चांद पर घर बसाने की तैयारी: IIT BHU ने तैयार की चंद्रमा की मिट्टी, अब होगी धातु निकालने और 3D प्रिंटिंग की रिसर्च

वाराणसी: भारत के 2047 तक चंद्रमा पर दीर्घकालिक मानव उपस्थिति के विजन को साकार करने की दिशा में IIT (BHU) के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, संस्थान के शोधकर्ताओं ने चंद्रमा की मिट्टी (लूनर रेजोलिथ) का कृत्रिम नमूना यानी लूनर सिमुलेंट तैयार किया है, इस सिमुलेंट की मदद से अब चंद्रमा की मिट्टी से धातु निकालने और 3D प्रिंटिंग के जरिए ईंट, निर्माण सामग्री तथा अन्य उपयोगी संरचनाएं विकसित करने पर शोध किया जाएगा, इस परियोजना में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) भी सहयोग कर रहा है.
मेटालर्जिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. के.के. सिंह ने बताया कि भारत का लक्ष्य 2047 तक चंद्रमा पर लंबे समय तक मानव उपस्थिति सुनिश्चित करना है, ऐसे में वहां उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर निर्माण सामग्री तैयार करना बेहद आवश्यक होगा। इसी उद्देश्य से टीम ने चंद्रमा की मिट्टी की रासायनिक और भौतिक विशेषताओं से मेल खाने वाला लूनर सिमुलेंट विकसित किया है.

उन्होंने बताया कि यह सिमुलेंट अमेरिका के अपोलो-16 मिशन से प्राप्त चंद्र मिट्टी के उपलब्ध वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है, इसे विकसित करने में करीब छह से सात महीने का समय लगा। कई बार असफलताओं के बाद प्राकृतिक खनिजों के सही अनुपात का चयन कर ऐसा नमूना तैयार किया गया, जिसकी रासायनिक संरचना और कणों का आकार वास्तविक चंद्र मिट्टी के काफी करीब है.
परियोजना से जुड़ी रिसर्च स्कॉलर रचिता भीम सिंह ने बताया कि चंद्रमा से बड़ी मात्रा में मिट्टी पृथ्वी पर लाना संभव नहीं है, इसलिए पहले उसका कृत्रिम नमूना तैयार किया गया है। अब इसी सिमुलेंट से एल्यूमिनियम, टाइटेनियम जैसे महत्वपूर्ण धातुओं को निकालने पर काम किया जाएगा। इसके लिए लगभग 1200 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर प्रयोग किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगले एक से डेढ़ वर्ष में इस दिशा में ठोस परिणाम मिलने की उम्मीद है.
शोधकर्ता अभिषेक सिंह ने बताया कि टीम अब इस सिमुलेंट से 3D प्रिंटिंग के लिए विशेष इंक विकसित कर रही है, शुरुआती नमूने तैयार किए जा चुके हैं, इसके सफल होने के बाद इसी सामग्री से ईंट, जियोपॉलीमर, सीमेंट और अन्य निर्माण सामग्री तैयार करने का प्रयास किया जाएगा, जिससे भविष्य में चंद्रमा पर रहने योग्य संरचनाएं बनाई जा सकें.
परियोजना से जुड़े 3D प्रिंटिंग विशेषज्ञ ने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती ऐसी इंक तैयार करना थी, जिसे मात्र 200 माइक्रोन की नोजल से नियंत्रित तरीके से बाहर निकाला जा सके। टीम ने नॉन-न्यूटोनियन फ्लूइड आधारित विशेष इंक विकसित कर इस चुनौती का समाधान किया है, भविष्य में इसी तकनीक का उपयोग चंद्रमा पर सीधे निर्माण कार्य के लिए किया जा सकेगा.
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प्रो. के.के. सिंह ने बताया कि इस बहुविषयक परियोजना में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के डॉ. पवन शर्मा 3D प्रिंटिंग तकनीक पर, जबकि केमिकल इंजीनियरिंग की प्रो. उदिता घोष सिमुलेंट की रियोलॉजिकल विशेषताओं पर काम कर रही हैं। तीनों वैज्ञानिक और शोधार्थी मिलकर इस परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं.
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह शोध सफल रहा तो भविष्य में चंद्रमा पर स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर भवन, उपकरण और अन्य आवश्यक संरचनाएं तैयार की जा सकेंगी। इससे भारत के भावी चंद्र अभियानों को नई तकनीकी मजबूती मिलेगी और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में देश की क्षमता और बढ़ेगी.



