काशी से उठी गोहत्या रोकने की आवाज, संसद के सामने बहा था संतो का खून...

वाराणसीः गोहत्या रोकने के लिए काशी के संतों ने कई बार आंदोलन और अनशन किए हैं. इनमें सबसे बड़ा और ऐतिहासिक आंदोलन 7 नवंबर 1966 को हुआ था. इसमें देशभर के साधु-संतों के साथ काशी के संतों ने भी संसद के बाहर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था. इसके अलावा, संतों द्वारा समय-समय पर स्थानीय स्तर पर भी आंदोलन और यात्राएं निकाली गई हैं. श्रीविद्या मठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद गो हत्या बंद करने और गो माता को राष्ट्र माता घोषित करने के लिए लगातार आंदोलन कर रहे हैं.
1966 के ऐतिहासिक आंदोलन की बात करें तो गाय की हत्या पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाने के लिए संतों का यह आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था. 7 नवंबर 1966 (कार्तिक शुक्ल अष्टमी) को दिल्ली में संसद भवन के बाहर लाखों की संख्या में संन्यासी और गोभक्त एकत्रित हुए थे.
इस आन्दोलन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ का समर्थन प्राप्त था. उन दिनों इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं और गुलजारी लाल नंदा गृहमंत्री. गोहत्या रोकने के लिए इंदिरा सरकार आश्वासन दे रही थी. सरकार के वायदों से उकता कर संत समाज ने संसद के बाहर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया.
गोपाष्टमी के दिन दिल्ली में हुआ बड़ा आंदोलन
7 नवंबर 1966 को गोपाष्टमी थी और गोरक्षा महाभियान समिति की देखरेख में सुबह आठ बजे से ही नई दिल्ली में संसद के बाहर लोग जुटने शुरू हो गए थे. समिति के संचालक काशी के संत स्वामी करपात्री जी महाराज ने चांदनी चौक स्थित आर्य समाज मंदिर से अपना सत्याग्रह आरंभ किया. उनके साथ जगन्नाथपुरी, ज्योतिष्पीठ और द्वारकापीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय की सातो पीठ के पीठाधिपति और लाखों की संख्या में गोभक्त थे. संसद से लेकर चांदनी चौक तक भारी भीड़ थी. जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक के लोग गोहत्या बंद कराने के लिए कानून बनाने की मांग लेकर संसद के समक्ष जुटे थे.
अंचानक उग्र हो गया आंदोलनकारी
दोपहर एक बजे जुलूस संसद भवन पहुंच गया और संतों के भाषण शुरू हो गए. करीब तीन बजे का समय होगा, जब आर्य समाज के स्वामी रामेश्वरानंद भाषण देने के लिए खड़े हुए. उन्होंने कहा, ‘‘यह सरकार बहरी है, यह गोहत्या को रोकने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाएगी इसे झकझोरना होगा’’ इतना सुनना था कि गोभक्त हरकत में आ गए और उन्होंने संसद भवन को घेर लिया. पुलिस ने लाठी चलाना और अश्रुगैस छोड़ना शुरू कर दिया तो भीड़ और आक्रामक हो गई. इतने में गोली चलाने का आदेश हुआ और पुलिस ने भीड़ पर गोलीबारी शुरू कर दी.

खून से लाल हो गई थी संसद के सामने की सड़क
सैकड़ों गोभक्त मारे गए संसद के सामने की पूरी सड़क खून से लाल हो गई. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस गोलीकांड में केवल 7 या 8 लोग मारे गए थे. लेकिन संत समाज और प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि पुलिस की बर्बरता में सैकड़ों से लेकर हजारों की संख्या में साधु और गोभक्त मारे गए थे, जिनकी लाशों को रात के अंधेरे में छिपा दिया गया था. संतों पर हुए इस भीषण अत्याचार के विरोध में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. दिल्ली में अगले कई दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा और हजारों संतों को जेल भेज दिया गया. इसके बाद सरकार ने इस घटना को दबाने की कोशिश की.
काशी से जारी रहा आंदोलन
इस घटना के बाद काशी के संतों और मुख्य नेतृत्वकर्ता स्वामी करपात्री जी महाराज ने आंदोलन को और तीव्र तथा संगठित बनाने के लिए एक व्यापक दूरगामी रणनीति तैयार की. इस दमनकारी घटना के बाद संतों ने राजनीतिक दबाव, जन-जागरण और कानूनी प्रयासों को मिलाकर कई कदम उठाए. सरकार पर दबाव बनाने के लिए पुरी के शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ और अन्य वरिष्ठ संतों ने 100 से अधिक दिनों तक लंबा आमरण अनशन किया. आंदोलन के प्रणेता स्वामी करपात्री जी महाराज ने प्रतिज्ञा ली कि जब तक भारत में गोवध पूरी तरह बंद नहीं होगा, वे चैन से नहीं बैठेंगे.

