेष रूप से 3.64 करोड़ से एयरबोर्न बायोलाजिकल कंट्रोल डिवाइस (BCD) की खरीद पर उंगलियां उठी हैं.
मशीनों के दामों में भारी अंतर
आरोप रहा कि बीएचयू ने जो 'बायोलाजिकल कंट्रोल डिवाइस' (हवा साफ करने वाली प्रणाली) करीब 3.64 से 3.68 करोड़ प्रति यूनिट की दर से खरीदी है, वैसी ही समान श्रेणी की मशीन एम्स नई दिल्ली में 66 लाख और जम्मू-कश्मीर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट में मात्र 60 लाख में खरीदी गई थी. प्रतिस्पर्धा को पूरी तरह खत्म करने के लिए टेंडर प्रक्रिया में खेल का आरोप है. टेंडर मूल रूप से हवा साफ करने वाली डिवाइस का था, लेकिन अफसरों ने कथित रूप से इसमें एडल्ट वेंटिलेटर, पीडियाट्रिक वेंटिलेटर, पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड और इकोकार्डियोग्राफी जैसी बेहद महंगी और अलग-अलग मशीनों को एक साथ जबरन जोड़ दिया ताकि कोई दूसरी कंपनी मुकाबला न कर सके.
आरोप है कि एयर प्यूरीफायर पर सामान्यतः 18 प्रितिशत जीएसटी (GST) लगता है, लेकिन चालान में गलत कोड डालकर सिर्फ 5% टैक्स लगाया गया. साथ ही, दस करोड़ से ऊपर के टेंडर के लिए अनिवार्य 'स्वतंत्र बाहरी मानिटर' (IEM) की नियुक्ति भी नहीं की गई थी. इस मामले को लेकर केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), शिक्षा मंत्रालय और विजिलेंस टीम ने दस्तावेज़ों की जांच की है. वहीं दूसरी ओर, ट्रामा सेंटर के पूर्व प्रभारी डा. सौरभ सिंह से जुड़े जेम (GeM) पोर्टल खरीद के एक पुराने मामले में लोकपाल ने सीबीआई और कैग (CAG) की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें क्लीन चिट दे दी है.
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मरीजों के साथ इलाज में लापरवाही
• मरीजों के नाम में समानता के कारण गलत आपरेशन थिएटर में भेजने और बिना पहचान की पुष्टि के सर्जरी करने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं. एक मामले में महिला मरीज की मौत का मामला भी सामने आया था. बलिया की 71 वर्षीय बुजुर्ग महिला राधिका देवी न्यूरोसर्जरी विभाग के बेड नंबर 29 पर रीढ़ की हड्डी के ट्यूमर (Spinal Tumour) के इलाज के लिए भर्ती थीं. वहीं आर्थोपेडिक विभाग के बेड नंबर 17 पर 82 वर्षीय राधिका सिंह कूल्हा प्रत्यारोपण (Hip Replacement) के लिए भर्ती थीं. डाक्टरों ने नाम की समानता के कारण गलती से रीढ़ की हड्डी की मरीज राधिका देवी को आर्थोपेडिक आपरेशन थिएटर में भेज दिया और उनके कूल्हे का आपरेशन शुरू कर दिया. जब सर्जनों को अपनी गलती का अहसास हुआ, तो उन्होंने परिजनों को बिना बताए घाव को सिल दिया और मरीज को वार्ड में वापस भेज दिया. बाद में ट्यूमर का सही आपरेशन तो हुआ, लेकिन शरीर में इन्फेक्शन और मानसिक सदमे के कारण मरीज की मृत्यु हो गई. अस्पताल निदेशक डा. एमएन शंखवार ने इस घोर लापरवाही की जांच के लिए कमेटी गठित की. ट्रामा सेंटर के प्रभारी पर आर्थिक लाभ लेकर मरीजों को बेड आवंटित करने और प्रभावशाली लोगों के दबाव में काम करने के आरोप तक लगे हैं. इसके अलावा, सेंटर के भीतर डाक्टरों और कर्मचारियों के बीच दुर्व्यवहार की घटनाएं भी सामने आईं.
स्टाफ का डिमोशन का भी विवाद
हाल ही में, अस्पताल के प्रमोशन पाए 37 नर्सिंग अफसरों का डिमोशन कर दिया गया है, जिसे लेकर नर्सिंग स्टाफ और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच विवाद गहरा गया है. जुलाई 2026 में आईएमएस-बीएचयू स्थित सर सुंदरलाल अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर में 37 नर्सिंग अफसरों का अचानक डिमोशन कर दिया गया, जिससे स्टाफ में भारी आक्रोश है. जनवरी 2026 में विभागीय प्रोन्नति समिति (DPC) के माध्यम से 195 नर्सिंग अफसरों को 'सीनियर नर्सिंग अफसर' के पद पर प्रमोशन दिया गया था. लेकिन ठीक छह महीने बाद, विश्वविद्यालय प्रशासन ने आरक्षण नीति, 200 प्वाइंट रोस्टर और डीओपीटी (DoPT) के नियमों में विसंगति का हवाला देते हुए इनमें से 37 स्टाफ का बिना स्पष्ट कारण बताए डिमोशन कर दिया.
नर्सिंग एसोसिएशन ने इसे प्रशासन की मनमानी बताते हुए कुलपति और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को निष्पक्ष जांच के लिए ज्ञापन सौंपा है.



