अदालत में आगे बढ़ चुका है ज्ञानवापी का मामला, एसएसआई सर्वे में आए मत्वपूर्ण साक्ष्य सामने

वाराणसीः ज्ञानवापी मामले का हल निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सुलह-समझौते का निर्देश दिया है. मंगलवार को होने वाली मध्यस्तता में मुस्लिम पक्ष ने शामिल नहीं होने की घोषणा की है. वहीं ज्ञानवापी का मुकदमा अदालत में काफी आगे तक जा चुका है. अदालत के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने ज्ञानवापी परिसर के कई हिस्सों की जांच की है. इसकी रिपोर्ट अदालत में सौंप दी है. जांच में कई महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए हैं. अभी परिसर के कई हिस्सों की जांच बाकी है. इसकी मांग को लेकर अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल है. सबसे चर्चित मुकदमा पांच महिलाओं द्वारा ज्ञानवापी स्थित मां शृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन की मांग को लेकर है. इसमें 18 अगस्त 2021 को सिविल जज सीनियर डिविजन रविकुमार दिवाकर की अदालत में वाद दाखिल किया था.
अदालती आदेश पर ज्ञानवापी में अप्रैल 2022 में एडवोकेट कमिश्नर की कार्यवाही हुई. इसमें 16 मई को मंदिर पक्ष ने ज्ञानवापी की पानी टंकी में शिवलिंग जैसी आकृति मिलने की बात कही. इसी मुकदमे में अदालत के आदेश पर ज्ञानवापी परिसर में एएसआइ का सर्वे चार अगस्त 2024 से 91 दिन चला. रिपोर्ट जिला जज कोर्ट में दाखिल की गई. एएसआइ ने ज्ञानवापी परिसर में मौजूद इमारत की बाहरी दीवारों (खासतौर पर पश्चिमी दीवार), शीर्ष, मीनार, तलगृह में जांच की. रिपोर्ट में बताया कि ज्ञानवापी में विशाल मंदिर रहा होगा. मौजूद इमारत उसके अवशेष पर बनी है. देवी-देवताओं की मूर्तियां, कमल, घंटा, स्वास्तिक, डमरू, त्रिशूल के चिह्न समेत मंदिर के कई और साक्ष्य मिले हैं.
हिंदू पक्ष का दावा मंदिर तोड़कर बनाई गई वर्तमान इमारत
एसआई रिपोर्ट अनुसार मंदिर पक्ष का दावा है कि यहां आदिविश्वेश्वर का अष्टकोणीय विशाल मंदिर तोड़कर वर्तमान इमारत बनाई गई. जिला जज की अदालत में दाखिल मुकदमे की रिपोर्ट पर चर्चा शेष है. ज्ञानवापी स्थित जिन हिस्सों में जांच नहीं हो पाई उनमें पानी का टैंक (वजुखाना) है जिसमें मंदिर पक्ष शिवलिंग मिलने की बात कहता है। मंदिर पक्ष का दावा है कि पानी के टैंक में शिवलिंग मिला है तो नीचे उसका अरघा जरूर होगा. इसलिए टैंक व उसके नीचे एएसआइ सर्वे जरूरी है ताकि शिवलिंग और उसके नीचे अरघा की मौजूदगी स्पष्ट हो सके. ज्ञानवापी में मौजूद इमारत के मुख्य शिखर के नीचे, जहां मंदिर पक्ष स्वयंभू आदिविश्वेश्वर ज्योर्तिलिंग विद्यमान होने की बात कहता है, का भी एएसआइ से सर्वे के लिए स्थानीय अदालत व हाई कोर्ट में प्रार्थना पत्र दिया गया है.
