बादलों को मिला मेंढक की शादी का निमंत्रण, जाने इसके पीछे की कहानी

भारत में मेंढक की शादी एक प्राचीन लोक परंपरा है, जो सूखे या देर से मानसून के दौरान बारिश लाने के लिए की जाती है. असम की भेकुली बिया से लेकर कर्नाटक के मंडूका परिणय तक, ये अनुष्ठान कई क्षेत्रों में प्रचलित हैं. ग्रामीण मानते हैं कि इससे वर्षा देवता प्रसन्न होते हैं, वैज्ञानिक इसे अंधविश्वास मानते हैं, पर ये समुदाय को एकजुट कर तनाव कम करते हैं और लोककथाओं को जीवित रखते हैं.

मेंढक मानसून से गहराई से जुड़े हुए हैं. मानसून ही उनका प्रजनन काल होता है, यहीं वो समय है जब वो टर्राते हैं और पानी में अंडे देते हैं. ग्रामीणों का विश्वास है कि उनकी शादी से मेंढक खुश होकर टर्राते हैं, जो वर्षा देवताओं जैसे इंद्र या वरुण को खुश करती है. यह रिवाज वेदों या पुराणों में कहीं भी लिखा हुआ नहीं है, बल्कि आदिवासी मान्यताओं, कृषि चिंताओं और स्थानीय हिंदू प्रथाओं का मिश्रण है.

कितना पुराना है रिवाज
मेंढक की शादी की शुरुआत मुख्य रूप से असम में मानी जाती है, जहां इसे 'भेकुली बिया' कहते हैं। यह सदियों पुरानी परंपरा है, जो ब्रिटिश काल से पहले की है. विद्वान इसे उत्तर-पूर्वी भारत की आदिवासी विश्वास प्रणालियों से जोड़कर देखते हैं. 1990 के दशक में लोककथा अध्ययनों में इसे असमिया संस्कृति के हिस्से के रूप में दर्ज किया गया. आज भी यह जीवित है, 2023 से 2025 तक असम के कामरूप, बिश्वनाथ और दर्रांग जिलों में ऐसे आयोजन हुए, जो जलवायु परिवर्तन के बीच पुरानी प्रथाओं की निरंतरता दिखाते हैं. असम से यह उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक तक फैली.

जाने कैसे होती है मेढक की शादी
रिवाज के मूल चरण एक जैसे हैं, मेंढकों को पकड़ना, पूजा करना, कपड़े पहनाना और जल में छोड़ देना। लेकिन इसमें भी क्षेत्रीय भिन्नताएं हैं. असम में भेकुली बिया में मेंढकों को हल्दी लगाई जाती है, असमिया कपड़े पहनाए जाते हैं, सिंदूर चढ़ाया जाता है. गांव ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं. भोज किया जाता है. गीत असमिया लोक साहित्य का हिस्सा हैं, जो मौखिक रूप से पीढ़ियों से चले आ रहे हैं.



