वध के लिए बनारस के रास्ते हर दिन पांच सौ पशु तस्करी कर भेजे जा रहे बिहार, बंगाल...

वाराणसीः वध के लिए बनारस के रास्ते हर दिन पांच सौ पशु तस्करी करके बिहार और बंगाल
भेजे जा रहे हैं. यहां से इनका मांस बांग्लादेश के लिए जाता है. यह दावा गो तस्करों के खिलाफ काम करने वाली संस्था गो ज्ञान फाउंडेशन का. वाराणसी में भी सक्रिय संस्था के लोगों का कहना है कि इस धंधे में होने वाली कमाई के कई हिस्सेदार होते हैं जिनमें पुलिस भी शामिल होती है. जो पशु तस्करों को रोकने की कोशिश करता है उसकी जान हमेशा खतरे में रहती है.
दिल्ली आधारित गो ज्ञान फाउंडेशन वर्ष 2017 गो तस्करी के खिलाफ काम कर रही है. इनकी टीम यूपी और बिहार में सबसे अधिक सक्रिय है. कुछ दिनों पहले तक बंगाल के हालात बहुत अच्छे नहीं होने के वजह से वहां काम करना संस्था के लिए बेहद मुश्किल था. संस्था का दावा है कि वध के लिए सबसे अधिक लगभग 70 प्रतिशत पशु उत्तर प्रदेश से लाए जाते हैं. इसके अलावा राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ से भी पशुओं को लाया जाता है. उत्तर प्रदेश में स्लाटर हाउस पर सरकार की सख्ती के चलते उनका वध बिहार में या बंगाल में किया जाता है. बिहार में सिर्फ तीन स्टालर हाउस हैं जबकि इलीगल सौ छोटे-बड़े स्टालर हाउस संचालित हो रहे हैं. पशुओं के वध के बाद तैयार मीट को बंगाल और उसके साथ बांग्लादेश भेजा जाता है.
पशु तस्करी में कई टीम करती है एक साथ काम
संस्था के लोगों की मानें तो पशु तस्करी में एक साथ कई टीम काम करती है. एक टीम का काम पशुओं को जगह-जगह से जमा करना होता है. दूसरी टीम उसे वाहनों को लादने काम करती है. तीसरी टीम उन वाहन चालकों की होती है जो पशुओं को वधशाला तक पहुंचाते हैं.
तस्करी में मुख्य भूमिका निभाते हैं एंट्री माफिया
पशु तस्करी में बड़ी भूमिका एंट्री माफिया निभाते हैं. उनका काम उन वाहनों को बिना किसी बाधा के स्लाटर हाउस तक पहुंचाना होता है. अलग-अलग इलाके के एंट्री माफिया अलग होते हैं लेकिन उनके बीच आपस में सपर्क बना रहता है. पशु लदे वाहनों को पास कराने के लिए वह बाकायदा पुलिस और स्थानीय लोगों की मदद लेते हैं. उनकी पहुंच का अंदाज ऐसे लगाया जा सकता है कि किसी ने उन गाड़ियों को रोकने की कोशिश की तो उनके इशारे पर पचास सौ लोगों की भीड़ जमा हो जाती है और किसी भी तरह से पशु लदे वाहनों को छुड़ाती है.
हर थाने पर पहुंचती है तय रकम
संस्था के लोगों की मानें तो पशु तस्कर जिस रूट से गुजरते हैं उस रूट में पड़ने वाले पुलिस थानों को मैनेज करते हैं. हर थाने पर हर महीने एक से डेढ़ लाख रुपये पहुंचता है. कई बार यह रकम दो लाख तक होती है.
तस्करी की कमाई को बांटते हैं हर हिस्सेदार
तस्करी की कमाई बहुत बड़ी है. इसमें शामिल हर व्यक्ति को महीने में अच्छी-खासी रकम मिलती है. तस्कर एक गाय या भैंस को दो से तीन हजार रुपये में खरीदते हैं. स्लाटर हाउस तक पहुंचते इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपये तक पहुंच जाती है. एक पशु से तस्कर इसकी लगभग दो गुनी कीमत हासिल कर लेता है. पशु के मांस के साथ उसका चमड़ा, सींग, हड्डी भी बेची जाती है जिनका उपयोग अलग-अलग जगहों पर किया जाता है. तस्करी में जिसकी जो भूमिका होती है उसके मुताबिक उसे रुपये मिलते हैं. पशु जमा करने वालों को प्रति पशु पांच सौ एक हजार मिलता है. वाहन से ले जाने वाला एक ट्रिप का आठ से दस हजार रुपये लेता है. एंट्री माफिया हर गाड़ी के पांच हजार रुपये लेता है.
तस्करी के लिए कई जगहों से जमा किए जाते हैं पशु
तस्करी में पशुओं के साथ होती है क्रूरता की हद पार
संस्था के लोगों की मानें तो तस्करी के दौरान पशुओं के साथ बहुत क्रूरता होती है. एक कंटेनर में 40 से 50 गाय को एक साथ रखते हैं. भैंस की संख्या 60 से 70 तक होती है. उनके आंख में मिर्च डाली जाती है ताकि वह खड़े रहें और बैठकर अधिक जगह न लें. उनको गोबर व पेशाब करने से रोकने के लिए दवा दी जाती है. दर्द से पशु कराहे नहीं इसलिए दर्द निवारक दवा दी जाती है. उन पर होने वाली क्रूरता का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि जब कभी उन्हें बचाया जाता है तो भी पशु इतने सदमे होते हैं को कई दिनों तक खड़े ही रहते हैं और कुछ भी खाते पीते नहीं हैं.
