वाराणसी में बेटी ने निभाया बेटे का फर्ज, पिता को दी मुखाग्नि

वाराणसी: बेटा और बेटी को समान रूप से देखे जाने का उदाहरण एक बार फिर वाराणसी में सामने आया. एक परिवार में चार बेटे थे, लेकिन अंतिम समय में बेटों ने कंधा देने से मुह फेरा तो बेटी ही बेटा बन कर फर्ज अदायगी की. पूरा घटनाक्रम समाजसेवी अमन कबीर ने सोशल मीडिया पर साझा किया है. बताया कि गुरुवार की दोपहर 112 पुलिस से सूचना प्राप्त हुई कि अंधरापुल के नीचे एक युवती अपने पिता के शव के पास बैठी हुई है. बताया कि सूचना मिलते ही वह भी मौके पर पहुँचे. वहाँ पहुँचकर जब बेटी पूजा देवी से पूछा कि क्या परिवार में कोई और सदस्य है, तो उनकी आँखों में आँसू भर आए.

बेटी ने दिया पिता को मुखागिन
उन्होंने कहा, "मेरे चार भाई हैं, लेकिन पिताजी के निधन के लगभग छह घंटे बाद भी कोई नहीं आया. हमारे पास अंतिम संस्कार के लिए पैसे भी नहीं हैं. अगर कोई नहीं आएगा, तो मैं ही उनकी बेटी भी हूँ और बेटा भी. भैया, किसी तरह मेरे पिताजी को घाट तक पहुँचा दीजिए और उनका अंतिम संस्कार करा दीजिए." यह सुनकर मन भावुक हो उठा. संस्था के सहयोग से शव को वाहन द्वारा हरिश्चंद्र घाट पहुँचाया गया. वहाँ बेटी पूजा देवी ने अपने पिता को कंधा दिया और भारी मन से मुखाग्नि भी दी.
हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार
उस समय उनकी आँखों से बहते आँसू मानो यह कह रहे थे कि रिश्ते जन्म से नहीं, निभाने से बड़े होते हैं. लगभग 100 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके रंजन जायसवाल जी ने अपने बच्चों का पालन-पोषण कर उन्हें बड़ा किया, लेकिन जीवन की अंतिम यात्रा में उनके चार बेटे उपस्थित नहीं हुए. ऐसे समय में उनकी बेटी ने ही बेटे का फर्ज निभाया और अपने पिता को सम्मानपूर्वक पंचतत्व में विलीन किया. लोगों ने एक बेटी को मुखाग्नि देते देख कर कहा कि ईश्वर ऐसी साहसी, संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ बेटी हर परिवार को दे. अमन कबीर सेवा न्यास की ओर से भी पीड़िता को मदद दी गई और हरिश्चंद्र घाट पर पूर्ण सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की सेवा संपन्न कराई.
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