Daily Bulletin Tag
AI गार्गी दैनिक बुलेटिन

तमिलनाडु की टोडा कढ़ाई कला का बनारस से होगा संरक्षण

तमिलनाडु की टोडा कढ़ाई कला का बनारस से होगा संरक्षण
Aug 21, 2026, 12:35 PM
|
Posted By gagan arora

वाराणसी: तमिलनाडु की पारंपरिक टोडा कढ़ाई की कला के संरक्षण और कारीगरों की आजीविका सुदृढ़ करने की दिशा में बीएचयू ने पहल किया है. कला संकाय के अंतर्गत संचालित एक शोध परियोजना के माध्यम से टोडा कढ़ाई कला से जुड़े कारीगरों के समक्ष आने वाली चुनौतियों का अध्ययन किया जा रहा है. परियोजना का उद्देश्य बाजार के विस्तार और नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से इस पारंपरिक कला को दीर्घकालिक रूप से संरक्षित एवं टिकाऊ बनाने का उपाय खोजना है. इसके साथ ही बेहतर विपणन नीती से इसे कला से जुड़े विशेष समुदाय के जीवन स्तर को उच्च कोटि का बनाना है.


परियोजना का शोध कार्य ।CSSR में भी प्रस्तुत


सस्टेनिंग टोडा एम्ब्रॉयडरीः कल्चरल हेरिटेज, मार्केट एक्सपैंशन एंड पॉलिसी इंटरवेंशंस" विषय पर आधारित यह परियोजना इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (ICSSR) स्पेशल कॉल फॉर प्रोजेक्ट विकसित भारत @ 2047 के अंतर्गत संचालित की जा रही है. परियोजना का समन्वयन आफिस मैनेजमैंट एंड कंपनी सेक्रेटरीशिप, कला संकाय के एसोसिएट प्रोफेसर डा. रत्न शंकर मिश्रा कर रहे हैं. सह-अन्वेषक शारीरिक शिक्षा विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. विनायक कुमार दुबे, हैं. दो वर्ष तक संचालित होने वाली इस परियोजना के लिए 16 लाख रुपये की राशि के साथ स्वीकृति प्रदान की गई है. परियोजना का शोध कार्य ।CSSR, नई दिल्ली में भी प्रस्तुत किया गया है.


CTG


‘पुखूर’ के नाम से जानी जाने वाली टोडा कढ़ाई


स्थानीय रूप से ‘पुखूर’ के नाम से जानी जाने वाली टोडा कढ़ाई तमिलनाडु की नीलगिरि की पहाड़ियों में निवास करने वाले टोडा समुदाय की पारंपरिक कला है. अपने विशिष्ट ज्यामितीय डिजाइनों और पारंपरिक सिलाई तकनीक के लिए पहचानी जाने वाली यह कढ़ाई टोडा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ी है और समुदाय के लिए आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन भी है.भौगोलिक संकेतक (GI) मान्यता प्राप्त होने के बावजूद टोडा कढ़ाई कला से जुड़े कारीगरों को कम आय, सीमित बाजार, कच्चे माल की बढ़ती लागत, नकली उत्पादों तथा युवा पीढ़ी की घटती भागीदारी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. शोध परियोजना के अंतर्गत टोडा कढ़ाई की वर्तमान स्थिति, समुदाय की आजीविका एवं सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में इसके योगदान, कारीगरों के सामने मौजूद प्रमुख जोखिमों तथा उनसे निपटने की उनकी रणनीतियों का अध्ययन किया जा रहा है.


अध्ययन दल ने जानी कारीगरों की परेशानी


अध्ययन के क्षेत्रीय सर्वेक्षण के दौरान नीलगिरि जिले में टोडा कढ़ाई के कारीगरों के साक्षात्कार लिए गए. इनके माध्यम से कारीगरों के अनुभवों, आजीविका की स्थिति, सामने आने वाली चुनौतियों तथा इस पारंपरिक कला के भविष्य को लेकर उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास किया गया. परियोजना के अंतर्गत मौजूदा विपणन माध्यमों का अध्ययन करते हुए बाजार के विस्तार तथा प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेपों की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है.

अध्ययन में मिश्रित शोध पद्धति अपनाई गई है तथा वर्णनात्मक विश्लेषण किया जा रहा है. इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय सर्वेक्षण के लिए उद्देश्यपरक नमूना पद्धति का उपयोग किया गया है, जिसके अंतर्गत 239 टोडा कारीगरों को अध्ययन के लिए चिह्नित किया गया है. प्राथमिक आंकड़े संरचित पारिवारिक सर्वेक्षण और कारीगरों के साक्षात्कार के माध्यम से एकत्र किए जा रहे हैं, जबकि द्वितीयक आंकड़े संस्थागत स्रोतों से प्राप्त किए जा रहे हैं.


