अक्षर ब्रह्मस्वरूप हैं और मानव समाज में चेतना ही वाक्य है : प्रो. हरिराम मिश्र

वाराणसी: महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के संस्कृत एवं अन्य प्राच्य विभाग तथा अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषा विभाग के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को ‘वाग् वै ब्रह्म’ विषय पर भाषा अंतर्विषयी विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रोफेसर हरिराम मिश्र ने विशिष्ट वक्ता के रूप में भाषायी दर्शन, शब्द-तत्व तथा भाषा की विविधता पर अपने विचार व्यक्त किए.
अपने व्याख्यान में प्रो. हरिराम मिश्र ने कहा कि सभी अक्षर ब्रह्मस्वरूप हैं और मानव समाज में चेतना ही वाक्य है. उन्होंने वैदिक मंत्रों के उदाहरणों के माध्यम से जीवन में भाषा के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि शब्द के बिना कोई क्रिया संभव नहीं है. उन्होंने भाषा के चार रूपों में वैखरी एवं मध्यमा के महत्व को रेखांकित करते हुए सरल भाषा, काव्य-सौष्ठव तथा शब्द और अर्थ के संबंध पर विस्तार से चर्चा की.
प्रो. मिश्र ने कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा में शब्द-तत्व को सृष्टि के कारण के रूप में देखा गया है. शब्द ही प्रतिभा है और वही ज्ञान तथा कल्पना का आधार बनकर कवि का सृजन करता है. उन्होंने कहा कि वेद और वेदांग भी भाषा को समझने की भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण स्रोत हैं. ज्ञान के प्रकाशन को अनादि बताते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक कारक भी ज्ञान की संरचना और उसके संप्रेषण को प्रभावित करते हैं. भाषा के विकास और उद्भव में अनेक आचार्यों का योगदान रहा है तथा समाज वही श्रेष्ठ विचार आगे बढ़ाता है, जो उसके लिए उपयोगी और सार्थक होते हैं.
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अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषा विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. नीरज धनकड़ ने धन्यवाद ज्ञापित किया. कार्यक्रम का संचालन संस्कृत विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. सीमा यादव ने किया.
इस अवसर पर प्रो. निशा सिंह, प्रो. अनिता, डॉ. दीपक, डॉ. किरण सिंह, डॉ. रीना चटर्जी, डॉ. धीरेन्द्र कुमार पाण्डेय, डॉ. कुमुद पाण्डेय, डॉ. शमा मिश्र, डॉ. उपेंद्र पांडे सहित छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे.



