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दालमंडी चौडीकरण - विरोध के बीच चिन्हित भवनों पर नोटिस चस्‍पा, दुकानें रहीं बंद

दालमंडी चौडीकरण - विरोध के बीच चिन्हित भवनों पर नोटिस चस्‍पा, दुकानें रहीं बंद
Nov 11, 2025, 11:05 AM
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Posted By Gaandiv

वाराणसी - दालमंडी चौड़ीकरण के लिए की जा रही कार्रवाई के बीच लोगों का विरोध भी जारी है. मंगलवार को एक तरफ स्‍थानीय लोग काली पट्टी बांधकर विरोध जता रहे थे तो वहीं फोर्स के साथ पहुंचे अधिकारियों के नेतृत्व में टीम द्वारा नोटिस चस्पा करने की कार्रवाई की गई. दुकानें बंद कर लोग काली पट्टी बांधे हुए दिखे. दालमंडी चौड़ीकरण को लेकर एडीएम आलोक वर्मा, पीडब्लूडी के एक्सईएन केके सिंह, वीडीए के सचिव वेद प्रकाश मिश्रा फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे थे.


काली पट्टी बांधकर कर रहे विरोध


दालमंडी चौड़ीकरण के लिए की जा रही कार्रवाई के विरोध में मंगलवार को दालमंडी की सभी दुकानें बंद रहीं. इस दौरान लोग हाथ में काली पटी बांधकर घूमते दिखे. इसके साथ ही बीती रात नई सड़क पर जिस भवन को लेकर प्रशासन और भवन स्वामी के बीच नोकझोंक हुई थी, उस भवन पर भी नोटिस चस्पा की गई है.

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एक दिन पहले नहीं हो सकी बुलडोजर कार्रवाई


बता दें कि दालमंडी चौड़ीकरण और ध्वस्तीकरण अभियान में सोमवार देर शाम बुलडोजर की गूंज सुनाई दी थी. नई सड़क से दालमंडी मार्ग स्थित मकान संख्या C-1/24 के अतिक्रमण हटाने पहुंची प्रशासनिक टीम को स्थानीय लोगों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा. मकान मालिक अफजल खान ने हाईकोर्ट की रिट संख्या 12319/2025 (दिनांक 28 मई 2025) में मिले स्टे का हवाला देकर कार्रवाई रोकने की मांग की, जबकि प्रशासन ने स्पष्ट किया कि केवल सड़क की ओर निकले अवैध छज्जे-बालकनी और बारजा को हटाया जा रहा है. विवाद बढ़ने पर मौके पर एडीएम सिटी पहुंचे, लेकिन लोगों की भारी भीड़ ने उन्हें भी घेर लिया था. तीखी नोकझोंक और तू-तू मैं-मैं की स्थिति बन गई थी. माहौल बेकाबू होते देख पुलिस को लाठियां लहरानी पड़ीं. टीम मौके पर डटी रही, लेकिन बुलडोजर कार्रवाई शुरू नहीं हुई.


