सावन में खिल उठी फूल मंडी, फूलों के कारोबार से जुड़े 500 किसान परिवार की बढ़ी आय...

वाराणसी:सावन की शुरुआत के साथ ही बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी पूरी तरह शिवमय हो गई है। काशी विश्वनाथ मंदिर समेत शहर के छोटे-बड़े सभी शिवालयों में फूलों और विशेष मालाओं से भव्य श्रृंगार किया जा रहा है। बाबा भोलेनाथ को प्रिय बेलपत्र, धतूरा, मदार और नीलकंठ की मालाओं की मांग बढ़ने से बनारस की सबसे पुरानी बांसफाटक फूल मंडी में कारोबार दोगुना हो गया है।
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में श्रद्धालु घरों और मंदिरों में पूजा-अर्चना के लिए सुगंधित फूल, मालाएं और पूजन सामग्री की जमकर खरीदारी कर रहे हैं। इसका सीधा असर फूल कारोबार पर देखने को मिल रहा है। बांसफाटक स्थित फूल मंडी सुबह से देर रात तक ग्राहकों से गुलजार है।
फूल मंडी के संचालक एकांश अग्रवाल ने बताया कि सावन शुरू होने से पहले ही मंदिरों के श्रृंगार की एडवांस बुकिंग शुरू हो जाती है। केवल वाराणसी ही नहीं, बल्कि पूर्वांचल के कई जिलों से भी विशेषकर सावन के सोमवार के लिए मालाओं और फूलों के ऑर्डर आते हैं।
उन्होंने बताया कि कछवा, सारनाथ, चिरईगांव, संदहा, जालूपुरा और भगवानपुर समेत आसपास के गांवों से किसान अपने खेतों और बगीचों के फूल लेकर मंडी पहुंचते हैं। पूरा परिवार मिलकर मालाएं तैयार करता है और उन्हें बेचकर आजीविका चलाता है। इस मंडी से करीब 200 से 300 परिवार जुड़े हुए हैं। सावन में प्रतिदिन चार से पांच क्विंटल बेलपत्र की बिक्री हो जाती है।
इस बार लगातार गर्मी और बारिश के कारण फूलों का उत्पादन प्रभावित हुआ है। जो फूल तैयार हो रहे हैं, वे भी जल्दी खराब हो रहे हैं। उत्पादन कम और मांग अधिक होने से फूलों और विशेष मालाओं के दामों में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई है।
आम दिनों में 50 से 60 रुपये में बिकने वाली मदार की माला सावन में 100 से 120 रुपये प्रति पीस बिक रही है। धतूरा 500 से 600 रुपये, बेलपत्र 250 से 300 रुपये प्रति किलो, जबकि सामान्य दिनों में 20 रुपये की नीलकंठ माला अब 50 से 80 रुपये प्रति पीस तक पहुंच गई है। छोटी फूल मालाएं भी 30 से 50 रुपये प्रति पीस बिक रही हैं। व्यापारियों का कहना है कि यदि मौसम की स्थिति ऐसी ही रही तो आने वाले दिनों में कीमतें और बढ़ सकती हैं।
फूल व्यापारी सुनील गुप्ता ने बताया कि बांसफाटक मंडी काशी की सबसे पुरानी फूल मंडी है। यहां बनने वाली पारंपरिक मालाएं अन्य कहीं आसानी से नहीं मिलतीं। वाराणसी के प्रमुख मंदिरों—काशी विश्वनाथ, संकट मोचन, दुर्गाकुंड, महामृत्युंजय समेत कई प्रमुख शिवालयों में इसी मंडी से फूल और मालाएं भेजी जाती हैं। यहां सभी धर्मों के लोग अपनी-अपनी आस्था के अनुसार फूल और मालाएं खरीदने आते हैं। उन्होंने कहा कि इस मंडी से कई परिवार तीन पीढ़ियों से जुड़े हैं और सावन का महीना उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण सीजन होता है।
किसान जितेंद्र कुमार मौर्य ने बताया कि मंडी से जुड़े लगभग 20 प्रतिशत किसान पंचकोशी क्षेत्र से आते हैं और कई परिवार पिछले 70 वर्षों से इस कारोबार से जुड़े हुए हैं। एक गजरा या विशेष माला तैयार करने में तीन से चार घंटे का समय लगता है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर भगवान के लिए मालाएं तैयार करते हैं और फिर उन्हें बेचने के लिए मंडी लेकर आते हैं।
सावन की शुरुआत के साथ काशी की फूल मंडी एक बार फिर आस्था और आजीविका का बड़ा केंद्र बन गई है। एक ओर जहां शिवभक्त बाबा के श्रृंगार के लिए विशेष फूल और मालाएं खरीद रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सैकड़ों किसान और फूल कारोबारियों के परिवारों की रोजी-रोटी भी इसी कारोबार पर निर्भर है। मौसम की मार से उत्पादन भले प्रभावित हुआ हो, लेकिन श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के चलते फूलों की मांग लगातार बनी हुई है। व्यापारियों का मानना है कि सावन के आगामी सोमवारों में मांग और बढ़ेगी, जिससे फूलों का कारोबार भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा।



