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मिस्टर बीस्ट से दो घंटे की बातचीत, फिर छोड़ी ₹26 लाख की नौकरी: कैसे हैरी उप्पल बने देश के बड़े फूड व्लॉगर...

Jul 13, 2026, 11:09 AM
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Posted By Diksha Mishra

बनारस पहुंचे चर्चित फूड व्लॉगर हैरी उप्पल ने टमाटर चाट, बाटी-चोखा और खिचड़ी की तारीफ करते हुए अपनी जिंदगी का वह किस्सा सुनाया, जिसने उन्हें बैंकिंग की सुरक्षित नौकरी छोड़कर कंटेंट क्रिएशन की अनिश्चित दुनिया में आने के लिए प्रेरित किया.


वाराणसी: देश के चर्चित फूड व्लॉगर हैरी उप्पल इन दिनों बनारस के स्वाद, संस्कृति और गलियों को करीब से समझ रहे हैं. शहर के अपने अनुभव पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बनारस में उन्हें सबसे ज्यादा टमाटर चाट पसंद आई. इसके बाद बाटी-चोखा और यहां की खिचड़ी ने भी उन्हें खासा प्रभावित किया.

हैरी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब तो मैं यह प्लान कर सकता हूं कि हर हफ्ते दिल्ली से फ्लाइट लेकर बनारस आऊं और बाटी-चोखा खाकर वापस चला जाऊं.”

लेकिन बनारस के खाने से शुरू हुई बातचीत जल्द ही हैरी उप्पल की उस असाधारण यात्रा तक पहुंच गई, जिसमें एक बैंक कर्मचारी ने सालाना ₹26 लाख का पैकेज छोड़ा और कैमरा उठाकर भारत की गलियों में निकल पड़ा.


कंटेंट क्रिएशन से पहले अमेरिकन एक्सप्रेस में करते थे नौकरी


हैरी उप्पल ने बताया कि कंटेंट क्रिएशन में आने से पहले वह बैंकिंग क्षेत्र में काम करते थे. वह अमेरिकन एक्सप्रेस से जुड़े हुए थे और संदिग्ध या असामान्य वित्तीय गतिविधियों वाले खातों की जांच उनकी जिम्मेदारियों का हिस्सा थी.नौकरी के दौरान ही उन्हें सोशल मीडिया, यूट्यूब और डिजिटल कंटेंट की आर्थिक संभावनाओं को समझने का अवसर मिला.

हैरी के अनुसार, उनकी जिंदगी बदलने वाला घटनाक्रम उस समय शुरू हुआ, जब उनके सामने एक ऐसा विदेशी अकाउंट आया, जिससे कथित तौर पर हर महीने लाखों डॉलर के कैमरा उपकरण खरीदे जा रहे थे.उन्होंने बताया, “हमारा काम यह देखना होता था कि किसी क्लाइंट के अकाउंट में कुछ गलत तो नहीं हो रहा. एक अकाउंट में लगातार बहुत महंगे कैमरा इक्विपमेंट खरीदे जा रहे थे. आम तौर पर ऐसा नहीं होता था, इसलिए मैंने क्लाइंट को फोन करके पूछा कि क्या ये सारे ऑर्डर उन्हीं की ओर से किए जा रहे हैं.”

क्लाइंट ने खरीदारी की पुष्टि कर दी, लेकिन हैरी की जिज्ञासा खत्म नहीं हुई.


“मुझे लगा कोई हॉलीवुड डायरेक्टर होगा”


हैरी ने बताया कि इतने बड़े स्तर पर कैमरा उपकरण खरीदे जाते देखकर उन्हें लगा कि सामने वाला व्यक्ति संभवतः हॉलीवुड का कोई अभिनेता, निर्माता या निर्देशक होगा.

उन्होंने क्लाइंट से पूछा कि वह आखिर ऐसा क्या काम करते हैं, जिसके लिए उन्हें इतने कैमरों और उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है.

हैरी के मुताबिक, जवाब मिला—“मैं यूट्यूब के लिए वीडियो बनाता हूं.”

इसके बाद जब हैरी ने उनसे नाम पूछा, तो उन्हें बताया गया कि वह MrBeast हैं.