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BMC हार से तिलमिलाए राज ठाकरे, सामने आया रिएक्शन
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बृहन्मुंबई नगर निगम यानि (BMC) के सामने आए चुनावी नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत कर दी है. ठाकरे परिवार के हाथों से मुंबई महानगरपालिका की सत्ता जो छिन्न गई है. जी हां, चुनाव में मिली करारी हार के बावजूद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे दोनों ने ही 'मराठी मानुस' और 'क्षेत्रीय अस्मिता' के मुद्दे पर पीछे न हटने का संकल्प ले बैठे है. जहां राज ठाकरे ने चेतावनी देते हुए कहा कि, अगर मराठी लोगों के खिलाफ कुछ भी हुआ तो हम सत्ता में बैठे लोगों का ऐसा हाल करेंगे कि उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर होना ही पड़ेगा. क्योंकि, हमारा संघर्ष मराठी लोगों के लिए, मराठी भाषा के लिए, मराठी पहचान के लिए और एक समृद्ध महाराष्ट्र के लिए है और हमेशा रहेगा.यही संघर्ष हमारा अस्तित्व है. इसलिए इन मराठियों के हक के लिए हम हमेशा ही लड़ेगा, जरूरी नहीं कि ये हक की लड़ाई सत्ता में रहकर ही लड़ी जाए, बिना सत्ता के भी इस संघर्ष को जीता जा सकता है. इन बातों का मतलब साफ है, अक्सर सत्ताधारी ताकतें और उनके संरक्षण में रहने वाले लोग मराठियों का शोषण करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ेंगे. इसलिए, हमें अपने मराठी लोगों के साथ मजबूती से खड़ा रहना चाहिए, चुनाव तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारी सांसों में मराठी बसी है. वहीं, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने एक पोस्ट में दिवंगत बालासाहेब ठाकरे की तस्वीर साझा करते हुए लिखा, 'यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है', यह तब तक जारी रहेगी जब तक मराठी लोगों को वह सम्मान नहीं मिल जाता जिसके वे हकदार हैं.मराठियों के लिए संघर्ष का संकल्प जानकारी के मुताबिक, उद्धव ठाकरे की पार्टी ने 227 वार्डों में से 65 में जीत हासिल की है, अपने चाचा बाल ठाकरे के नक्शेकदम पर चलने वाले राज ठाकरे ने कहा कि इस हार का मतलब यह नहीं है कि हिम्मत हार जाएंगे और हार मान लेंगे. उन्होंने अपने राज्य और मराठियों के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया है.मराठी लोगों के साथ मजबूती से खड़ावहीं, राज ठाकरे ने आगे कहा कि चाहे एमएमआर क्षेत्र हो या पूरा राज्य, सत्ताधारी ताकतें मराठी लोगों को परेशान करने और उनका शोषण करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे. इसलिए, हमें अपने मराठी लोगों के साथ मजबूती से खड़ा रहना चाहिए. मुंबई चुनाव में मिली हार के बाद राज ठाकरे ने कहा कि हम उन सभी चीजों का विश्लेषण करेंगी और जो गलती हुई है, उसमें सुधार करेंगे। उन्होंने पार्टी को बिल्कुल नए सिरे से खड़ा करने का संकल्प लिया.
जनसंचार बनाम सोशल मीडिया : पत्रकारिता व्यक्ति-केंद्रित होती जा रही है - प्रो. केजी सुरेश
जनसंचार बनाम सोशल मीडिया : पत्रकारिता व्यक्ति-केंद्रित होती जा रही है - प्रो. केजी सुरेश
वाराणसी : बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग द्वारा आयोजित “सोशल मीडिया के युग में पत्रकारिता और जनसंचार में बदलते रुझान” विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन शनिवार को “जनसंचार बनाम सोशल मीडिया” विषय पर एक विचारोत्तेजक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया. इस सत्र के मुख्य वक्ता इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली के निदेशक प्रो. के. जी. सुरेश ने स्वयं को सोशल मीडिया का समर्थक बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने जनसंचार को नई दिशा दी है और मीडिया के लोकतंत्रीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कारण ऐसे कई मुद्दे सामने आए हैं जो अब तक मुख्यधारा मीडिया की दृष्टि से ओझल थे. इससे पत्रकारिता में नए आयाम स्थापित हुए हैं.