आठ साल पहले आज ही गैंगवार में ढेर हुआ था रईस बनारसी, वाराणसी से कानपुर तक रहा आतंक का पर्याय

वाराणसी : पूर्वांचल से लेकर कानपुर तक आतंक का पर्याय रहा कुख्यात बदमाश रईस अहमद उर्फ रईस सिद्दीकी उर्फ रईस बनारसी 14 सितंबर 2018 को वाराणसी के दशाश्वमेध थाना क्षेत्र के पातालेश्वर मुहल्ले में हुए गैंगवार में ढेर हुआ था. उसी गोलीबारी में कभी उसके गिरोह का सदस्य रहा राकेश अग्रहरि भी मारा गया था. दोनों कभी जिगरी दोस्त थे, लेकिन रंगदारी, जमीन की दलाली और वर्चस्व की लड़ाई ने उन्हें एक-दूसरे के खून के प्यासे बना दिया.
रईस का जन्म कानपुर के अनवरगंज इलाके के हीरामन का पुरवा में हुआ था. पिता इश्तियाक राजमिस्त्री थे. आठ भाई-बहनों में सातवें नंबर का रईस सामान्य परिवार से था, लेकिन अपने भाई नौशाद की हत्या ने उसके जीवन की दिशा बदल दी. बदला लेने की कसम खाकर वह वाराणसी के दशाश्वमेध थाना क्षेत्र स्थित खालिसपुरा में अपनी ननिहाल में आ गया. यहीं से रईस अहमद ‘रईस बनारसी’ बन गया. यहां उसने राकेश अग्रहरि, राजकुमार बिंद उर्फ गुड्डू मामा, बच्चा यादव, अवधेश सिंह, बाले पटेल, पंकज उर्फ नाटे और जावेद खां जैसे साथियों के साथ अपना गिरोह खड़ा किया. मुन्ना बजरंगी से भी उसका संबंध रहा.
2011 में कानपुर में दिनदहाड़े शानू ओलंगा (भाई के कथित हत्यारे) की हत्या कर उसने बदला पूरा किया. इसके बाद लूट, हत्या, रंगदारी और बिहार के मुंगेर से असलहों की तस्करी उसका मुख्य धंधा बन गया. 2007 में पुलिस वर्दी पहनकर वाराणसी के हथुआ मार्केट में बैंक के बाहर पेट्रोल पंप संचालक शम्भूनाथ लाहिड़ी की हत्या जैसे दुर्दांत अपराध में भी उसका नाम दर्ज था. नवंबर, 2015 में रईस का नाम भाजपा पार्षद शिव सेठ की हत्या में भी सामने आया था. मुखबिरी की शक में दशाश्वमेध क्षेत्र में साथी दीपू वर्मा की हत्या में भी शामिल रहा.
वाराणसी और कानपुर में उसके खिलाफ हत्या, लूट और रंगदारी के दर्जनों मामले दर्ज थे. पुलिस ने उस पर 50 हजार रुपये का इनाम रखा था. जब वह पहली बार पुलिस की गिरफ्त में आया तो उसके पास से पुलिस की वर्दी भी बरामद हुई थी. उसकी पत्नी कानपुर की रहने वाली थी. अपनी पत्नी के साथ मिलकर उसने एक गंभीर साजिश रची थी. अक्टूबर 2015 में वाराणसी जिला जेल से बरेली शिफ्ट किए जाते समय शाहजहांपुर के पास वह अपनी पत्नी की मदद से पुलिस वैन से कूदकर वह फरार हो गया और तीन साल तक पुलिस को चकमा देता रहा. शहर में छिपकर बिल्डरों, डॉक्टरों और व्यापारियों से रंगदारी वसूलता रहा. मोबाइल से परहेज और सतर्कता उसकी खासियत थी.
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14 सितंबर 2018 की शाम को प्रभु साहनी की हत्या में राकेश की भूमिका का शक और आपसी विवाद के चलते रईस अपने साथी के साथ राकेश को मारने पहुंचा. क्रॉस फायरिंग में दोनों घायल हुए. रईस को साथी बाइक पर लेकर भाग निकले, लेकिन नई सड़क की लंगड़ा हाफिज मस्जिद के पास वह गिर पड़ा और मस्जिद में ही घायल अवस्था मे घंटो बैठा रहा और लोगो से एक पार्षद को बुलाने की मांग करता रहा. उधर राकेश भी अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया.
नई सड़क से काफी देर बाद जब इसको मंडलीय अस्पताल ले जाया गया जहां इसको डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. पहले तो काफी देर तक समझ ही नहीं आया कि मरने वाला कुख्यात बदमाश रईस बनारसी है, बाद में स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की तब स्प्ष्ट हुआ की रईस बनारसी का अंत हो चुका है. रईस बनारसी की कहानी अपराध की दुनिया की उस सच्चाई को दर्शाती है जहां दोस्ती दुश्मनी में बदल जाती है और गोली का जवाब गोली से मिलता है. बनारस से कानपुर तक फैला उसका आतंक गैंगवार में समाप्त हो गया, लेकिन उसकी आपराधिक विरासत पूर्वांचल के अंडरवर्ल्ड की यादों में दर्ज रह गई.