हैरी उप्पल ने इंटरव्यू में दावा किया कि यह उस दौर की बात है, जब मिस्टर बीस्ट आज जितने बड़े वैश्विक क्रिएटर नहीं बने थे. उनके अनुसार, उस पेशेवर कॉल के दौरान मिस्टर बीस्ट ने उन्हें यूट्यूब से कमाई, वीडियो की रणनीति और कंटेंट से जुड़े कुछ टूल्स के बारे में विस्तार से समझाया.

उन्होंने कहा, “उन्होंने करीब दो घंटे का समय दिया. एक कीवर्ड टूल के बारे में बताया और उसका इनवाइट मेरे आधिकारिक ईमेल पर भेजा था. उसका स्क्रीनशॉट आज भी मेरे पास सुरक्षित है.”


मिस्टर बीस्ट की रणनीति से मिला निवेश का सबक


हैरी के अनुसार, मिस्टर बीस्ट उस समय अपने कंटेंट से मिलने वाले राजस्व का बड़ा हिस्सा दोबारा वीडियो प्रोडक्शन में लगा रहे थे.

इस बातचीत से उन्हें एहसास हुआ कि सफल कंटेंट क्रिएशन केवल कैमरे के सामने आने का काम नहीं है. इसमें योजना, तकनीक, डेटा, दर्शकों की समझ और लगातार निवेश की आवश्यकता होती है.

हैरी ने बताया, “मुझे लगा कि अगर सामने वाला अपने काम में इतना पैसा लगा रहा है, तो मुझे भी बिना तैयारी के नहीं उतरना चाहिए. इसके बाद मैंने अपनी सेविंग शुरू कर दी.”


चार साल तक सेविंग, फिर ₹26 लाख की नौकरी को अलविदा


हैरी ने बताया कि उन्होंने लगभग चार वर्षों तक आर्थिक तैयारी की.

वर्ष 2016 में उनका सालाना पैकेज करीब ₹26 लाख था, लेकिन उन्होंने गुरुग्राम की नौकरी छोड़कर अपने घर लौटने और पूर्णकालिक रूप से कंटेंट बनाने का फैसला किया.यह निर्णय केवल नौकरी छोड़ने तक सीमित नहीं था. उन्हें कैमरा चलाना, शूटिंग करना, फ्रेम बनाना और वीडियो की कहानी तैयार करना भी खुद सीखना पड़ा.

उन्होंने कहा, “मैंने यूट्यूब और इंटरनेट से सीखा कि कैमरा एंगल क्या होता है और वीडियो कैसे बनाया जाता है. मिस्टर बीस्ट से उस कॉल के बाद दोबारा कोई बात नहीं हुई, क्योंकि वह बैंक के क्लाइंट थे और वह एक प्रोफेशनल बातचीत थी.”


1,200 सब्सक्राइबर तक पहुंचने में लगे करीब तीन साल


आज किसी सफल क्रिएटर के लाखों फॉलोअर्स दिखाई देते हैं, लेकिन उसके शुरुआती वर्षों का संघर्ष अक्सर कैमरे के पीछे रह जाता है.

हैरी उप्पल ने बताया कि लगभग 1,200 सब्सक्राइबर तक पहुंचने में उन्हें ढाई से तीन साल का समय लग गया था.

इस दौरान परिचितों और आसपास के लोगों की टिप्पणियां भी मानसिक दबाव बढ़ाती थीं.

उन्होंने कहा, “लोग कहते थे कि तुम्हारी वीडियो देखी, उसमें दस लाइक आए थे. किसी वीडियो पर तीन लाइक थे और उनमें से एक लाइक मेरा अपना था. ऐसी बातें खराब जरूर लगती थीं, लेकिन मैंने काम बंद नहीं किया.”

शुरुआती दौर में हैरी एक बैग लेकर अलग-अलग जगहों पर लोगों से बात करने निकलते थे. कैमरा और बैग देखकर कई दुकानदारों को लगता था कि शायद वह गूगल मैप या किसी सर्वे टीम से आए हैं. इस कारण लोग खुलकर बात करने से भी हिचकिचाते थे.


