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वध के लिए बनारस के रास्ते हर दिन पांच सौ पशु तस्करी कर भेजे जा रहे बिहार, बंगाल...

वध के लिए बनारस के रास्ते हर दिन पांच सौ पशु तस्करी कर भेजे जा रहे बिहार, बंगाल...
Jul 09, 2026, 11:45 AM
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Posted By Diksha Mishra

वाराणसीः वध के लिए बनारस के रास्ते हर दिन पांच सौ पशु तस्करी करके बिहार और बंगाल

भेजे जा रहे हैं. यहां से इनका मांस बांग्लादेश के लिए जाता है. यह दावा गो तस्करों के खिलाफ काम करने वाली संस्था गो ज्ञान फाउंडेशन का. वाराणसी में भी सक्रिय संस्था के लोगों का कहना है कि इस धंधे में होने वाली कमाई के कई हिस्सेदार होते हैं जिनमें पुलिस भी शामिल होती है. जो पशु तस्करों को रोकने की कोशिश करता है उसकी जान हमेशा खतरे में रहती है.


दिल्ली आधारित गो ज्ञान फाउंडेशन वर्ष 2017 गो तस्करी के खिलाफ काम कर रही है. इनकी टीम यूपी और बिहार में सबसे अधिक सक्रिय है. कुछ दिनों पहले तक बंगाल के हालात बहुत अच्छे नहीं होने के वजह से वहां काम करना संस्था के लिए बेहद मुश्किल था. संस्था का दावा है कि वध के लिए सबसे अधिक लगभग 70 प्रतिशत पशु उत्तर प्रदेश से लाए जाते हैं. इसके अलावा राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ से भी पशुओं को लाया जाता है. उत्तर प्रदेश में स्लाटर हाउस पर सरकार की सख्ती के चलते उनका वध बिहार में या बंगाल में किया जाता है. बिहार में सिर्फ तीन स्टालर हाउस हैं जबकि इलीगल सौ छोटे-बड़े स्टालर हाउस संचालित हो रहे हैं. पशुओं के वध के बाद तैयार मीट को बंगाल और उसके साथ बांग्लादेश भेजा जाता है.


पशु तस्करी में कई टीम करती है एक साथ काम

संस्था के लोगों की मानें तो पशु तस्करी में एक साथ कई टीम काम करती है. एक टीम का काम पशुओं को जगह-जगह से जमा करना होता है. दूसरी टीम उसे वाहनों को लादने काम करती है. तीसरी टीम उन वाहन चालकों की होती है जो पशुओं को वधशाला तक पहुंचाते हैं.


तस्करी में मुख्य भूमिका निभाते हैं एंट्री माफिया

पशु तस्करी में बड़ी भूमिका एंट्री माफिया निभाते हैं. उनका काम उन वाहनों को बिना किसी बाधा के स्लाटर हाउस तक पहुंचाना होता है. अलग-अलग इलाके के एंट्री माफिया अलग होते हैं लेकिन उनके बीच आपस में सपर्क बना रहता है. पशु लदे वाहनों को पास कराने के लिए वह बाकायदा पुलिस और स्थानीय लोगों की मदद लेते हैं. उनकी पहुंच का अंदाज ऐसे लगाया जा सकता है कि किसी ने उन गाड़ियों को रोकने की कोशिश की तो उनके इशारे पर पचास सौ लोगों की भीड़ जमा हो जाती है और किसी भी तरह से पशु लदे वाहनों को छुड़ाती है.


हर थाने पर पहुंचती है तय रकम

संस्था के लोगों की मानें तो पशु तस्कर जिस रूट से गुजरते हैं उस रूट में पड़ने वाले पुलिस थानों को मैनेज करते हैं. हर थाने पर हर महीने एक से डेढ़ लाख रुपये पहुंचता है. कई बार यह रकम दो लाख तक होती है.

तस्करी की कमाई को बांटते हैं हर हिस्सेदार

तस्करी की कमाई बहुत बड़ी है. इसमें शामिल हर व्यक्ति को महीने में अच्छी-खासी रकम मिलती है. तस्कर एक गाय या भैंस को दो से तीन हजार रुपये में खरीदते हैं. स्लाटर हाउस तक पहुंचते इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपये तक पहुंच जाती है. एक पशु से तस्कर इसकी लगभग दो गुनी कीमत हासिल कर लेता है. पशु के मांस के साथ उसका चमड़ा, सींग, हड्डी भी बेची जाती है जिनका उपयोग अलग-अलग जगहों पर किया जाता है. तस्करी में जिसकी जो भूमिका होती है उसके मुताबिक उसे रुपये मिलते हैं. पशु जमा करने वालों को प्रति पशु पांच सौ एक हजार मिलता है. वाहन से ले जाने वाला एक ट्रिप का आठ से दस हजार रुपये लेता है. एंट्री माफिया हर गाड़ी के पांच हजार रुपये लेता है.


