तिब्बती चिकित्सा ग्लोबल वेलनेस इंडस्ट्री का बनेगी हिस्सा: राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने जताई उम्मीद.

वाराणसी। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन और केंद्रीय तिब्बती प्रशासन, धर्मशाला के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन अतिश सभागार में हुआ। समापन सत्र में विशेषज्ञों ने उम्मीद जताई कि करीब 2500 वर्ष पुरानी तिब्बती चिकित्सा पद्धति सोवा-रिग्पा आने वाले समय में वैश्विक वेलनेस इंडस्ट्री का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इसके लिए चिकित्सा पद्धति को वैज्ञानिक प्रमाण, मानकीकरण और संसाधनों के संरक्षण के साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।
संस्थान की कुलसचिव डॉ. सुनीता चंद्रा ने कहा कि संस्थान के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी का आयोजन यहां हुआ। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में भारत सरकार ने सोवा-रिग्पा को आयुष की छठी स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता दी। इससे पहले इसका प्रयोग मुख्य रूप से लद्दाख, लाहौल-स्पीति, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, दार्जिलिंग और धर्मशाला जैसे हिमालयी क्षेत्रों में होता था।
उन्होंने बताया कि सारनाथ स्थित केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में 45 बेड का यूथोक सोवा-रिग्पा मेडिकल कॉलेज एवं चिकित्सालय तैयार हो चुका है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि कैंसर, ऑटोइम्यून और मेटाबॉलिक जैसी बीमारियों में केवल एलोपैथी पर निर्भरता पर्याप्त नहीं है। ऐसे में तिब्बती चिकित्सा का ‘मन-शरीर-आत्मा’ आधारित समग्र दृष्टिकोण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
मानकीकरण से बढ़ेगी दवाओं की विश्वसनीयता
मुख्य वक्ता सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन, धर्मशाला के अध्यक्ष डॉ. थुपतेन कुनफेल ने कहा कि सोवा-रिग्पा अब केवल तिब्बती समुदाय की चिकित्सा पद्धति नहीं रह गई है, बल्कि इसे भारत की ज्ञान परंपरा के रूप में भी देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में इसे सिद्धा पद्धति के साथ आयुष कॉलेजों में पढ़ाया जा रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित अमची चिकित्सक तैयार होंगे।
उन्होंने कहा कि इस चिकित्सा पद्धति के सामने सबसे बड़ी चुनौती दवाओं का मानकीकरण रही है। अब लेह और वाराणसी स्थित संस्थानों में फार्माकोपिया, क्वालिटी कंट्रोल लैब और हर्बल गार्डन विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है। इससे दवाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बढ़ेगी तथा भविष्य में इनके निर्यात की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।
डॉ. कुनफेल ने कहा कि सोवा-रिग्पा को भविष्य में एलोपैथी के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि उसके पूरक चिकित्सा पद्धति के रूप में देखा जाना चाहिए। खासकर क्रॉनिक और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
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जीवनशैली में सुधार को बताया भविष्य की पहली दवा
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी ने कहा कि आधुनिक दुनिया लंबे समय तक चलने वाले तनाव, चिंता, ऑटोइम्यून समस्याओं और असंतुलित जीवनशैली से जूझ रही है। ऐसे में केवल एक अंग के इलाज के बजाय शरीर को समग्र रूप से स्वस्थ रखने का दृष्टिकोण जरूरी है।
उन्होंने कहा कि तिब्बती चिकित्सा का भविष्य किसी एक दवा में नहीं, बल्कि उसके समग्र दृष्टिकोण में है। भविष्य की चिकित्सा केवल मशीनों की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि जीवनशैली भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। आहार और व्यवहार में सुधार के साथ औषधि एवं बाह्य उपचार के माध्यम से स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने पर जोर दिया जाना चाहिए।
कार्यक्रम में सोवा-रिग्पा विभागाध्यक्ष डॉ. टाशी दावा ने स्वागत भाषण दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन संकाय प्रमुख डॉ. दोर्जे दमदुल ने किया। समापन सत्र में देश के विभिन्न हिस्सों से आए सैकड़ों प्रतिभागियों ने सहभागिता की।