पहली कमाई ₹25 हजार, अगले महीने पहुंची ढाई लाख


हैरी ने बताया कि यूट्यूब से उनकी पहली उल्लेखनीय कमाई लगभग ₹25 हजार से ₹27 हजार के बीच हुई थी.

जब उन्होंने यह बात अपने पिता को बताई तो उनके पिता ने गर्व से कहा कि यदि हर महीने इतनी कमाई होने लगे, तो उन्हें घर से जेब खर्च लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

हैरी के अनुसार, इसके अगले ही महीने उनकी आमदनी बढ़कर लगभग ढाई लाख रुपये तक पहुंच गई. उस समय उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर करीब सात हजार फॉलोअर्स थे.उनके लिए यह केवल कमाई नहीं थी. यह इस बात का प्रमाण था कि वर्षों की तैयारी, बचत और संघर्ष के बाद उनका फैसला परिणाम देना शुरू कर चुका था.


बचपन की चुनौती ने मुश्किल दौर में दिया साहस


हैरी ने बताया कि उन्हें बचपन से ही चुनौतियां पसंद रही हैं. बचपन में बढ़े हुए वजन के कारण उन्हें लोगों की टिप्पणियां और बुलिंग सहनी पड़ी थी. इसके बाद उन्होंने खुद को फिट बनाने का निर्णय लिया.

उन्होंने कहा कि उस अनुभव ने उन्हें यह सिखाया कि किसी कठिन परिस्थिति को शिकायत के बजाय चुनौती की तरह स्वीकार किया जा सकता है.

यही मानसिकता उन्हें कंटेंट क्रिएशन के शुरुआती वर्षों में भी आगे बढ़ाती रही.


नए क्रिएटर्स को सलाह—वही कीजिए जो कोई और नहीं कर रहा


कंटेंट क्रिएशन की दुनिया में प्रवेश करने वाले युवाओं को सलाह देते हुए हैरी ने कहा कि आज केवल दूसरों की नकल करके लंबे समय तक सफलता हासिल नहीं की जा सकती.

उन्होंने कहा, “जो कोई और नहीं कर रहा है, आपको वह करना चाहिए। मेरे शुरुआती कंटेंट की स्टोरीटेलिंग अलग थी. कंटेंट की कोई तय रूलबुक नहीं है. यहां आपको प्रयोग करने की पूरी आजादी है.”

हैरी के अनुसार, कैमरा उठाकर अपने आसपास की गलियों, बाजारों, लोगों और कहानियों को रिकॉर्ड करना ही शुरुआत का सबसे अच्छा तरीका हो सकता है.

उन्होंने कहा, “सिस्टम लिमिटलेस है. संभव है कि कई वर्षों बाद कंटेंट क्रिएशन पर कोई स्थापित रूलबुक लिखी जाए, लेकिन फिलहाल यह एक ऐसी दुनिया है, जहां नया करने की बहुत गुंजाइश है.”


“मुझे दस लाख सब्सक्राइबर में पांच-छह साल लगे, बनारस दो-तीन महीने में कर सकता है”


हैरी उप्पल ने बनारस के स्थानीय कंटेंट क्रिएटर्स के लिए भी बड़ा संदेश दिया.

उन्होंने कहा कि उन्हें दस लाख सब्सक्राइबर तक पहुंचने में लगभग पांच से छह वर्ष लगे, लेकिन बनारस के पास ऐसी संस्कृति, भोजन, गलियां, घाट, लोग और कहानियां हैं कि यहां का कोई गंभीर क्रिएटर सही रणनीति के साथ बहुत तेजी से अपनी पहचान बना सकता है.

उन्होंने कहा, “आप बनारस में हैं. यहां इतना कंटेंट है कि दस लाख सब्सक्राइबर तक पहुंचने के लिए दो-तीन महीने भी काफी हो सकते हैं—बस कहानी कहने का तरीका अलग होना चाहिए.”


एक बैंक कर्मचारी से फूड व्लॉगर बनने की कहानी


हैरी उप्पल की यात्रा केवल एक सुरक्षित नौकरी छोड़कर सोशल मीडिया पर आने की कहानी नहीं है. यह लंबी आर्थिक तैयारी, असफल शुरुआत, कम व्यूज, लोगों की टिप्पणियों और लगातार प्रयोग करते रहने की कहानी भी है.