तस्करी के लिए कई जगहों से जमा किए जाते हैं पशु


तस्करी में पशुओं के साथ होती है क्रूरता की हद पार

संस्था के लोगों की मानें तो तस्करी के दौरान पशुओं के साथ बहुत क्रूरता होती है. एक कंटेनर में 40 से 50 गाय को एक साथ रखते हैं. भैंस की संख्या 60 से 70 तक होती है. उनके आंख में मिर्च डाली जाती है ताकि वह खड़े रहें और बैठकर अधिक जगह न लें. उनको गोबर व पेशाब करने से रोकने के लिए दवा दी जाती है. दर्द से पशु कराहे नहीं इसलिए दर्द निवारक दवा दी जाती है. उन पर होने वाली क्रूरता का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि जब कभी उन्हें बचाया जाता है तो भी पशु इतने सदमे होते हैं को कई दिनों तक खड़े ही रहते हैं और कुछ भी खाते पीते नहीं हैं.


तस्करों को लिए वाराणसी का रास्ता है आसान


हाइवे के जरिए वाराणसी का बिहार और बंगाल से जुड़ाव पशु तस्करों को सबसे बेहतर लगता है. इस रूट के जरिए वह चंदौली, सैयदराजा, अलीनगर से होकर बिहार जाते हैं. संस्था का दावा है कि पशु तस्कर वाराणसी के नेशनल हाइवे दो (वाराणसी के बंगाल) डाफी टोल प्लाजा होते चंदौली, सैयदराजा, बिहार में दुर्गावती, कुदरा मोहनिया, कैमूर, चेनारी, शिवसागर टोल प्लाजा, औरंगाबाद, गया, सौकला, शेराघाटी, डोभी, बराचजट्टी टोल प्लाजा होता बंगाल पहुंचते हैं.

पुलिस का कार्रवाई भी पुष्टि करती है इन रास्तों का इस्तेमाल पशु तस्करी के लिए किया जा रहा है. डीआईजी रेंज वाराणसी वैभव कृष्ण ने पशु तस्करी पर लगाम के लिए एक साथ 54 वांछित तस्करों पर 50-50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया. इनमें से 50 चंदौली जिले के और अन्य चार गाजीपुर के हैं.



चंदौली में दर्ज मुकदमों के वांछित 50 पशु तस्कर करीब एक साल से फरार चल रहे हैं जबकि गाजीपुर के चार आरोपी छह माह से फरार हैं. चंदौली के वांछितों में ज्यादातर अपराधी बिहार के निवासी हैं. जनवरी 2024 से जनवरी 2026 तक चंदौली में पशु तस्करी के लिए 339 केस दर्ज हुए कुल 805 गिरफ्तारी हुई जबकि 243 पर गैंगस्टर लगा. गुण्डा एक्ट में 36 पर कार्रवाई हुई और 362 वाहन बरामद हुए. गैंगस्टर के आठ केस में 1.18 करोड़ की संपत्ति जब्त की गई. गाजीपुर में 82 केस. 214 गिरफ्तार, 52 पर गैंगस्टर 25 पर गुंडा एक्ट लगा, 21 वाहन बरामद हुए. गैंगस्टर के चार केस में 73.26 लाख की संपत्ति जब्त हुई जौनपुर में 37 केस, 144 गिरफ्तार, 50 पर गैंगस्टर, 77 पर गुंडा एक्ट लगा. 33 वाहन बरामद हुए. गैंगस्टर के दो केस में 1.01 करोड़ की संपत्ति जब्त हुई.


काशी में गोभक्तों का महामंथन, 27 को देश भर में मनेगा गो सम्मान दिवस


गोमाता की सेवा, सुरक्षा और उन्हें राष्ट्र में उचित सम्मान दिलाने के उद्देश्य से गो सम्मान आह्वान अभियान के तहत बुधवार को कमच्छा स्थित बोध गया मठ (आदि शंकराचार्य मठ) में पूर्वांचल के गोभक्तों की एक दिवसीय संगोष्ठी हुई. इस बैठक में अभियान के आगामी द्वितीय चरण की रूपरेखा तय की गई.

