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काशी से उठी गोहत्या रोकने की आवाज, संसद के सामने बहा था संतो का खून...

काशी से उठी गोहत्या रोकने की आवाज, संसद के सामने बहा था संतो का खून...
Jul 10, 2026, 07:07 AM
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Posted By Diksha Mishra

वाराणसीः गोहत्या रोकने के लिए काशी के संतों ने कई बार आंदोलन और अनशन किए हैं. इनमें सबसे बड़ा और ऐतिहासिक आंदोलन 7 नवंबर 1966 को हुआ था. इसमें देशभर के साधु-संतों के साथ काशी के संतों ने भी संसद के बाहर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था. इसके अलावा, संतों द्वारा समय-समय पर स्थानीय स्तर पर भी आंदोलन और यात्राएं निकाली गई हैं. श्रीविद्या मठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद गो हत्या बंद करने और गो माता को राष्ट्र माता घोषित करने के लिए लगातार आंदोलन कर रहे हैं.

1966 के ऐतिहासिक आंदोलन की बात करें तो गाय की हत्या पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाने के लिए संतों का यह आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था. 7 नवंबर 1966 (कार्तिक शुक्ल अष्टमी) को दिल्ली में संसद भवन के बाहर लाखों की संख्या में संन्यासी और गोभक्त एकत्रित हुए थे.



इस आन्दोलन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ का समर्थन प्राप्त था. उन दिनों इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं और गुलजारी लाल नंदा गृहमंत्री. गोहत्या रोकने के लिए इंदिरा सरकार आश्वासन दे रही थी. सरकार के वायदों से उकता कर संत समाज ने संसद के बाहर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया.


गोपाष्टमी के दिन दिल्ली में हुआ बड़ा आंदोलन


7 नवंबर 1966 को गोपाष्टमी थी और गोरक्षा महाभियान समिति की देखरेख में सुबह आठ बजे से ही नई दिल्ली में संसद के बाहर लोग जुटने शुरू हो गए थे. समिति के संचालक काशी के संत स्वामी करपात्री जी महाराज ने चांदनी चौक स्थित आर्य समाज मंदिर से अपना सत्याग्रह आरंभ किया. उनके साथ जगन्नाथपुरी, ज्योतिष्पीठ और द्वारकापीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय की सातो पीठ के पीठाधिपति और लाखों की संख्या में गोभक्त थे. संसद से लेकर चांदनी चौक तक भारी भीड़ थी. जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक के लोग गोहत्या बंद कराने के लिए कानून बनाने की मांग लेकर संसद के समक्ष जुटे थे.


अंचानक उग्र हो गया आंदोलनकारी


दोपहर एक बजे जुलूस संसद भवन पहुंच गया और संतों के भाषण शुरू हो गए. करीब तीन बजे का समय होगा, जब आर्य समाज के स्वामी रामेश्वरानंद भाषण देने के लिए खड़े हुए. उन्होंने कहा, ‘‘यह सरकार बहरी है, यह गोहत्या को रोकने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाएगी इसे झकझोरना होगा’’ इतना सुनना था कि गोभक्त हरकत में आ गए और उन्होंने संसद भवन को घेर लिया. पुलिस ने लाठी चलाना और अश्रुगैस छोड़ना शुरू कर दिया तो भीड़ और आक्रामक हो गई. इतने में गोली चलाने का आदेश हुआ और पुलिस ने भीड़ पर गोलीबारी शुरू कर दी.


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खून से लाल हो गई थी संसद के सामने की सड़क


सैकड़ों गोभक्त मारे गए संसद के सामने की पूरी सड़क खून से लाल हो गई. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस गोलीकांड में केवल 7 या 8 लोग मारे गए थे. लेकिन संत समाज और प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि पुलिस की बर्बरता में सैकड़ों से लेकर हजारों की संख्या में साधु और गोभक्त मारे गए थे, जिनकी लाशों को रात के अंधेरे में छिपा दिया गया था. संतों पर हुए इस भीषण अत्याचार के विरोध में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. दिल्ली में अगले कई दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा और हजारों संतों को जेल भेज दिया गया. इसके बाद सरकार ने इस घटना को दबाने की कोशिश की.