बनारस में टमाटर चाट और बाटी-चोखा का स्वाद लेते हुए उन्होंने यह संदेश दिया कि डिजिटल दुनिया में अवसर जरूर हैं, लेकिन सफलता केवल वायरल वीडियो से नहीं आती.उसके पीछे वर्षों का धैर्य, आर्थिक अनुशासन, अलग स्टोरीटेलिंग और उस समय भी काम करते रहने का साहस होता है, जब वीडियो पर आने वाले तीन लाइक्स में से एक लाइक आपका अपना हो.



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इंटरव्यू की प्रमुख बातें


  1. हैरी उप्पल कंटेंट क्रिएशन से पहले अमेरिकन एक्सप्रेस में कार्यरत थे.
  2. वर्ष 2016 में उनका सालाना पैकेज करीब ₹26 लाख था.
  3. उन्होंने एक बैंकिंग कॉल के दौरान मिस्टर बीस्ट से बातचीत होने का दावा किया.
  4. नौकरी छोड़ने से पहले उन्होंने लगभग चार वर्षों तक सेविंग की.
  5. करीब 1,200 सब्सक्राइबर तक पहुंचने में उन्हें ढाई से तीन साल लगे.
  6. पहली उल्लेखनीय यूट्यूब कमाई लगभग ₹25–27 हजार रही.
  7. उनके अनुसार, अगले महीने उनकी कमाई करीब ढाई लाख रुपये तक पहुंच गई.
  8. बनारस में उन्हें टमाटर चाट, बाटी-चोखा और खिचड़ी सबसे अधिक पसंद आई.


