तमिलनाडु की टोडा कढ़ाई कला का बनारस से होगा संरक्षण

वाराणसी: तमिलनाडु की पारंपरिक टोडा कढ़ाई की कला के संरक्षण और कारीगरों की आजीविका सुदृढ़ करने की दिशा में बीएचयू ने पहल किया है. कला संकाय के अंतर्गत संचालित एक शोध परियोजना के माध्यम से टोडा कढ़ाई कला से जुड़े कारीगरों के समक्ष आने वाली चुनौतियों का अध्ययन किया जा रहा है. परियोजना का उद्देश्य बाजार के विस्तार और नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से इस पारंपरिक कला को दीर्घकालिक रूप से संरक्षित एवं टिकाऊ बनाने का उपाय खोजना है. इसके साथ ही बेहतर विपणन नीती से इसे कला से जुड़े विशेष समुदाय के जीवन स्तर को उच्च कोटि का बनाना है.
परियोजना का शोध कार्य ।CSSR में भी प्रस्तुत
सस्टेनिंग टोडा एम्ब्रॉयडरीः कल्चरल हेरिटेज, मार्केट एक्सपैंशन एंड पॉलिसी इंटरवेंशंस" विषय पर आधारित यह परियोजना इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (ICSSR) स्पेशल कॉल फॉर प्रोजेक्ट विकसित भारत @ 2047 के अंतर्गत संचालित की जा रही है. परियोजना का समन्वयन आफिस मैनेजमैंट एंड कंपनी सेक्रेटरीशिप, कला संकाय के एसोसिएट प्रोफेसर डा. रत्न शंकर मिश्रा कर रहे हैं. सह-अन्वेषक शारीरिक शिक्षा विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. विनायक कुमार दुबे, हैं. दो वर्ष तक संचालित होने वाली इस परियोजना के लिए 16 लाख रुपये की राशि के साथ स्वीकृति प्रदान की गई है. परियोजना का शोध कार्य ।CSSR, नई दिल्ली में भी प्रस्तुत किया गया है.

‘पुखूर’ के नाम से जानी जाने वाली टोडा कढ़ाई
स्थानीय रूप से ‘पुखूर’ के नाम से जानी जाने वाली टोडा कढ़ाई तमिलनाडु की नीलगिरि की पहाड़ियों में निवास करने वाले टोडा समुदाय की पारंपरिक कला है. अपने विशिष्ट ज्यामितीय डिजाइनों और पारंपरिक सिलाई तकनीक के लिए पहचानी जाने वाली यह कढ़ाई टोडा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ी है और समुदाय के लिए आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन भी है.भौगोलिक संकेतक (GI) मान्यता प्राप्त होने के बावजूद टोडा कढ़ाई कला से जुड़े कारीगरों को कम आय, सीमित बाजार, कच्चे माल की बढ़ती लागत, नकली उत्पादों तथा युवा पीढ़ी की घटती भागीदारी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. शोध परियोजना के अंतर्गत टोडा कढ़ाई की वर्तमान स्थिति, समुदाय की आजीविका एवं सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में इसके योगदान, कारीगरों के सामने मौजूद प्रमुख जोखिमों तथा उनसे निपटने की उनकी रणनीतियों का अध्ययन किया जा रहा है.
अध्ययन दल ने जानी कारीगरों की परेशानी
अध्ययन के क्षेत्रीय सर्वेक्षण के दौरान नीलगिरि जिले में टोडा कढ़ाई के कारीगरों के साक्षात्कार लिए गए. इनके माध्यम से कारीगरों के अनुभवों, आजीविका की स्थिति, सामने आने वाली चुनौतियों तथा इस पारंपरिक कला के भविष्य को लेकर उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास किया गया. परियोजना के अंतर्गत मौजूदा विपणन माध्यमों का अध्ययन करते हुए बाजार के विस्तार तथा प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेपों की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है.
अध्ययन में मिश्रित शोध पद्धति अपनाई गई है तथा वर्णनात्मक विश्लेषण किया जा रहा है. इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय सर्वेक्षण के लिए उद्देश्यपरक नमूना पद्धति का उपयोग किया गया है, जिसके अंतर्गत 239 टोडा कारीगरों को अध्ययन के लिए चिह्नित किया गया है. प्राथमिक आंकड़े संरचित पारिवारिक सर्वेक्षण और कारीगरों के साक्षात्कार के माध्यम से एकत्र किए जा रहे हैं, जबकि द्वितीयक आंकड़े संस्थागत स्रोतों से प्राप्त किए जा रहे हैं.

बाजार विस्तार के लिए बन सकेगी स्थायी रणनीति
शोध के अंतर्गत नीलगिरि जिले के उधगमंडलम, कोटागिरी और कूनूर राजस्व प्रभागों को शामिल किया गया है. अध्ययन से टोडा कढ़ाई को एक सांस्कृतिक एवं आर्थिक गतिविधि के रूप में बेहतर ढंग से समझने, कारीगरों की आजीविका को प्रभावित करने वाली बाधाओं की पहचान करने तथा बाजार विस्तार के लिए स्थायी रणनीतियों और स्वदेशी हस्तशिल्प विरासत के संरक्षण हेतु नीतिगत सुझाव विकसित करने में सहायता मिलने की अपेक्षा है.
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यह परियोजना टोडा कढ़ाई के संरक्षण, कारीगरों की आजीविका को सुदृढ़ करने तथा इस पारंपरिक कला को एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में दीर्घकाल तक बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देने का प्रयास है. परियोजना के प्रधान अन्वेषक डा० रत्न शंकर मिश्रा का मानना है बेहतर विपणन नीति से ही टोडा समुदाय के लोगों को इस पारम्परिक कढाई की कला से बेहतर आय सृजित करने सम्बन्धी अवसर प्रदान किये जा सकते है.