काशी से जारी रहा आंदोलन


इस घटना के बाद काशी के संतों और मुख्य नेतृत्वकर्ता स्वामी करपात्री जी महाराज ने आंदोलन को और तीव्र तथा संगठित बनाने के लिए एक व्यापक दूरगामी रणनीति तैयार की. इस दमनकारी घटना के बाद संतों ने राजनीतिक दबाव, जन-जागरण और कानूनी प्रयासों को मिलाकर कई कदम उठाए. सरकार पर दबाव बनाने के लिए पुरी के शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ और अन्य वरिष्ठ संतों ने 100 से अधिक दिनों तक लंबा आमरण अनशन किया. आंदोलन के प्रणेता स्वामी करपात्री जी महाराज ने प्रतिज्ञा ली कि जब तक भारत में गोवध पूरी तरह बंद नहीं होगा, वे चैन से नहीं बैठेंगे.

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बनाई गई संयुक्त संसदीय समिति


आंदोलन की उग्रता और संतों के बलिदान को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गोवध प्रतिबंध की संभावनाओं की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया. इस समिति में संतों की तरफ से जगद्गुरु शंकराचार्य और आरएसएस प्रमुख एमएस गोलवलकर (गुरुजी) जैसे विचारकों को शामिल किया गया. संतों की रणनीति देश में पूर्ण गोवध प्रतिबंध की थी. जब उन्हें लगा कि सरकार इस समिति के माध्यम से मामले को टालना चाहती है, तो संतों और विचारकों ने इस प्रक्रिया का कड़ा रुख अपनाया.


गांव-गांव तक पहुंचा आदोंलन


दिल्ली गोलीकांड के बाद संतों ने इस आंदोलन को राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक बना दिया. काशी को केंद्र बनाकर देश भर में रथ यात्राएं निकाली गईं ताकि हर गांव और घर के लोगों को गाय के वैज्ञानिक, आर्थिक और धार्मिक महत्व से जोड़ा जा सके. केवल कानून की मांग करने के बजाय, संतों ने 'सर्वदलीय गोरक्षा महा-अभियान समिति' के माध्यम से सड़कों पर लावारिस घूमने वाली गायों को बचाने और उनके संरक्षण के लिए देश भर में आश्रमों व गौशालाओं का जाल बिछाया.


काशी के संतों ने आंदोलन को दिया अखिल भारतीय स्वरूप

काशी के संतों ने 'सर्वदलीय गोरक्षा महाभियान समिति' की स्थापना कर विभिन्न अखाड़ों, नागा संन्यासियों, जैन और बौद्ध संतों को एक मंच पर लाकर खड़ा किया. इससे आंदोलन को एक अखिल भारतीय स्वरूप मिला. इस पूरे आंदोलन की वैचारिक और रणनीतिक रीढ़ काशी के प्रख्यात धर्मशास्त्री और दार्शनिक स्वामी करपात्री जी महाराज थे. काशी के संत समाज ने इस आंदोलन को केवल एक भावुक या धार्मिक मुद्दा नहीं बनाया, बल्कि इसके पीछे मजबूत वैचारिक तर्क दिए. स्वामी करपात्री जी और काशी के विद्वानों ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 (Directive Principles) में स्पष्ट रूप से लिखा है कि राज्य गायों और बछड़ों के वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाएगा. संतों का वैचारिक रुख यह था कि वे सरकार से किसी नई रियायत की भीख नहीं मांग रहे, बल्कि संविधान को ही लागू करने का दबाव बना रहे हैं. काशी के संतों ने यह बात दृढ़ता से रखी कि भारत एक कृषि प्रधान देश है. गाय और बैल देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जैविक खेती और पोषण (दूध-घी) का मुख्य आधार हैं. इसलिए गोहत्या देश को आर्थिक रूप से कमजोर कर रही है. काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का उपयोग करके संतों ने यह विचार फैलाया कि 'गौ' केवल एक पशु नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की चेतना का प्रतीक है. इसके संरक्षण के बिना भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान खो देगा.