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ज्ञानवापी में शुरू हुआ पूजा-पाठ
ज्ञानवापी से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला 31 जनवरी 2024 को आया था. पं. सोमनाथ व्यास के नाती शैलेंद्र पाठक द्वारा दाखिल मुकदमे में जिला जज डा. अजय कृष्ण विश्वेश ने ज्ञानवापी स्थित व्यासजी के तलगृह में विश्वनाथ मंदिर द्वारा नाम निर्दिष्ट पुजारी से नियमित पूजा-पाठ, राग-भोग की व्यवस्था का जिलाधिकारी को आदेश दिया था। अनुपालन में प्रशासन ने बैरिकेडिंग काटकर देर रात पूजा-पाठ का इंतजाम कर दिया।
1993 में ज्ञानवापी की बैरिकेडिंग की गई थी जिसके बाद व्यासजी के कमरे में आने-जाने पर रोक लग गई थी। वाराणसी की कोर्ट में चल रहा सबसे पुराना मुकदमा वर्ष 1991 में स्वयंभू विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की ओर पं. सोमनाथ व्यास व अन्य द्वारा दाखिल है।
एएसआई को परिसर में मिले हिंदू चिह्न
ज्ञानवापी में सर्वे पर एएसआई ने जो रिपोर्ट दिया उसके मुताबिक दीवारों पर उकेरी गईं हिंदू धर्म से संबंधित तस्वीरें और लिखे गए शब्द बता रहे हैं कि यह पूर्व में विशाल मंदिर रहा होगा. एएसआई की सर्वे रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार एक बीम पर नागरी लिपि में ‘कासी’ लिखा है. यह भी लिखा है कि यह 17वीं शताब्दी का है। इसकी तस्वीरें भी रिपोर्ट में हैं. एक अवशेष पर संस्कृत में श्रीमच्छा, पा भृगुवास, वद्विजातिश्च, आय अर्जानी, णरायै परोप, जातिभि: धर्मज्ञ: अंकित है. एएसआइ ने इसे 16वीं शताब्दी का अवशेष बताया है. ज्ञानवापी मुकदमे के वरिष्ठ वकील विष्णु शंकर जैन का कहना है कि एएसआई सर्वे के दौरान ज्ञानवापी में कई शिलालेख देखे गए. रिपोर्ट में सर्वेक्षण के दौरान 34 ऐसे शिलालेखों के मिलने की बात कही गई है जो पहले से मौजूद हिंदू मंदिरों के हैं और जिनका मौजूदा ढांचे के निर्माण और मरम्मत के दौरान दोबारा उपयोग किया गया है. इनमें देवनागरी, तेलुगु और कन्नड़ लिपियों के शिलालेख भी शामिल हैं. संरचना में पहले के शिलालेखों के पुन: उपयोग से पता चलता है कि पहले की संरचनाओं को नष्ट कर दिया गया था और उनके हिस्सों को मौजूदा संरचना के निर्माण में फिर से उपयोग किया गया. इन शिलालेखों में देवताओं के तीन नाम जैसे जनार्दन, रुद्र और उमेश्वर पाए गए हैं. देवनागरी, तेलुगु और कन्नड़ लिपियों के शिलालेख भी मिले हैं।
1993 में की गई ज्ञानवापी की बैरिकेडिंग
1993 के पहले ज्ञानवापी मस्जिद में नियमित श्रृंगार गौरी का दर्शन पूजन होता था और बाद में बैरिकेडिंग कर दी गई थी. इस बाबत हिंदू पक्ष का दावा है कि बिना किसी आदेश के मां श्रृंगार गौरी का दर्शन- पूजन रोक दिया गया था. ज्ञानवापी मस्जिद और श्रृंगार गौरी प्रकरण में वादी पक्ष की ओर से नियिमत दर्शन-पूजन की मांग की गई है. इसके लिए वादी पक्ष ने अपना तर्क भी अदालत में दिया था. वादी संख्या एक राखी सिंह के वकील मानबहादुर सिंह ने अदालत के सामने कहा था कि मां श्रृंगार गौरी का दर्शन-पूजन वर्ष 1993 से पहले तक नियमित होता था. इसके बाद मस्जिद की बैरिकेडिंग की गई. इससे मस्जिद की पश्चिमी दीवार पर मौजूद मां श्रृंगार गौरी की प्रतिमा भी बैरिकेडिंग के अंदर ही आ गई. इसके चलते दर्शनार्थियों को वहां जाकर दर्शन-पूजन करने से रोक दिया गया. जबकि बैरिकेडिंग कहां से आ गई? इस बारे में किसी तरह का कोई लिखित आदेश आज तक मौजूद नहीं है. वर्ष 1993 में उत्तर प्रदेश में जब प्रदेश के चुनाव हुए तो दिसंबर माह में मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी. उस समय केंद्र में पीवी नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार थी. मगर, बैरिकेडिंग किसके आदेश पर हुई और मां श्रृंगार गौरी का दर्शन-पूजन किसने आदेश से रोका गया यह जानकारी किसी को नहीं है. मगर, आज लगभग तीन दशक बाद भी बैरिकेडिंग पर सवाल बरकरार है.
सुलह-समझौत से दो मामलों को हल करने का प्रयास
सुप्रीम कोर्ट ने सुलह-समझौते से ज्ञानवापी के दो मुकदमों को हल करने का निर्देश दिया है. इसमें पहला मां शृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन का है। इसे हौजखास नई दिल्ली निवासी राखी सिंह, वाराणसी के सूरजकुंड लक्सा की लक्ष्मी देवी, सरायगोवर्धन चेतगंज की सीता साहू, मंजू व्यास, हनुमान पाठक की रेखा पाठक वादी के तौर पर हैं. इस मुकदमे में दूसरी ओर चीफ सेक्रट्ररी के माध्यिम से उत्तर प्रदेश सरकार, जिलाधिकारी वाराणसी, पुलिस कमिश्नर वाराणसी, ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद और श्री काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट को प्रतिवादी बनाया गया है. वही दूसरा मुकदमा शैलेंद्र पाठक की ओर से दाखिल किया गया था. इसमें जिला जज की अदालत ने ज्ञानवापी स्थित व्यासजी के तहखाने में पूजन-अर्चन का आदेश दिया है.



