विपक्ष मचाता रहा हल्ला, फिर भी पास होने से रूका नहीं 'जी राम जी' बिल

संसद में चल रहे मॉनसून सत्र के बीच आज विपक्ष ने जोरदार हंगामा काटा. इसकी वजह सदन में 'जी राम जी' बिल पेश किया गया है. जहां लोकसभा में आज 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी (VB-G RAM G) बिल पास हो गया है. इसी के चलते विपक्षी सांसदों ने बवाल काटते हुए केंद्र सरकार पर महात्मा गांधी का अपमान करने और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम यानि (MGNREGA) के प्रावधानों को कमज़ोर करने का आरोप लगाया है. जहां केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह ने विपक्ष को करारा जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस ने योजनाओं के नाम महात्मा गांधी के ऊपर नहीं बल्कि नेहरू परिवार के नाम पर रखा है. इतना ही नहीं, सरकार के इस फैसले का बचाव करते हुए शिवराज सिंह ने कहा कि "NREGA में महात्मा गांधी का नाम '2009 के चुनावों को ध्यान में रखकर' जोड़ा गया था." जिसके बाद महात्मा गांधी का नाम 2009 के चुनावों को देखते हुए NREGA में जोड़ दिया गया था.

विपक्ष ने लगाए नारे
वहीं विपक्षी सदस्यों ने 'जी राम जी योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए 'महात्मा गांधी का अपमान नहीं सहेगा' जैसे नारे लगाए. साथ ही इस बिल की कॉपियां तक फाड़ीं. जहां कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस कानून को गांधी का अपमान और रोजगार के अधिकार पर हमला बताया है. हालांकि, विपक्ष इससे पहले यह बिल वापस लेने की मांग करते हुए संसद परिसर के अंदर विरोध मार्च निकाला था, हैरानी इस बात की है कि विपक्ष के इतना हंगामा करने के बाद भी सरकार का कहना है कि यह बिल 125 दिनों के रोजगार की कानूनी गारंटी देने के साथ ही गांवों का पूरा विकास भी करेगा.

केंद्र सरकार ने 'जी राम जी' बिल को लेकर बताया कि यह योजना हर ग्रामीण परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य बिना किसी खास हुनर वाले शारीरिक काम के लिए भी स्वेच्छा से काम करते हैं, साथ ही यह बिल हर साल 125 दिनों के रोज़गार की कानूनी गारंटी देता है. इस बिल के तहत राज्यों को कानून लागू होने के छह महीने के अंदर अपनी योजनाओं को नए कानून के प्रावधानों के हिसाब से बनाना होगा. नए विधेयक के बारे में बोलते हुए ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह ने कहा, "हम बताना चाहेंगे कि इस नए विधेयक को लाने की जरूरत क्यों पड़ी. दरअसल, अपेक्षाकृत राज्यों के बीच फंड का बटवारा नहीं हो पा रहा था. मनरेगा में इस तरह की कई समस्याएं आ रही थीं. इस योजना में 60 प्रतिशत पैसा मजदूरी के लिए था और 40 प्रतिशत मैटेरियल के लिए था. मैटेरियल पर तो सिर्फ 26 प्रतिशत पैसा खर्च किया गया.

भष्टाचार के हवाले मनरेगा
ऐसे में ये साफ होता है कि मनरेगा को पूरी तरह से भष्टाचार के हवाले कर दिया गया था" जिसमें बदलाव करना काफी जरूरी हो गया था. मगर सच तो यह है कि मनरेगा योजना का मकसद ग्रामीणों को रोजगार देना है, पर इसमें भ्रष्टाचार और काम की गुणवत्ता पर हमेशा ही सवाल उठते रहे हैं, कई बार तो मजदूरों को अपने घर से ही फावड़ा, कुदाल जैसे औजार लाने पड़ते हैं, हालाँकि, मनरेगा के काम-काज वाले औजार भत्ता की मांग हमेशा उठती रही, जिसके चलते कुछ राज्यों में पुरी तो कही अधूरी ही रह गई. फिलहाल, सरकार कोई भी हो हर कोई मनरेगा योजना को अपने हिसाब से चलाना चाहता है पर कोई इस योजना से जुड़ने वाले ग्रामीणों के हक को ध्यान में रखते हुए इसमें सुधार करे तो काफी बेहतर होगा. पर अफसोस हमारे देश की सरकारे रोजगार में भी अपना फायदा चाहती है.