इसके अंतर्गत आगामी 27 जुलाई को पूरे देश में गो सम्मान दिवस के रूप में मनाने का सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया. इसके साथ ही देशभर में 15 करोड़ हस्ताक्षर जुटाकर सभी डीएम के माध्यम से सरकार को ज्ञापन सौंपने की वृहद कार्ययोजना पर चर्चा की गई. संतों ने कहा कि देश के हर जिले में संत समाज और आम जनता मिलकर स्थानीय जिलाधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री को गोसेवा व सुरक्षा के निमित्त प्रार्थना पत्र सौंपेंगे.



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संगोष्ठी में सालरिया (मध्य प्रदेश) से आए ग्वाल संत गोपालानंद महाराज, वृंदावन धाम के संत गोपेश कृष्ण दास और यूपी के राज्य प्रभारी व श्री माताजी गोशाला (बरसाना) के प्रबंधक ब्रजदास महाराज उपस्थित रहे. संतों ने कहा कि गावः विश्वस्य मातरः अर्थात वेदों ने गाय को संपूर्ण विश्व की माता माना है. जिस देश को कभी दूध की नदियां बहने और सोने की चिड़िया होने का गौरव प्राप्त था, उसका एकमात्र आधार गोमाता ही थीं. संतों ने कहा कि इस अभियान की विशेषता यह है कि यह किसी राजनीतिक दल, संस्था या किसी एक व्यक्ति के बैनर तले नहीं चल रहा है. इस देशव्यापी आंदोलन के अध्यक्ष स्वयं नंदी बाबा और प्रधान संरक्षक भगवती गोमाता हैं.