हालांकि, प्रो. सुरेश ने सोशल मीडिया से जुड़ी चुनौतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया. उन्होंने कहा कि रील्स संस्कृति के कारण कंटेंट में सतहीपन बढ़ा है. एक मिनट में सब कुछ देखने की लालसा ने गुणवत्ता से समझौता कराया है. आज कंटेंट क्रिएशन का उद्देश्य केवल यूज़र को कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन पर रोकना बन गया है. उन्होंने चिंता जताई कि आज का युवा वर्ग गंभीर समाचार पत्रों से कटकर रील्स संस्कृति में उलझ गया है, जिससे ट्रिवियलाइजेशन बढ़ रहा है.उन्होंने कहा कि आज पॉडकास्ट और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की गुणवत्ता से अधिक व्यूज़ और मोनेटाइजेशन पर ध्यान दिया जा रहा है, जिससे पत्रकारिता व्यक्ति-केंद्रित होती जा रही है. विषयों के बजाय व्यक्तियों को महत्व देना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है. पत्रकारिता को बचाने के लिए व्यक्तित्व-प्रधान दृष्टिकोण से हटकर मुद्दा-प्रधान पत्रकारिता को पुनः स्थापित करना आवश्यक है.यूट्यूब पत्रकारिता में जिम्मेदारी और जवाबदेही का अभावसत्र के विशिष्ट वक्ता देश के प्रख्यात वरिष्ठ शिक्षाविद पूर्व कुलपति प्रो. के. वी. नागराज ने अपने वक्तव्य में कहा कि सोशल मीडिया आज मोबोक्रेसी का रूप लेता जा रहा है. उन्होंने कहा कि बड़े कारोबारी और कॉरपोरेट घराने विज्ञापनों के माध्यम से मीडिया को नियंत्रित कर रहे हैं. यूट्यूब पत्रकारिता पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें जिम्मेदारी और जवाबदेही का अभाव है.प्रो. नागराज ने कहा कि विकास के नाम पर समाज को पुनर्परिभाषित किया जा रहा है. तकनीक आज एक राक्षस बनती जा रही है, जिसे नियंत्रित करने के बजाय हम उसे स्वयं पर शासन करने दे रहे हैं. उन्होंने महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा- “समाज से जो श्रेष्ठ है, उसे निकालिए; विचारधारा अत्यंत आवश्यक है.” उनके अनुसार, बिना विचारधारा के संचार का कोई अर्थ नहीं है.उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया हमें एक प्रकार के कोकून में बंद कर रहा है, जहां सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप कम होता जा रहा है. शक्ति और असमानता के संबंध पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जहां शक्ति है, वहां समानता नहीं हो सकती. उन्होंने माना कि मीडिया में सकारात्मक और नकारात्मक- दोनों पहलू मौजूद हैं, लेकिन सामाजिक उत्तरदायित्व और जवाबदेही के बिना पत्रकारिता अपने उद्देश्य से भटक जाती है.विशेषज्ञों के वक्तव्य, कुल 180 शोध पत्रों का वाचनविभिन्न देशों से आए विषय विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में कुल 180 शोध पत्रों का वाचन किया गया, जिनमें डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और समकालीन पत्रकारिता से जुड़े विविध पहलुओं पर गंभीर विमर्श हुआ. अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं के सत्र में बॉयसी यूनिवर्सिटी, अमेरिका की डॉ. इरीना बाबिक ने कहा कि डिजिटल मीडिया ने संचार को अधिक सहभागी और त्वरित बनाया है, किंतु विश्वसनीयता और तथ्यात्मकता बनाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. उन्होंने मीडिया साक्षरता को समय की अनिवार्य आवश्यकता बताया.लोमोनोसोव मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी, रूस की डॉ. अन्ना ग्लैडकोवा ने कहा कि सोशल मीडिया ने वैश्विक संवाद को नई गति प्रदान की है, लेकिन एल्गोरिद्म आधारित कंटेंट के कारण समाज में ध्रुवीकरण भी बढ़ रहा है. उन्होंने संतुलित और जिम्मेदार पत्रकारिता की आवश्यकता पर बल दिया.ALSO READ : मणिकर्णिका विवाद - कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन, राघवेंद्र चौबे समेत कई हिरासत मेंत्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू (नेपाल) के डॉ. कुंदन आर्याल ने कहा कि विकासशील देशों में सोशल मीडिया ने जनभागीदारी को बढ़ावा दिया है, परंतु नैतिक पत्रकारिता और सामाजिक उत्तरदायित्व के अभाव में यह माध्यम भ्रामक सूचनाओं का कारण भी बन सकता है. यूनिवर्सिटी ऑफ लिबरल आर्ट्स, बांग्लादेश के प्रो-वाइस चांसलर डॉ. जूड विलियम जेनिलो ने कहा कि संचार का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज में संवेदनशीलता और समावेशिता का विकास करना भी है.इस दौरान प्रमुख रूप से प्रोफेसर ओपी सिंह, प्रोफेसर अंबरीश सक्सेना, प्रोफेसर अनिल उपाध्याय, डॉ रउमाशंकर पांडेय, डॉ शोभना नेरलीकर, डॉ नेहा पांडेय, डॉ धीरेंद्र राय, डॉ संतोष शाह, डॉ स्मिति पाढ़ी सहित सभी प्रतिभागी उपस्थित रहे.