VML


बाजार विस्तार के लिए बन सकेगी स्थायी रणनीति


शोध के अंतर्गत नीलगिरि जिले के उधगमंडलम, कोटागिरी और कूनूर राजस्व प्रभागों को शामिल किया गया है. अध्ययन से टोडा कढ़ाई को एक सांस्कृतिक एवं आर्थिक गतिविधि के रूप में बेहतर ढंग से समझने, कारीगरों की आजीविका को प्रभावित करने वाली बाधाओं की पहचान करने तथा बाजार विस्तार के लिए स्थायी रणनीतियों और स्वदेशी हस्तशिल्प विरासत के संरक्षण हेतु नीतिगत सुझाव विकसित करने में सहायता मिलने की अपेक्षा है.


ALSO READ : वाराणसी में सपा की पीडीए जन पंचायत, इन मुद्दों पर उठे सवाल


यह परियोजना टोडा कढ़ाई के संरक्षण, कारीगरों की आजीविका को सुदृढ़ करने तथा इस पारंपरिक कला को एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में दीर्घकाल तक बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देने का प्रयास है. परियोजना के प्रधान अन्वेषक डा० रत्न शंकर मिश्रा का मानना है बेहतर विपणन नीति से ही टोडा समुदाय के लोगों को इस पारम्परिक कढाई की कला से बेहतर आय सृजित करने सम्बन्धी अवसर प्रदान किये जा सकते है.