बनाई गई संयुक्त संसदीय समिति
आंदोलन की उग्रता और संतों के बलिदान को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गोवध प्रतिबंध की संभावनाओं की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया. इस समिति में संतों की तरफ से जगद्गुरु शंकराचार्य और आरएसएस प्रमुख एमएस गोलवलकर (गुरुजी) जैसे विचारकों को शामिल किया गया. संतों की रणनीति देश में पूर्ण गोवध प्रतिबंध की थी. जब उन्हें लगा कि सरकार इस समिति के माध्यम से मामले को टालना चाहती है, तो संतों और विचारकों ने इस प्रक्रिया का कड़ा रुख अपनाया.
गांव-गांव तक पहुंचा आदोंलन
दिल्ली गोलीकांड के बाद संतों ने इस आंदोलन को राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक बना दिया. काशी को केंद्र बनाकर देश भर में रथ यात्राएं निकाली गईं ताकि हर गांव और घर के लोगों को गाय के वैज्ञानिक, आर्थिक और धार्मिक महत्व से जोड़ा जा सके. केवल कानून की मांग करने के बजाय, संतों ने 'सर्वदलीय गोरक्षा महा-अभियान समिति' के माध्यम से सड़कों पर लावारिस घूमने वाली गायों को बचाने और उनके संरक्षण के लिए देश भर में आश्रमों व गौशालाओं का जाल बिछाया.
काशी के संतों ने आंदोलन को दिया अखिल भारतीय स्वरूप
काशी के संतों ने 'सर्वदलीय गोरक्षा महाभियान समिति' की स्थापना कर विभिन्न अखाड़ों, नागा संन्यासियों, जैन और बौद्ध संतों को एक मंच पर लाकर खड़ा किया. इससे आंदोलन को एक अखिल भारतीय स्वरूप मिला. इस पूरे आंदोलन की वैचारिक और रणनीतिक रीढ़ काशी के प्रख्यात धर्मशास्त्री और दार्शनिक स्वामी करपात्री जी महाराज थे. काशी के संत समाज ने इस आंदोलन को केवल एक भावुक या धार्मिक मुद्दा नहीं बनाया, बल्कि इसके पीछे मजबूत वैचारिक तर्क दिए. स्वामी करपात्री जी और काशी के विद्वानों ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 (Directive Principles) में स्पष्ट रूप से लिखा है कि राज्य गायों और बछड़ों के वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाएगा. संतों का वैचारिक रुख यह था कि वे सरकार से किसी नई रियायत की भीख नहीं मांग रहे, बल्कि संविधान को ही लागू करने का दबाव बना रहे हैं. काशी के संतों ने यह बात दृढ़ता से रखी कि भारत एक कृषि प्रधान देश है. गाय और बैल देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जैविक खेती और पोषण (दूध-घी) का मुख्य आधार हैं. इसलिए गोहत्या देश को आर्थिक रूप से कमजोर कर रही है. काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का उपयोग करके संतों ने यह विचार फैलाया कि 'गौ' केवल एक पशु नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की चेतना का प्रतीक है. इसके संरक्षण के बिना भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान खो देगा.
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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कर रहे आंदोलन
आज भी काशी के संत और नागा संन्यासी इस अधूरे संकल्प को पूरा करने में जुटे हैं. गोहत्या को पूरी तरह गैर-जमानती और सख्त सजा योग्य अपराध बनाने की मांग उठाई जा रही है. काशी के विद्वान और संत पुनः 1966 जैसी एकजुटता दिखाकर दिल्ली कूच करने की चेतावनी दे रहे हैं. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इसके लिए लगातार आंदोलन कर रहे हैं. उन्होंने गविष्टि यात्रा शुरू की है. उत्तर प्रदेश में गायों की रक्षा के लिए, उन्होंने कई जिलों में 'गविष्टि यात्रा' निकाली. इस आंदोलन के तहत वह 403 विधानसभाओं में जाकर लोगों से गोहत्या के खिलाफ जनसंवाद करेंगे. उनका मुख्य उद्देश्य गाय को संवैधानिक रूप से 'राष्ट्रमाता' घोषित करवाना है, जिसके लिए वे सरकारों पर भी दबाव बना रहे हैं. उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जोड़कर गौशालाओं का निर्माण और गायों की सुरक्षा का संकल्प लिया है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गो-हत्या रोकने के लिए एक डिजिटल प्लेटफार्म 'Go-LX' बनाया है. इसके जरिए कोई भी हिंदू अपनी गाय सीधे गौ-रक्षकों को बेच सकता है, ताकि गाय कसाइयों तक न पहुंचें.



