गरीब बच्चों की पढ़ाई का सहारा बनीं संतोषी शुक्ला
वाराणसी। आर्थिक तंगी और मुफलिसी के बीच कई बच्चों के लिए पढ़ाई का सपना अधूरा रह जाता है। खासकर स्लम बस्तियों में रहने वाले परिवारों के सामने रोजी-रोटी की चिंता इतनी बड़ी होती है कि बच्चों की शिक्षा पीछे छूट जाती है। ऐसे ही जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने का बीड़ा दीक्षा महिला कल्याण शोध संस्थान की संचालिका संतोषी शुक्ला ने उठाया है। वह न सिर्फ बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करा रही हैं, बल्कि उनके अभिभावकों को भी घर-घर जाकर यह समझाने का प्रयास करती हैं कि बच्चों का भविष्य बनाने के लिए पढ़ाई कितनी जरूरी है।
2012 से की शुरुआत आज 500 बच्चों को दे रहे निशुल्क शिक्षा
दीक्षा महिला कल्याण शोध संस्थान की शुरुआत वर्ष 2012 में लहुराबीर में पहली शाखा से हुई थी। हालांकि बाद में वहां बिल्डिंग बनने के कारण कोचिंग बंद हो गई। इसके बाद संस्था की ओर से हुकुलगंज और पंचकोशी पड़ाव समेत तीन स्थानों पर शिक्षण केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। वर्तमान में इन तीनों शाखाओं में करीब 500 बच्चे पढ़ रहे हैं। बच्चों को पढ़ाने के लिए संस्था में आठ शिक्षक कार्यरत हैं।
संतोषी शुक्ला बताती हैं कि जरूरतमंद बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा ने उन्हें इस काम की ओर प्रेरित किया। उनके शिक्षण केंद्रों में स्लम बस्तियों के अलावा मुस्लिम और अन्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भी पढ़ने आते हैं। इन परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना आसान नहीं होता। कई बच्चे पढ़ना तो चाहते हैं, लेकिन आर्थिक परिस्थितियां और पारिवारिक जिम्मेदारियां उन्हें स्कूल या कोचिंग तक पहुंचने से रोक देती हैं।
सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को पढ़ाना नहीं, अभिभावकों को समझाना है।
संतोषी शुक्ला कहती हैं कि स्लम इलाकों में काम करते समय कई बार बच्चों से ज्यादा उनके माता-पिता और अभिभावकों को समझाने की जरूरत पड़ती है। संस्था की टीम घर-घर जाती है, परिवारों से बातचीत करती है और उन्हें समझाती है कि बच्चों को पढ़ाई के लिए नियमित रूप से भेजना जरूरी है। कई बार अभिभावकों को यह समझाने में समय लगता है कि आज बच्चे की पढ़ाई पर किया गया प्रयास ही आगे चलकर उसके भविष्य को बेहतर बना सकता है।
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वह बताती हैं कि कई ऐसे बच्चे भी हैं जो पढ़ना चाहते हैं, लेकिन किसी कारण से शिक्षण केंद्र तक नहीं पहुंच पाते। ऐसे बच्चों तक पहुंचने और उन्हें पढ़ाई से जोड़ने की भी पूरी कोशिश की जाती है। संस्था का उद्देश्य सिर्फ बच्चों को कक्षा में बैठाना नहीं, बल्कि उन्हें लगातार पढ़ाई से जोड़े रखना और उनके भविष्य के लिए मजबूत आधार तैयार करना है।
फिलहाल बाढ़ के कारण भी बच्चों की संख्या प्रभावित हुई है। कई स्लम बस्तियों और गरीब परिवारों के घर बाढ़ से प्रभावित हैं, जिसके चलते बच्चे नियमित रूप से पढ़ने नहीं आ पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में भी संस्था की टीम अभिभावकों से संपर्क कर रही है और बच्चों को दोबारा पढ़ाई से जोड़ने का प्रयास कर रही है।
संतोषी शुक्ला का कहना है कि बच्चे का भविष्य उसकी आर्थिक स्थिति देखकर तय नहीं होना चाहिए। हर बच्चे को शिक्षा पाने का अधिकार है। इसी सोच के साथ संस्था लगातार उन बच्चों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, जिनके लिए पढ़ाई आज भी किसी चुनौती से कम नहीं है। उनके लिए यह पहल सिर्फ कोचिंग चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन परिवारों में शिक्षा के प्रति भरोसा पैदा करने की कोशिश है, जहां परिस्थितियों के कारण बच्चों की पढ़ाई अक्सर बीच में छूट जाती है।