नए क्रिएटर्स को उनकी सलाह है—नकल के बजाय अपनी अलग स्टोरीटेलिंग विकसित करें

सुब्रतो कप में यूपी का दम दिखाएगी वाराणसी की टीम
सुब्रतो कप में यूपी का दम दिखाएगी वाराणसी की टीम
वाराणसी : मैदान वही होगा, मुकाबला अंतरराष्ट्रीय स्तर का और चुनौती देश-विदेश की टीमों से. ऐसे में वाराणसी के युवा फुटबॉलरों के पास अपनी प्रतिभा दिखाने का बड़ा मौका है. 65वें सुब्रतो कप इंटरनेशनल फुटबॉल टूर्नामेंट में विकास इंटर कॉलेज की अंडर-17 बालक टीम उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करेगी. नई दिल्ली के अंबेडकर स्टेडियम में 15 सितंबर से शुरू होने वाली प्रतियोगिता के लिए टीम 13 सितंबर को रवाना होगी.प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन के लिए विकास इंटर कॉलेज की टीम ने जमकर पसीना बहाया है.शुक्रवार को 15 दिवसीय विशेष प्रशिक्षण शिविर का समापन हुआ। शिविर में खिलाड़ियों को कोच रशीद अनवर ने प्रशिक्षण दिया। इस दौरान खिलाड़ियों की तकनीक, पासिंग, गोल करने की क्षमता, फिटनेस और मैच की रणनीति पर विशेष जोर दिया गया.चिप शॉट से थ्रू पास तक पर जोरप्रशिक्षण शिविर में खिलाड़ियों को मैच की छोटी-छोटी बारीकियों से रूबरू कराया गया. विपक्षी खिलाड़ी को चकमा देकर चिप शॉट कब और किस स्थिति में लगाना है, इसका विशेष अभ्यास कराया गया. इसके अलावा साइड पास और थ्रू पास के दौरान गेंद की गति, दिशा और समय का ध्यान रखने की तकनीक भी सिखाई गई.मैच के दौरान अगर मुकाबला बराबरी पर खत्म होता है तो पेनल्टी शूटआउट भी निर्णायक हो सकता है. इसे देखते हुए खिलाड़ियों को पेनल्टी शूट लेने की तकनीक के साथ मानसिक रूप से दबाव संभालने का भी अभ्यास कराया गया. टीम प्रबंधन ने संभावित पेनल्टी शूटआउट के लिए खिलाड़ियों की भूमिका और क्रम पर भी तैयारी की है.ALSO READ : पिता की नगरी में विराजेंगे पुत्र गजानन, सोमवार को स्थापित होगी लालबाग के राजा की प्रतिमूर्तिउत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलने से टीम के खिलाड़ियों में खासा उत्साह है. 15 दिन के शिविर के दौरान खिलाड़ियों ने कठिन अभ्यास के साथ टीम गेम पर भी विशेष ध्यान दिया। अब टीम दिल्ली में अपने प्रदर्शन को लेकर तैयार है.विकास एजुकेशनल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. एके सिंह ने कहा कि टीम ने प्रतियोगिता के लिए पूरी मेहनत की है. हमारा प्रयास है कि खिलाड़ी दिल्ली में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करें और उत्तर प्रदेश के साथ वाराणसी का नाम भी रोशन करें.
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वाराणसी : काशी में एक बार फिर महाराष्ट्र की गणेश भक्ति की झलक देखने को मिलेगी। श्रीकाशी मराठा गणेश उत्सव समिति की ओर से 18वां श्रीगणेश उत्सव सोमवार से ठठेरी बाजार स्थित शेरवाली कोठी में शुरू होगा। पांच दिवसीय उत्सव के पहले दिन मुंबई के सुप्रसिद्ध लालबाग के राजा की प्रतिमूर्ति को मराठी परंपरा के अनुसार विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद स्थापित किया जाएगा। प्रतिमूर्ति रविवार को मुंबई से वाराणसी पहुंचेगी। आयोजन स्थल को भव्य तरीके से सजाया जा रहा है।सोमवार को सुबह गणेश भगवान की स्थापना और पूजा-अर्चना के साथ उत्सव की शुरुआत होगी। सुबह और रात नौ बजे महाआरती होगी। शाम छह बजे सुप्रसिद्ध भजन गायिका पूजा पांड्या भजनों की प्रस्तुति देंगी। इसके बाद शाम सात बजे जय पांडेय अपने साथियों के साथ भजन प्रस्तुत करेंगे।15 सितंबर को सुबह महाआरती के बाद शाम पांच बजे फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता और छह बजे 15 वर्ष तक के बच्चों की डांस प्रतियोगिता होगी। 16 सितंबर को शाम पांच बजे चित्रकला, छह बजे मेहंदी प्रतियोगिता और रात आठ बजे कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम होगा। 17 सितंबर को शाम पांच बजे हल्दी-कुमकुम, छह बजे विजय वाल्मीकि ग्रुप की झांकी और शाम 7:30 बजे छत्रपति शिवाजी महाराज सम्मान समारोह आयोजित होगा।ALSO READ : तिब्बती चिकित्सा ग्लोबल वेलनेस इंडस्ट्री का बनेगी हिस्सा: राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने जताई उम्मीद.18 सितंबर को सुबह नौ बजे महाआरती के बाद दोपहर 12 बजे भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी और गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। शोभायात्रा में महाराष्ट्र से आया 80 सदस्यीय दल विशेष प्रस्तुति देगा। समिति के अनुसार छह फीट ऊंची प्रतिमूर्ति मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से तैयार की गई है।समारोह के संचालन के लिए समिति में वरिष्ठ संरक्षक माणिक राव पाटिल, संरक्षक संतोष पाटिल व सुहास पाटिल, अध्यक्ष आनंद राव सूर्यवंशी, महामंत्री अन्ना मोरे, कोषाध्यक्ष हनुमान शिंदे, उपाध्यक्ष रवि सेठ, कार्यक्रम संयोजक चक्रवर्ती विजय नावड़ और मीडिया प्रभारी डॉ. कैलाश सिंह विकास समेत अन्य पदाधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। समिति ने श्रद्धालुओं से पांच दिवसीय गणेश उत्सव में शामिल होने की अपील की है।