अन्विति में ‘रंगों की उड़ान’ ने भरी कल्पनाओं में उड़ान, हिंदी दिवस कार्यक्रम के अतिथि होंगे संजय मिश्रा...
अन्विति में ‘रंगों की उड़ान’ ने भरी कल्पनाओं में उड़ान, हिंदी दिवस कार्यक्रम के अतिथि होंगे संजय मिश्रा...
वाराणसी : काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित ‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ के पांचवें दिन शनिवार को ‘रंगों की उड़ान’ चित्रकला प्रतियोगिता के साथ कार्यक्रमों की श्रृंखला आगे बढ़ी. जंतु विज्ञान विभाग के एसपीआरसी हाल में आयोजित प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने शब्दों के बजाय रंगों और रेखाओं के माध्यम से विज्ञान, तकनीक, पर्यावरण और भविष्य की अपनी कल्पनाओं को कैनवास पर उकेरा.हिंदी प्रकाशन समिति की ओर से आयोजित ‘अन्विति’ के तहत यह पांचवां और अंतिम कार्यक्रम रहा. प्रतियोगिता के दौरान विद्यार्थियों की कलाकृतियों में वर्ष 2200 का मंगल, ऑक्सीजन सिलेंडरों वाले शहर, हरित गुंबदनुमा आवास, भारतीय ध्वज फहराते अंतरिक्ष यात्री, रोबोट, उड़न तश्तरी, डीएनए की सर्पिल संरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पौधों से भरे बल्ब जैसे विषय देखने को मिले.विद्यार्थियों ने वैज्ञानिक अवधारणाओं को कला के माध्यम से सहज और रचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया. स्वीकृति कुमारी, श्रुति पाठक, अंकिता बिंद, प्राची तिवारी, सत्य राव और वैष्णवी बजाज सहित अनेक विद्यार्थियों की कृतियों में विज्ञान और कल्पना का अनूठा मेल दिखाई दिया.कुछ चित्रों में मंगल ग्रह पर कृषि और मानव बस्तियों की कल्पना की गई तो कुछ में पृथ्वी से दूर भविष्य की काल्पनिक नगरी दिखाई दी. कई चित्रों में तकनीक और प्रकृति के बीच संतुलन का संदेश दिया गया, जबकि कुछ विद्यार्थियों ने भविष्य की प्रयोगशालाओं और अंतरिक्ष अभियानों को अपनी कला का विषय बनाया.प्रतियोगिता में एक ओर धुएं से घिरे शहर और ऑक्सीजन सिलेंडर नजर आए तो दूसरी ओर हरित आवास और अंतरिक्ष में तैरते यान दिखाई दिए. प्रदूषण और पर्यावरण संकट के बीच हरित भविष्य की कल्पना का यह विरोधाभास प्रतियोगिता की प्रमुख विशेषता रहा.7 सितंबर से शुरू हुआ था ‘अन्विति’ का सफर‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ की शुरुआत 7 सितंबर को ‘काव्य सरिता’ से हुई थी। इसके बाद 8 सितंबर को ‘कथा सृजन’, 9 सितंबर को वाद-विवाद प्रतियोगिता और 10 सितंबर को ‘ज्ञान प्रभा’ प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को हिंदी में कविता, कहानी, तर्क-वितर्क और वैज्ञानिक विषयों को अभिव्यक्त करने का मंच मिला।ALSO READ : बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...15 सितंबर को संजय मिश्रा के साथ हिंदी दिवस समारोह‘अन्विति’ हिंदी सप्ताह का समापन अब 15 सितंबर को हिंदी दिवस समारोह के साथ होगा। समारोह का आयोजन महामना हॉल, सेमिनार कॉम्प्लेक्स, विज्ञान संकाय में दोपहर 2:45 बजे किया जाएगा। कार्यक्रम में प्रख्यात अभिनेता संजय मिश्रा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे।इस अवसर पर ‘अचिंत्य’ पत्रिका की नई कड़ी ‘क्षितिज से परे’ का विमोचन भी प्रस्तावित है। समारोह के साथ ही ‘अन्विति’ के तहत आयोजित विभिन्न साहित्यिक, बौद्धिक और रचनात्मक गतिविधियों का समापन होगा।
बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...
बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...
वाराणसी : देश के कई शहरों के साथ वाराणसी की हवा की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है। ताजा रैंकिंग में वाराणसी की स्थिति पिछले साल की तुलना में नीचे खिसकी है. शहर के 11वें पायदान से 34वें स्थान पर पहुंचने को पर्यावरण विशेषज्ञ गंभीर संकेत मान रहे हैं. बढ़ती आबादी, वाहनों की संख्या, ट्रैफिक जाम, निर्माण गतिविधियां और कचरे का उचित प्रबंधन नहीं होना वायु प्रदूषण बढ़ने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं.इस संबंध में आईआईटी बीएचयू के केमिकल वैज्ञानिक प्रो. आर.एस. सिंह ने बताया कि किसी भी एयर क्वालिटी रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उसका आकलन किस अवधि और किन मानकों के आधार पर किया गया है. रैंकिंग में सार्वजनिक धारणा के साथ-साथ केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सेंसर से मिलने वाले आंकड़ों की भी भूमिका होती है. यह भी महत्वपूर्ण है कि आंकड़े वर्ष के किस मौसम के लिए लिए गए हैं.उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर सर्दियों में गंगा के किनारे बसे शहरों में प्रदूषण की स्थिति ज्यादा खराब हो जाती है. वहीं बारिश के दौरान वातावरण में मौजूद धूल और कई तरह के कण बारिश के साथ नीचे बैठ जाते हैं, जिससे हवा अपेक्षाकृत साफ रहती है. ऐसे में वाराणसी की मौजूदा रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि इसमें किन महीनों के आंकड़ों को आधार बनाया गया है.बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या बनी चुनौतीप्रो. सिंह के मुताबिक वाराणसी में पर्यटन गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं. काशी विश्वनाथ धाम और अयोध्या समेत धार्मिक पर्यटन के चलते शहर में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है. पहले से अधिक जनसंख्या घनत्व वाले शहर में लोगों और वाहनों का दबाव बढ़ने से प्रदूषण पर भी असर पड़ता है.उन्होंने कहा कि वाहनों से होने वाला उत्सर्जन वायु प्रदूषण का बड़ा कारण है. वाराणसी में लगातार बढ़ता ट्रैफिक और जाम स्थिति को और गंभीर बनाता है. जाम में वाहन लंबे समय तक धीमी गति से चलते या खड़े रहते हैं, जिससे ईंधन की खपत और प्रदूषक उत्सर्जन दोनों बढ़ते हैं. वाहनों से निकलने वाले विभिन्न प्रदूषक हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं.निर्माण कार्यों से बढ़ता पार्टिकुलेट प्रदूषणशहर में लगातार चल रहे निर्माण कार्य भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं. विशेषज्ञ के अनुसार निर्माण स्थलों पर सीमेंट, बालू और अन्य सामग्री का इस्तेमाल होता है. यदि इनका उचित तरीके से भंडारण और प्रबंधन नहीं किया जाता तो धूल के महीन कण हवा में फैल जाते है. यही पार्टिकुलेट मैटर वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण घटकों में शामिल है.प्लास्टिक प्रदूषण भी बन रहा गंभीर खतराप्रो. आर.एस. सिंह ने प्लास्टिक प्रदूषण को भी गंभीर समस्या बताया. उन्होंने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल पानी या मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव हवा पर भी पड़ रहा है. वाहनों के टायर सड़क पर घिसते हैं, जिससे प्लास्टिक आधारित सूक्ष्म कण पर्यावरण में पहुंच सकते हैं.उन्होंने शहर के कचरा डंपिंग यार्ड का उदाहरण देते हुए बताया कि लंबे समय तक खुले में पड़े प्लास्टिक के टुकड़े धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं और माइक्रोप्लास्टिक में बदल सकते हैं. ये सूक्ष्म कण पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं और इनके प्रभाव को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है.घरों में इस्तेमाल होने वाली चीजें भी प्रदूषण का कारणप्रो. सिंह के अनुसार घरों में इस्तेमाल होने वाले कई उत्पाद भी ऐसे रसायन छोड़ सकते हैं जो प्रदूषण में योगदान करते हैं. पेंट और उसमें इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट से निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) इसका उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि आम लोगों को प्रदूषण के कई ऐसे स्रोतों की जानकारी नहीं होती, जिनका सामना वे रोजाना करते हैं.उन्होंने जल प्रदूषण के संदर्भ में दवाओं के अवशेषों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक कई दवाएं शरीर में पूरी तरह मेटाबोलाइज नहीं होतीं और सीवेज के माध्यम से जल स्रोतों तक पहुंच सकती हैं। यानी प्रदूषण केवल हवा की समस्या नहीं है, बल्कि हवा, पानी और मिट्टी—तीनों स्तरों पर इसके प्रभाव को समझने की जरूरत है.15-25 साल बाद स्थिति और भयावह होने की आशंकाप्रो. सिंह ने चेतावनी दी कि यदि प्रदूषण को लेकर समाज में जागरूकता नहीं बढ़ाई गई और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले 15 से 25 वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है. उन्होंने कहा कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है.ALSO READ : बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगानपहली कक्षा से बच्चों को दी जाए प्रदूषण की जानकारीप्रदूषण की रोकथाम के उपायों पर उन्होंने सबसे पहले जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया. उनका कहना है कि बच्चों को कम उम्र से ही प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में बताया जाना चाहिए. कक्षा एक से ही पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े विषयों को व्यवहारिक तरीके से समझाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी प्रदूषण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर अपनी भी जिम्मेदारी समझे.विशेषज्ञ का संदेश साफ है—शहर की हवा केवल मौसम से नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली, ट्रैफिक, निर्माण, कचरा प्रबंधन और जागरूकता से भी तय होती है. ऐसे में वाराणसी की गिरती रैंकिंग को महज आंकड़ा मानने के बजाय प्रदूषण के स्रोतों पर तत्काल काम करने की जरूरत है.
बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगान
बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगान
वाराणसी : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में चल रहे हिंदी माह-2026 के तहत शनिवार को विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षण कार्मिकों के लिए स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। समिति कक्ष में आयोजित प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने अपनी मौलिक कविताओं के माध्यम से हिंदी, भारतवर्ष, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, काशी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विशेषताओं का भावपूर्ण वर्णन किया।प्रतियोगिता में कुल 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ करते हुए हिंदी भाषा के प्रति समर्पण और गौरव की भावना व्यक्त की। कविताओं में भारत की विविधता, काशी की सांस्कृतिक विरासत और महामना के योगदान को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। प्रतिभागियों ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को महामना के अभूतपूर्व प्रयासों का परिणाम बताते हुए इसे ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखने वाला संस्थान बताया।प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में प्रो. वशिष्ठ अनूप, डॉ. संजीव सराफ और प्रो. उर्वशी गहलौत शामिल रहे। निर्णायक मंडल ने प्रतिभागियों की कविताओं, प्रस्तुति और विषयवस्तु के आधार पर मूल्यांकन किया।कार्यक्रम के दौरान हिंदी अधिकारी डॉ. शिव कुमार त्रिपाठी ने निर्णायक मंडल के सदस्यों को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश सिंह ने किया, जबकि अंशुमान पटेल ने धन्यवाद ज्ञापित किया।ALSO READ : सुब्रतो कप में यूपी का दम दिखाएगी वाराणसी की टीमकार्यक्रम को सफल बनाने में सहायक कुलसचिव विकास कुमार, रामजी त्रिपाठी, कीर्ति शंकर दुबे, रागिब हुसैन और रोहित आनंद का सहयोग रहा।