बनारस लिटरेचर फेस्ट–4: डॉ. नीरजा माधव के ‘राइडिंग द टाइगर’ पर बौद्धिक संवाद”

वाराणसी : बनारस लिटरेचर फेस्टिवल–4 के तीसरे एवं अंतिम दिन रविवार को ताज गंगेज स्थित ज्ञान गंगा मंच (दरबार हॉल) बौद्धिक विमर्श की उजास से आलोकित हो उठा. अवसर था प्रख्यात लेखिका एवं साहित्यकार डॉ. नीरजा माधव के चर्चित उपन्यास ‘राइडिंग द टाइगर : शोध छात्र की डायरी’ पर केंद्रित संवाद सत्र का, जिसमें विश्वविद्यालयी जीवन की अंतर्धाराओं को विचारों की रोशनी में पढ़ा और परखा गया.
इस संवाद में प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रोफेसर सुरेंद्र प्रताप सिंह तथा हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर प्रोफेसर इंदीवर ने उपन्यास के विविध पक्षों पर गंभीर दृष्टि डाली। सत्र का कुशल संचालन विशाल ने किया. आरंभ में बनारस लिट् फेस्ट के अध्यक्ष डॉ. दीपक मधोक ने मंचस्थ अतिथियों का सम्मान कर संवाद की गरिमामय शुरुआत की.इस अवसर पर श्रीमती भारती मधोक की उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही.
संवाद सत्र में सर्वप्रथम लेखिका डॉ. नीरजा माधव ने उपन्यास की रचना–भूमि स्पष्ट करते हुए कहा कि आज का युवा दो स्पष्ट वर्गों में विभक्त दिखाई देता है. एक, जो पुश्तैनी दायित्वों को निभाने में संलग्न है, और दूसरा, जो सपनों की गठरी कंधे पर उठाए विश्वविद्यालयों की देहरी लांघता है. किंतु प्रवेश के साथ ही उसके सम्मुख चुनौतियां, असंतोष, आक्रोश और भविष्य की अनिश्चितता आकार लेने लगती है.उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद रोजगार को लेकर आश्वस्त न हो पाना आज के छात्र की सबसे बड़ी त्रासदी है.
उन्होंने कहा कि यद्यपि यह उपन्यास काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को केंद्र में रखकर रचा गया है, किंतु वह किसी एक संस्था या एक छात्र की कथा नहीं, बल्कि देश–विदेश के विश्वविद्यालयों में पल रही व्यापक छात्र–चेतना का प्रतीकात्मक आख्यान है। इसमें विश्वविद्यालय के आंतरिक परिदृश्य, राजनीतिक हलचलों और वैश्विक संदर्भों को समेटने का ईमानदार प्रयास किया गया है.
प्रोफेसर इंदीवर ने उपन्यास पर अपने विचार रखते हुए कहा कि इसे पढ़ते हुए उन्हें निरंतर कौतूहल और विस्मय का अनुभव हुआ. यह कृति आज के विश्वविद्यालयों में घटित यथार्थ का निर्भीक और बिना आवरण का चित्र प्रस्तुत करती है। उन्होंने रेखांकित किया कि विश्वविद्यालय केवल ज्ञान का परिमार्जन नहीं करता, बल्कि युवा व्यक्तित्व का निर्माण करता है, उसके भविष्य की रूपरेखा गढ़ता है और इस प्रक्रिया में संस्थान तथा विद्यार्थी, दोनों की समान भूमिका होती है.
वहीं प्रोफेसर सुरेंद्र प्रताप सिंह ने इसे हिंदी साहित्य में एक विरल उपलब्धि बताते हुए कहा कि संभवतः यह पहला ऐसा हिंदी उपन्यास है, जिसने बीएचयू को प्रतीक बनाकर समूचे विश्वविद्यालयी तंत्र को उद्घाटित किया है. इस कृति के माध्यम से पाठक न केवल शैक्षणिक परिवेश, बल्कि देश–दुनिया के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को भी समझने की कोशिश करता है.
उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. नीरजा माधव ने अपने विशिष्ट लेखकीय साहस और ईमानदारी के साथ व्यवस्था की विसंगतियों पर चोट की है.साथ ही यह संकेत भी दिया कि हमारे समाज में लिंग–भेद की जड़ें अब काफी हद तक कमजोर हुई हैं, जिसकी स्पष्ट झलक समकालीन लेखन, साहित्य और कला के क्षेत्र में दिखाई देती है.
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कुल मिलाकर, ‘राइडिंग द टाइगर’ न केवल एक उपन्यास है, बल्कि विश्वविद्यालयी जीवन की धड़कनों, संघर्षों और स्वप्नों का सशक्त दस्तावेज़ भी है जिसे बनारस लिट् फेस्ट–4 ने विचारोत्तेजक संवाद के माध्यम से पाठकों के समक्ष जीवंत कर दिया.