तिब्बती चिकित्सा ग्लोबल वेलनेस इंडस्ट्री का बनेगी हिस्सा: राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने जताई उम्मीद.
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वाराणसी। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन और केंद्रीय तिब्बती प्रशासन, धर्मशाला के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन अतिश सभागार में हुआ। समापन सत्र में विशेषज्ञों ने उम्मीद जताई कि करीब 2500 वर्ष पुरानी तिब्बती चिकित्सा पद्धति सोवा-रिग्पा आने वाले समय में वैश्विक वेलनेस इंडस्ट्री का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इसके लिए चिकित्सा पद्धति को वैज्ञानिक प्रमाण, मानकीकरण और संसाधनों के संरक्षण के साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।संस्थान की कुलसचिव डॉ. सुनीता चंद्रा ने कहा कि संस्थान के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी का आयोजन यहां हुआ। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में भारत सरकार ने सोवा-रिग्पा को आयुष की छठी स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता दी। इससे पहले इसका प्रयोग मुख्य रूप से लद्दाख, लाहौल-स्पीति, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, दार्जिलिंग और धर्मशाला जैसे हिमालयी क्षेत्रों में होता था।उन्होंने बताया कि सारनाथ स्थित केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में 45 बेड का यूथोक सोवा-रिग्पा मेडिकल कॉलेज एवं चिकित्सालय तैयार हो चुका है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि कैंसर, ऑटोइम्यून और मेटाबॉलिक जैसी बीमारियों में केवल एलोपैथी पर निर्भरता पर्याप्त नहीं है। ऐसे में तिब्बती चिकित्सा का ‘मन-शरीर-आत्मा’ आधारित समग्र दृष्टिकोण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।मानकीकरण से बढ़ेगी दवाओं की विश्वसनीयतामुख्य वक्ता सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन, धर्मशाला के अध्यक्ष डॉ. थुपतेन कुनफेल ने कहा कि सोवा-रिग्पा अब केवल तिब्बती समुदाय की चिकित्सा पद्धति नहीं रह गई है, बल्कि इसे भारत की ज्ञान परंपरा के रूप में भी देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में इसे सिद्धा पद्धति के साथ आयुष कॉलेजों में पढ़ाया जा रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित अमची चिकित्सक तैयार होंगे।उन्होंने कहा कि इस चिकित्सा पद्धति के सामने सबसे बड़ी चुनौती दवाओं का मानकीकरण रही है। अब लेह और वाराणसी स्थित संस्थानों में फार्माकोपिया, क्वालिटी कंट्रोल लैब और हर्बल गार्डन विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है। इससे दवाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बढ़ेगी तथा भविष्य में इनके निर्यात की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।डॉ. कुनफेल ने कहा कि सोवा-रिग्पा को भविष्य में एलोपैथी के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि उसके पूरक चिकित्सा पद्धति के रूप में देखा जाना चाहिए। खासकर क्रॉनिक और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।ALSO READ : सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया के बीच सिर्फ व्यापार नहीं, डीएनए का भी नाता था: प्रो. ज्ञानेश्वर चौबेजीवनशैली में सुधार को बताया भविष्य की पहली दवासमापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी ने कहा कि आधुनिक दुनिया लंबे समय तक चलने वाले तनाव, चिंता, ऑटोइम्यून समस्याओं और असंतुलित जीवनशैली से जूझ रही है। ऐसे में केवल एक अंग के इलाज के बजाय शरीर को समग्र रूप से स्वस्थ रखने का दृष्टिकोण जरूरी है।उन्होंने कहा कि तिब्बती चिकित्सा का भविष्य किसी एक दवा में नहीं, बल्कि उसके समग्र दृष्टिकोण में है। भविष्य की चिकित्सा केवल मशीनों की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि जीवनशैली भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। आहार और व्यवहार में सुधार के साथ औषधि एवं बाह्य उपचार के माध्यम से स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने पर जोर दिया जाना चाहिए।कार्यक्रम में सोवा-रिग्पा विभागाध्यक्ष डॉ. टाशी दावा ने स्वागत भाषण दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन संकाय प्रमुख डॉ. दोर्जे दमदुल ने किया। समापन सत्र में देश के विभिन्न हिस्सों से आए सैकड़ों प्रतिभागियों ने सहभागिता की।