अन्विति में ‘रंगों की उड़ान’ ने भरी कल्पनाओं में उड़ान, हिंदी दिवस कार्यक्रम के अतिथि होंगे संजय मिश्रा...
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वाराणसी : काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित ‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ के पांचवें दिन शनिवार को ‘रंगों की उड़ान’ चित्रकला प्रतियोगिता के साथ कार्यक्रमों की श्रृंखला आगे बढ़ी. जंतु विज्ञान विभाग के एसपीआरसी हाल में आयोजित प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने शब्दों के बजाय रंगों और रेखाओं के माध्यम से विज्ञान, तकनीक, पर्यावरण और भविष्य की अपनी कल्पनाओं को कैनवास पर उकेरा.हिंदी प्रकाशन समिति की ओर से आयोजित ‘अन्विति’ के तहत यह पांचवां और अंतिम कार्यक्रम रहा. प्रतियोगिता के दौरान विद्यार्थियों की कलाकृतियों में वर्ष 2200 का मंगल, ऑक्सीजन सिलेंडरों वाले शहर, हरित गुंबदनुमा आवास, भारतीय ध्वज फहराते अंतरिक्ष यात्री, रोबोट, उड़न तश्तरी, डीएनए की सर्पिल संरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पौधों से भरे बल्ब जैसे विषय देखने को मिले.विद्यार्थियों ने वैज्ञानिक अवधारणाओं को कला के माध्यम से सहज और रचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया. स्वीकृति कुमारी, श्रुति पाठक, अंकिता बिंद, प्राची तिवारी, सत्य राव और वैष्णवी बजाज सहित अनेक विद्यार्थियों की कृतियों में विज्ञान और कल्पना का अनूठा मेल दिखाई दिया.कुछ चित्रों में मंगल ग्रह पर कृषि और मानव बस्तियों की कल्पना की गई तो कुछ में पृथ्वी से दूर भविष्य की काल्पनिक नगरी दिखाई दी. कई चित्रों में तकनीक और प्रकृति के बीच संतुलन का संदेश दिया गया, जबकि कुछ विद्यार्थियों ने भविष्य की प्रयोगशालाओं और अंतरिक्ष अभियानों को अपनी कला का विषय बनाया.प्रतियोगिता में एक ओर धुएं से घिरे शहर और ऑक्सीजन सिलेंडर नजर आए तो दूसरी ओर हरित आवास और अंतरिक्ष में तैरते यान दिखाई दिए. प्रदूषण और पर्यावरण संकट के बीच हरित भविष्य की कल्पना का यह विरोधाभास प्रतियोगिता की प्रमुख विशेषता रहा.7 सितंबर से शुरू हुआ था ‘अन्विति’ का सफर‘अन्विति हिंदी सप्ताह’ की शुरुआत 7 सितंबर को ‘काव्य सरिता’ से हुई थी। इसके बाद 8 सितंबर को ‘कथा सृजन’, 9 सितंबर को वाद-विवाद प्रतियोगिता और 10 सितंबर को ‘ज्ञान प्रभा’ प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को हिंदी में कविता, कहानी, तर्क-वितर्क और वैज्ञानिक विषयों को अभिव्यक्त करने का मंच मिला।ALSO READ : बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...15 सितंबर को संजय मिश्रा के साथ हिंदी दिवस समारोह‘अन्विति’ हिंदी सप्ताह का समापन अब 15 सितंबर को हिंदी दिवस समारोह के साथ होगा। समारोह का आयोजन महामना हॉल, सेमिनार कॉम्प्लेक्स, विज्ञान संकाय में दोपहर 2:45 बजे किया जाएगा। कार्यक्रम में प्रख्यात अभिनेता संजय मिश्रा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे।इस अवसर पर ‘अचिंत्य’ पत्रिका की नई कड़ी ‘क्षितिज से परे’ का विमोचन भी प्रस्तावित है। समारोह के साथ ही ‘अन्विति’ के तहत आयोजित विभिन्न साहित्यिक, बौद्धिक और रचनात्मक गतिविधियों का समापन होगा।
बनारस की हवा फिर बिगड़ी, 11वें से खिसककर 34वें पायदान पर पहुंची रैंकिंग, विशेषज्ञ ने गिनाए प्रदूषण के कारण...
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वाराणसी : देश के कई शहरों के साथ वाराणसी की हवा की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है। ताजा रैंकिंग में वाराणसी की स्थिति पिछले साल की तुलना में नीचे खिसकी है. शहर के 11वें पायदान से 34वें स्थान पर पहुंचने को पर्यावरण विशेषज्ञ गंभीर संकेत मान रहे हैं. बढ़ती आबादी, वाहनों की संख्या, ट्रैफिक जाम, निर्माण गतिविधियां और कचरे का उचित प्रबंधन नहीं होना वायु प्रदूषण बढ़ने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं.इस संबंध में आईआईटी बीएचयू के केमिकल वैज्ञानिक प्रो. आर.एस. सिंह ने बताया कि किसी भी एयर क्वालिटी रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उसका आकलन किस अवधि और किन मानकों के आधार पर किया गया है. रैंकिंग में सार्वजनिक धारणा के साथ-साथ केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सेंसर से मिलने वाले आंकड़ों की भी भूमिका होती है. यह भी महत्वपूर्ण है कि आंकड़े वर्ष के किस मौसम के लिए लिए गए हैं.उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर सर्दियों में गंगा के किनारे बसे शहरों में प्रदूषण की स्थिति ज्यादा खराब हो जाती है. वहीं बारिश के दौरान वातावरण में मौजूद धूल और कई तरह के कण बारिश के साथ नीचे बैठ जाते हैं, जिससे हवा अपेक्षाकृत साफ रहती है. ऐसे में वाराणसी की मौजूदा रैंकिंग को समझने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि इसमें किन महीनों के आंकड़ों को आधार बनाया गया है.बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या बनी चुनौतीप्रो. सिंह के मुताबिक वाराणसी में पर्यटन गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं. काशी विश्वनाथ धाम और अयोध्या समेत धार्मिक पर्यटन के चलते शहर में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है. पहले से अधिक जनसंख्या घनत्व वाले शहर में लोगों और वाहनों का दबाव बढ़ने से प्रदूषण पर भी असर पड़ता है.उन्होंने कहा कि वाहनों से होने वाला उत्सर्जन वायु प्रदूषण का बड़ा कारण है. वाराणसी में लगातार बढ़ता ट्रैफिक और जाम स्थिति को और गंभीर बनाता है. जाम में वाहन लंबे समय तक धीमी गति से चलते या खड़े रहते हैं, जिससे ईंधन की खपत और प्रदूषक उत्सर्जन दोनों बढ़ते हैं. वाहनों से निकलने वाले विभिन्न प्रदूषक हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं.निर्माण कार्यों से बढ़ता पार्टिकुलेट प्रदूषणशहर में लगातार चल रहे निर्माण कार्य भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं. विशेषज्ञ के अनुसार निर्माण स्थलों पर सीमेंट, बालू और अन्य सामग्री का इस्तेमाल होता है. यदि इनका उचित तरीके से भंडारण और प्रबंधन नहीं किया जाता तो धूल के महीन कण हवा में फैल जाते है. यही पार्टिकुलेट मैटर वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण घटकों में शामिल है.प्लास्टिक प्रदूषण भी बन रहा गंभीर खतराप्रो. आर.एस. सिंह ने प्लास्टिक प्रदूषण को भी गंभीर समस्या बताया. उन्होंने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल पानी या मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव हवा पर भी पड़ रहा है. वाहनों के टायर सड़क पर घिसते हैं, जिससे प्लास्टिक आधारित सूक्ष्म कण पर्यावरण में पहुंच सकते हैं.उन्होंने शहर के कचरा डंपिंग यार्ड का उदाहरण देते हुए बताया कि लंबे समय तक खुले में पड़े प्लास्टिक के टुकड़े धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं और माइक्रोप्लास्टिक में बदल सकते हैं. ये सूक्ष्म कण पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं और इनके प्रभाव को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है.घरों में इस्तेमाल होने वाली चीजें भी प्रदूषण का कारणप्रो. सिंह के अनुसार घरों में इस्तेमाल होने वाले कई उत्पाद भी ऐसे रसायन छोड़ सकते हैं जो प्रदूषण में योगदान करते हैं. पेंट और उसमें इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट से निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) इसका उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि आम लोगों को प्रदूषण के कई ऐसे स्रोतों की जानकारी नहीं होती, जिनका सामना वे रोजाना करते हैं.उन्होंने जल प्रदूषण के संदर्भ में दवाओं के अवशेषों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक कई दवाएं शरीर में पूरी तरह मेटाबोलाइज नहीं होतीं और सीवेज के माध्यम से जल स्रोतों तक पहुंच सकती हैं। यानी प्रदूषण केवल हवा की समस्या नहीं है, बल्कि हवा, पानी और मिट्टी—तीनों स्तरों पर इसके प्रभाव को समझने की जरूरत है.15-25 साल बाद स्थिति और भयावह होने की आशंकाप्रो. सिंह ने चेतावनी दी कि यदि प्रदूषण को लेकर समाज में जागरूकता नहीं बढ़ाई गई और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले 15 से 25 वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है. उन्होंने कहा कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है.ALSO READ : बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगानपहली कक्षा से बच्चों को दी जाए प्रदूषण की जानकारीप्रदूषण की रोकथाम के उपायों पर उन्होंने सबसे पहले जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया. उनका कहना है कि बच्चों को कम उम्र से ही प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में बताया जाना चाहिए. कक्षा एक से ही पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े विषयों को व्यवहारिक तरीके से समझाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी प्रदूषण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर अपनी भी जिम्मेदारी समझे.विशेषज्ञ का संदेश साफ है—शहर की हवा केवल मौसम से नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली, ट्रैफिक, निर्माण, कचरा प्रबंधन और जागरूकता से भी तय होती है. ऐसे में वाराणसी की गिरती रैंकिंग को महज आंकड़ा मानने के बजाय प्रदूषण के स्रोतों पर तत्काल काम करने की जरूरत है.
बीएचयू में स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता, 20 प्रतिभागियों ने रचनाओं से हिंदी और काशी का किया गुणगान
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वाराणसी : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में चल रहे हिंदी माह-2026 के तहत शनिवार को विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षण कार्मिकों के लिए स्वरचित हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। समिति कक्ष में आयोजित प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने अपनी मौलिक कविताओं के माध्यम से हिंदी, भारतवर्ष, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, काशी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विशेषताओं का भावपूर्ण वर्णन किया।प्रतियोगिता में कुल 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ करते हुए हिंदी भाषा के प्रति समर्पण और गौरव की भावना व्यक्त की। कविताओं में भारत की विविधता, काशी की सांस्कृतिक विरासत और महामना के योगदान को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। प्रतिभागियों ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को महामना के अभूतपूर्व प्रयासों का परिणाम बताते हुए इसे ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखने वाला संस्थान बताया।प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में प्रो. वशिष्ठ अनूप, डॉ. संजीव सराफ और प्रो. उर्वशी गहलौत शामिल रहे। निर्णायक मंडल ने प्रतिभागियों की कविताओं, प्रस्तुति और विषयवस्तु के आधार पर मूल्यांकन किया।कार्यक्रम के दौरान हिंदी अधिकारी डॉ. शिव कुमार त्रिपाठी ने निर्णायक मंडल के सदस्यों को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश सिंह ने किया, जबकि अंशुमान पटेल ने धन्यवाद ज्ञापित किया।ALSO READ : सुब्रतो कप में यूपी का दम दिखाएगी वाराणसी की टीमकार्यक्रम को सफल बनाने में सहायक कुलसचिव विकास कुमार, रामजी त्रिपाठी, कीर्ति शंकर दुबे, रागिब हुसैन और रोहित आनंद का सहयोग रहा।