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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कर रहे आंदोलन


आज भी काशी के संत और नागा संन्यासी इस अधूरे संकल्प को पूरा करने में जुटे हैं. गोहत्या को पूरी तरह गैर-जमानती और सख्त सजा योग्य अपराध बनाने की मांग उठाई जा रही है. काशी के विद्वान और संत पुनः 1966 जैसी एकजुटता दिखाकर दिल्ली कूच करने की चेतावनी दे रहे हैं. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इसके लिए लगातार आंदोलन कर रहे हैं. उन्होंने गविष्टि यात्रा शुरू की है. उत्तर प्रदेश में गायों की रक्षा के लिए, उन्होंने कई जिलों में 'गविष्टि यात्रा' निकाली. इस आंदोलन के तहत वह 403 विधानसभाओं में जाकर लोगों से गोहत्या के खिलाफ जनसंवाद करेंगे. उनका मुख्य उद्देश्य गाय को संवैधानिक रूप से 'राष्ट्रमाता' घोषित करवाना है, जिसके लिए वे सरकारों पर भी दबाव बना रहे हैं. उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जोड़कर गौशालाओं का निर्माण और गायों की सुरक्षा का संकल्प लिया है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गो-हत्या रोकने के लिए एक डिजिटल प्लेटफार्म 'Go-LX' बनाया है. इसके जरिए कोई भी हिंदू अपनी गाय सीधे गौ-रक्षकों को बेच सकता है, ताकि गाय कसाइयों तक न पहुंचें.