तस्करों को लिए वाराणसी का रास्ता है आसान
हाइवे के जरिए वाराणसी का बिहार और बंगाल से जुड़ाव पशु तस्करों को सबसे बेहतर लगता है. इस रूट के जरिए वह चंदौली, सैयदराजा, अलीनगर से होकर बिहार जाते हैं. संस्था का दावा है कि पशु तस्कर वाराणसी के नेशनल हाइवे दो (वाराणसी के बंगाल) डाफी टोल प्लाजा होते चंदौली, सैयदराजा, बिहार में दुर्गावती, कुदरा मोहनिया, कैमूर, चेनारी, शिवसागर टोल प्लाजा, औरंगाबाद, गया, सौकला, शेराघाटी, डोभी, बराचजट्टी टोल प्लाजा होता बंगाल पहुंचते हैं.
पुलिस का कार्रवाई भी पुष्टि करती है इन रास्तों का इस्तेमाल पशु तस्करी के लिए किया जा रहा है. डीआईजी रेंज वाराणसी वैभव कृष्ण ने पशु तस्करी पर लगाम के लिए एक साथ 54 वांछित तस्करों पर 50-50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया. इनमें से 50 चंदौली जिले के और अन्य चार गाजीपुर के हैं.
चंदौली में दर्ज मुकदमों के वांछित 50 पशु तस्कर करीब एक साल से फरार चल रहे हैं जबकि गाजीपुर के चार आरोपी छह माह से फरार हैं. चंदौली के वांछितों में ज्यादातर अपराधी बिहार के निवासी हैं. जनवरी 2024 से जनवरी 2026 तक चंदौली में पशु तस्करी के लिए 339 केस दर्ज हुए कुल 805 गिरफ्तारी हुई जबकि 243 पर गैंगस्टर लगा. गुण्डा एक्ट में 36 पर कार्रवाई हुई और 362 वाहन बरामद हुए. गैंगस्टर के आठ केस में 1.18 करोड़ की संपत्ति जब्त की गई. गाजीपुर में 82 केस. 214 गिरफ्तार, 52 पर गैंगस्टर 25 पर गुंडा एक्ट लगा, 21 वाहन बरामद हुए. गैंगस्टर के चार केस में 73.26 लाख की संपत्ति जब्त हुई जौनपुर में 37 केस, 144 गिरफ्तार, 50 पर गैंगस्टर, 77 पर गुंडा एक्ट लगा. 33 वाहन बरामद हुए. गैंगस्टर के दो केस में 1.01 करोड़ की संपत्ति जब्त हुई.
काशी में गोभक्तों का महामंथन, 27 को देश भर में मनेगा गो सम्मान दिवस
गोमाता की सेवा, सुरक्षा और उन्हें राष्ट्र में उचित सम्मान दिलाने के उद्देश्य से गो सम्मान आह्वान अभियान के तहत बुधवार को कमच्छा स्थित बोध गया मठ (आदि शंकराचार्य मठ) में पूर्वांचल के गोभक्तों की एक दिवसीय संगोष्ठी हुई. इस बैठक में अभियान के आगामी द्वितीय चरण की रूपरेखा तय की गई.
इसके अंतर्गत आगामी 27 जुलाई को पूरे देश में गो सम्मान दिवस के रूप में मनाने का सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया. इसके साथ ही देशभर में 15 करोड़ हस्ताक्षर जुटाकर सभी डीएम के माध्यम से सरकार को ज्ञापन सौंपने की वृहद कार्ययोजना पर चर्चा की गई. संतों ने कहा कि देश के हर जिले में संत समाज और आम जनता मिलकर स्थानीय जिलाधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री को गोसेवा व सुरक्षा के निमित्त प्रार्थना पत्र सौंपेंगे.
ALSO READ:सपा प्रमुख पर टिप्पणी के विरोध में मंत्री के पोस्टर पर फूटा गुस्सा, जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन...
संगोष्ठी में सालरिया (मध्य प्रदेश) से आए ग्वाल संत गोपालानंद महाराज, वृंदावन धाम के संत गोपेश कृष्ण दास और यूपी के राज्य प्रभारी व श्री माताजी गोशाला (बरसाना) के प्रबंधक ब्रजदास महाराज उपस्थित रहे. संतों ने कहा कि गावः विश्वस्य मातरः अर्थात वेदों ने गाय को संपूर्ण विश्व की माता माना है. जिस देश को कभी दूध की नदियां बहने और सोने की चिड़िया होने का गौरव प्राप्त था, उसका एकमात्र आधार गोमाता ही थीं. संतों ने कहा कि इस अभियान की विशेषता यह है कि यह किसी राजनीतिक दल, संस्था या किसी एक व्यक्ति के बैनर तले नहीं चल रहा है. इस देशव्यापी आंदोलन के अध्यक्ष स्वयं नंदी बाबा और प्रधान संरक्षक भगवती गोमाता हैं.