आखिर इत्ते सालों से खामेनेई कैसे कर रहे ईरान पर कब्जा, जाने राज
आखिर इत्ते सालों से खामेनेई कैसे कर रहे ईरान पर कब्जा, जाने राज
ईरान इस वक्त बड़े उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. जहां अयातुल्लाह खामेनेई सरकार के खिलाफ कई दिनों से विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, हजारों की संख्या में महिलाओं से लेकर युवा तक खुलकर सड़कों पर उतरकर हिंसा प्रदर्शन करने को मजबूर हो चुके हैं, इन विरोध प्रदर्शन में अब तक हजारों लोगों की मौत हो चुकी है. ईरान में खामेनेई शासन के खिलाफ भड़के हिंसा प्रदर्शनों के बीच भारतीय नागरिकों को लेकर आई पहली दो वाणिज्यिक उड़ानें बीती रात राजधानी दिल्ली जा पहुंचीं, ईरान से लौटी एक यात्री ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि, प्रदर्शन काफी उग्र थे, आगजनी भी देखी गई, लेकिन शासन समर्थकों की मौजूदगी के बाद भी हालात काबू में नहीं आते नजर आ रहे थे, जो किसी डरावनी स्थिति से कम नहीं.हालांकि, ईरान के दुखद हालात को देखते हुए भारतीय सरकार किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार होने के साथ ही अपने नागरिकों को गैर-जरूरी यात्रा करने से बचने की सलाह भी दे चुकी है. वहीं बिगड़ते हालात को खामेनेई के सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने ईरान की स्थिति को और भी तनावपूर्ण बना दिया है. जहां अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रंप की तीखी बयानबाजी भी शुरू हो गई, जिससे यह माना जा रहा है कि अब ईरान की राजनीति में एक बड़ा तूफान आने वाला है. दूसरी ओर ये भी संकेत मिल रहे कि स्थिति कुछ हद तक शांत हो रही है. क्योंकि ट्रंप ने अपना आक्रामक रुख नरम किया है.36 साल से सत्ता को संभालने का क्या है राज आपको बता दें कि, चार दशक बाद भी अमेरिका और इजराइल को ईरान की मौजूदा व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती लगती है. लेकिन इस व्यवस्था को हिलाना इतना मुश्किल नहीं, क्योंकि इसके मजबूत बुनियाद ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई है, जो 36 साल से भी ज्यादा वक्त से सत्ता को संभाले बैठे हैं. विरोध चाहे जितना भी हो, अंतरराष्ट्रीय दबाव कितना भी बढ़ जाए, पर किसी भी हाल में खामेनेई का सिस्टम इसलिए नहीं डगमगा सकता क्योंकि इसके पास वह ढांचा है जिसे ईरान की असली ताकत माना जाता है.ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई एक मजबूत राजनीतिक विशेषज्ञ है, इस सरकार की मजबूती का राज ईरान के उस राजनीतिक ढांचे में छिपा है, जिसे समझना थोड़ा मुश्किल तो है पर ईरान की मजबूती पकड़ से कम नहीं हैं. इस ढांचे की शुरुआत 1979 की क्रांति से होती है, जब ईरान में एक अनोखा पद बनाया गया. रहबर-ए-आला, यानी सुप्रीम लीडर. यह सिर्फ राजनीतिक पद नहीं था, बल्कि राष्ट्र का धार्मिक मार्गदर्शक भी माना गया. इसलिए यह पद राष्ट्रपति से कई गुना शक्तिशाली हो गया. सेना, विदेश नीति, खुफिया एजेंसियां, न्यायपालिका, मीडिया. सबके फैसलों की अंतिम मंजूरी सुप्रीम लीडर के हाथ में समा बैठी है.अब सवाल उठता है कि इतनी ताकत किसे मिलती है और किसके पास यह अधिकार है कि वह ईरान का सबसे बड़ा नेता चुन सके.जाने कैसे टिकी है खामेनेई की कुर्सीबड़ी बात तो यह है कि, इस काउंसिल के ज्यादातर सदस्य सीधे या परोक्ष रूप से सुप्रीम लीडर द्वारा ही नियुक्त होते हैं. यानी जो संस्था सुप्रीम लीडर को चुनने वालों को मंजूरी देती है, वह खुद सुप्रीम लीडर के प्रभाव में होती है. इसी वजह से ईरान में सत्ता एक बंद घेरे की तरह काम करती है, जहां बाहर की ताकतों या विरोधी विचारों के लिए बहुत कम जगह बचती है. यही कारण है कि ईरान में सत्ता किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस पूरे ढांचे से चलती है जिसे खामेनेई सरकार ने दशकों में मजबूत बना रखा है, इसलिए उनकी कुर्सी आज भी ईरान की सत्ता में टिकी हुई हैं.