मशीनों और बाजार की मार से जूझते बुनकर, हुनरमंद हाथों पर मंडराया संकट

वाराणसी की पहचान बनारसी साड़ी और उसे बनाने वाले बुनकर आज मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. कभी करघों की आवाज से गूंजने वाली गलियां अब धीरे - धीरे शांत होती जा रही है. हाथ से बुनाई करने वाले कारीगर बदलते बाजार , मशीनों और बड़े व्यापार के बीच अपनी रोजी रोटी बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

मशीन से बनी साड़ियों की बढ़ी साडियां
कारीगर बताते हैं कि पहले करधे पर काम की कमी नहीं थी, और मेहनत का सही पैसा भी मिल जाता था. परिवार सम्मानपूर्वक चल जाता था, लेकिन अब मशीन से बानी साड़ियों की संख्या बढ़ गई है. जिससे पारम्परिक बुनकरों का काम घट गया और आमदनी लगातार कम होती चली गई. सालों से बुनाई कर रहे कारीगर बताते हैं, हाथ से बनाने वाली साडी में बहुत मेहनत लगती है.

कई बार महीने लग जाते हैं, लेकिन उससे मिलने वाले पैसे बहुत कम होते हैं. दिन भर करधे पर काम करने के बावजूद घर चलाना बहुत मुश्किल हो गया है. बुनकरों का कहना है की बाजार में ऊँचे दाम में बिकने वाली हैंडलूम साडी के दाम का बहुत छोटा सा हिस्सा उनको मिलता है.

कमाई घटने का असर कई परिवारों पर दिखा
कमाई घटने का असर सीधे उनके परिवारों पर देखने को मिल रहा है. कई बुनकरों को दूसरा काम का मजदूरी करनी पड़ रही है. बच्चो की पढाई , इलाज़ का दाम निकालना तक मुश्किल हो गया है. नई पीढ़ी भी इस काम में अधिक दिलचस्पी नहीं ले रही है क्योंकि इसमें कोई स्थाई कमाई नहीं है. धीरे - धीरे यह हुनर अपना अस्तित्व खोने के कगार पर है.

बाजार और तकनीक तेजी से आगे बढ़ गए लेकिन हस्तकरघा बुनकर उस रफ़्तार से आगे नहीं बढ़ पाए. वो ना तो बाजार तक अपनी सही पहुंच बना सके और ना ही अपनी श्रम का उचित मेहनताना तय कर सके. यही कारण है कि बनारस की पहचान रही बुनाई कला और बुनकर विलुप्त होने के कगार पर है.



