संरक्षक की भूमिका निभाने वाले मेला, मंदिर से भी पशु पहुंच रहे कत्लखाने...

वाराणसीः पशुओं के सरंक्षण में मंदिरों व मेला का बहुता महत्व है. भारत में पशुओं के संरक्षक, कल्याण और व्यापार से जुड़े कई प्रमुख मंदिर और ऐतिहासिक पशु मेला हैं. इनका उद्देश्य मानव जीवन के लिए उपयोगी गोवंश को संरक्षित करना है. तस्करों ने इन्हें भी नहीं छोड़ा है. कुछ मंदिर व मेलों के जरिए भी पशु कत्लखाने पहुंच रहे हैं. गो तस्करी रोकने के लिए लगातार प्रयास कर रहे गो ज्ञान फाउंडेशन ने ऐसे कई जगहों से पशुओं को रिकवर करके सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया है.
पूरे देश में पशु मेला का आयोजन न केवल पशुओं के रक्षक और पोषण के प्रतीक है, बल्कि देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है. बिहार का सोनपुर पशु मेला विश्व प्रसिद्ध है. गंगा और गंडक नदी के संगम पर स्थित यह एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है. हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले इस मेले की शुरुआत हरिहरनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ होती है. उत्तर प्रदेश के आगरा में यमुना तट पर स्थित बटेश्वर में 101 प्राचीन मंदिर हैं.
यह स्थान बटेश्वर महादेव को समर्पित है जहां कार्तिक माह में विशाल पशु मेला आयोजित किया जाता है. इस पशु मेला को बटेश्वर मेला के नाम जाना जाता है. राजस्थान का पुष्कर मेला विश्व प्रसिद्ध है. इसकी शुरुआत ब्रह्मा मंदिर के दर्शन और पवित्र सरोवर में डुबकी लगाने से होती है. यहां ऊंट, घोड़ों और मवेशियों का सबसे बड़ा व्यापार होता है. राजस्थान के ही पाली ज़िले के सांडेराव में निम्बेश्वर महादेव पशु मेला का आयोजन किया जाता है.
इस ऐतिहासिक मेले में पुंगनूर और गिर जैसी दुर्लभ नस्ल के गोवंश का संरक्षण और प्रदर्शनी होती है. कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर बलिया में लगने वाला ददरी मेला भारत के सबसे बड़े पशु मेलों में से एक है. यहाँ दूर-दूर से व्यापारी पशुओं की खरीद-फरोख्त के लिए आते हैं. वहीं पशुओं का संरक्षण करने वाले मंदिरों की बात करें तो वाराणसी में मौजूद काल भैरव मंदिर इसके लिए प्रसिद्ध है. काल भैरव को काशी का कोतवाल और पशुओं का रक्षक माना जाता है. उनकी कृपा के बिना बेज़ुबान जानवरों की सेवा करना असंभव माना जाता है. इसी तरह केरल का
मन्नारसला श्री नागराज मंदिर है. अलप्पुझा में स्थित यह मंदिर नाग देवता को समर्पित है, जहां श्रद्धालु सांपों की रक्षा और पूजा करते हैं. गो ज्ञान फाउंडेशन के लोगों की मानें तो जिस वक्त में मेला का आयोजन किया जाता है पशु तस्कर पिकप जैसी छोटी गाड़ियों में चार-छह पशुओं को लेकर मेला में शामिल होते हैं. यहां से उन्हें कत्ल करने के लिए कत्लखानों में भेजा जाता है. इस तरह वह पुलिस की पकड़ से बाहर हो जाते हैं. हालांकि यह तरीका पशु तस्करों को थोड़ा महंगा पड़ता है. इस तरीके का उपयोग तभी हो पाता है जब मेला आयोजन का समय होता है. पशु तस्करों को खास ध्यान उत्तर प्रदेश
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और बिहार के पशु मेला पर रहता है. इस दौरान तस्करों की आमद-रफ्त बढ़ जाती है. गो ज्ञान फाउंडेशन के बिहार के कई मेला में कत्ल के लिए लाए गए पशुओं को रिकवर किया. संस्था के लोगों का कहना है कि पटना में एक शिव मंदिर में शिवरात्रि पर स्थानीय लोग पशुओं को भगवान को समर्पित करते हैं. लोग बछड़ा व पड़ाव मंदिर परिसर में ले आते हैं. बलि के रूप में उनके कान का कुछ हिस्सा काटकर उन्हें छोड़ दिया जाता है. उनके खाने-पीने का कुछ इंतजाम नहीं करते हैं. कुछ दिनों बाद मंदिर के जुड़े कुछ लोग इन पशुओं को उन लोगों के हाथों में बेच देते हैं जो उन्हें स्लाटर हाउस तक पहुंचा देते हैं. संस्था ने पिछले साल चार सौ पशुओं को यहां से रिकवर किया था.