वाराणसी में रोपवे परियोजना के काम में तेजी, मंडलायुक्त ने किया स्थलीय निरीक्षण
वाराणसी में रोपवे परियोजना के काम में तेजी, मंडलायुक्त ने किया स्थलीय निरीक्षण
वाराणसी. में निर्माणाधीन रोपवे परियोजना को जल्द पूरा करने की तैयारियां तेज हो गई हैं। सोमवार को मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने गोदौलिया, गिरजाघर और रथयात्रा सहित विभिन्न रोपवे स्टेशनों का स्थलीय निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने निर्माण कार्यों की प्रगति, सुरक्षा व्यवस्था, आर्ट वर्क और फिनिशिंग कार्यों का जायजा लिया।मंडलायुक्त ने गोदौलिया स्टेशन पर बोर्डिंग-डिबोर्डिंग के लिए चल रहे निर्माण कार्य को देखा। वहीं गिरजाघर स्टेशन पर बन रहे कंट्रोल रूम की प्रगति की जानकारी ली। रथयात्रा स्टेशन पर भी निर्माणाधीन कार्यों का निरीक्षण करते हुए अधिकारियों को काम में तेजी लाने के निर्देश दिए।उन्होंने अधिकारियों और कार्यदायी संस्थाओं से परियोजना के अलग-अलग हिस्सों की जानकारी लेते हुए कहा कि गोदौलिया, गिरजाघर समेत सभी स्टेशनों के बचे हुए कार्यों को जल्द से जल्द पूरा किया जाए। साथ ही नियमित स्थलीय निरीक्षण कर प्रगति की समीक्षा करने और निर्माण में आने वाली समस्याओं का प्राथमिकता के आधार पर समाधान करने के निर्देश दिए।मंडलायुक्त ने कहा कि रोपवे परियोजना वाराणसी की यातायात व्यवस्था को सुगम बनाने और शहर में आधुनिक सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसके लिए संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय बनाकर कार्यों में तेजी लाने पर जोर दिया गया।ALSO READ : ऐढ़े में बनेगा आधुनिक पशु अस्पताल, खुशहाल नगर में बुजुर्गों के लिए बनेगी इंटरलॉकिंग सड़कगौरतलब है कि वाराणसी रोपवे परियोजना के तहत कैंट स्टेशन से रथयात्रा तक का कार्य पूरा हो चुका है। रथयात्रा से आगे के स्टेशनों पर अलाइनमेंट चेक का कार्य जारी है। परियोजना को नवंबर तक पूरा करने के लक्ष्य के साथ अंतिम तैयारियां तेजी से चल रही हैं।निरीक्षण के दौरान वाराणसी रोपवे की परियोजना निदेशक पूजा मिश्रा समेत रोपवे के अन्य अधिकारी मौजूद रहे।
ऐढ़े में बनेगा आधुनिक पशु अस्पताल, खुशहाल नगर में बुजुर्गों के लिए बनेगी इंटरलॉकिंग सड़क
ऐढ़े में बनेगा आधुनिक पशु अस्पताल, खुशहाल नगर में बुजुर्गों के लिए बनेगी इंटरलॉकिंग सड़क
वाराणसी. नगर निगम क्षेत्र में पशु कल्याण और विकास कार्यों को गति देने के लिए नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने सोमवार को ऐढ़े स्थित गौशाला और खुशहाल नगर के पीछे निर्माणाधीन सीनियर केयर सेंटर का निरीक्षण किया। उन्होंने अधिकारियों को पशुओं की चिकित्सा व्यवस्था बेहतर करने के साथ निर्माण कार्यों को गुणवत्ता के साथ समय से पूरा कराने के निर्देश दिए।ऐढ़े गौशाला में वर्तमान में कच्चे शेल्टर में संचालित पशु चिकित्सा व्यवस्था को आधुनिक पशु अस्पताल के रूप में विकसित किया जाएगा। नगर आयुक्त ने इसके लिए विस्तृत प्रस्ताव तैयार करने को कहा। अस्पताल में आम नागरिकों को अपने पालतू पशुओं के इलाज की सुविधा भी मिल सकेगी। उन्होंने पशुओं के उपचार संबंधी सभी कार्य पशु कल्याण अधिकारी की निगरानी में कराने के निर्देश दिए।गौशाला में गर्मी से पशुओं को राहत देने के लिए टीन शेड के नीचे पर्याप्त संख्या में पंखे लगाने, बाउंड्रीवॉल के किनारे पौधरोपण करने और प्रवेश द्वार स्थित गार्ड रूम के पास खाली भूमि पर इंटरलॉकिंग कराने को कहा गया। पशुओं के आवागमन के लिए मैजिक वाहन उपलब्ध कराने तथा परिसर में इंटरलॉकिंग और ड्रेनेज सिस्टम विकसित करने के निर्देश भी दिए गए।ALSO READ : नरहरि जयंती पर स्वर्णकार भारती सेवा संस्थान ने किया निःशुल्क फलाहारी प्रसाद वितरणइसके बाद नगर आयुक्त ने खुशहाल नगर के पीछे निर्माणाधीन सीनियर केयर सेंटर का निरीक्षण किया। उन्होंने सेंटर तक पहुंचने वाले मार्ग को सुगम बनाने के लिए 15वें वित्त आयोग से तत्काल इंटरलॉकिंग सड़क का निर्माण कराने का निर्देश दिया। उन्होंने अधिकारियों को निर्माण कार्य में गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता नहीं करने की हिदायत दी।निरीक्षण के दौरान पशुचिकित्साधिकारी डॉ. विजय अमृत राज, सहायक अभियंता, अवर अभियंता (सिविल) समेत अन्य अधिकारी मौजूद रहे।
नरहरि जयंती पर स्वर्णकार भारती सेवा संस्थान ने किया निःशुल्क फलाहारी प्रसाद वितरण
नरहरि जयंती पर स्वर्णकार भारती सेवा संस्थान ने किया निःशुल्क फलाहारी प्रसाद वितरण
वाराणसी. संत शिरोमणि नरहरि जी के जन्मोत्सव के अवसर पर सोमवार को स्वर्णकार भारती सेवा संस्थान के महिला प्रकोष्ठ की ओर से निःशुल्क फलाहारी प्रसाद वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। गोविंदपुरा मोड़ चौराहे पर हुए आयोजन में श्रद्धालुओं, राहगीरों और स्थानीय लोगों को प्रसाद वितरित किया गया। कार्यक्रम के दौरान लोगों ने श्रद्धा के साथ प्रसाद ग्रहण किया।फलाहारी प्रसाद में साबूदाना, आलू, फल और अन्य व्रत सामग्री शामिल रही। आयोजन के दौरान लोगों को प्रसाद वितरित करने के साथ संत नरहरि महाराज को श्रद्धापूर्वक नमन किया गया। सेवा कार्य में महिला प्रकोष्ठ के सदस्यों ने सक्रिय रूप से सहभागिता की। कार्यक्रम में धार्मिक आस्था के साथ सेवा भावना भी देखने को मिली।ALSO READ : लंबित प्रवेश प्रक्रिया जल्द पूरी करने की मांग को लेकर छात्रों ने बीएचयू प्रशासन को सौंपा ज्ञापनकार्यक्रम में प्रदेश अध्यक्ष सरिता सर्राफ माधवी मिश्रा, शिखा शर्मा, प्रेमासेठ, सुनीता सोनी, कनक वर्मा, संगीता, सुनीता, विभा किरण वर्मा, सुनीता बेबी, श्रवण सेठ, विशाल सेठ, अरविंद सेठ, रवि सर्राफ, ईश्वर चंद वर्मा, कमल सेठ, विष्णुदयाल सेठ, रॉनिक वर्मा, आनंद वर्मा, संजय सर्राफ, सुनील सेठ, मनु सेठ, तन्नू सेठ और विवेक समेत अन्य लोग मौजूद रहे।