महर्षि सुश्रुत: काशी के महान वैद्य जिन्होंने दुनिया को दिया शल्य चिकित्सा का ज्ञान...
वाराणसी : आज खुद को आधुनिक कहने वाली दुनिया ने जब सर्जरी का नाम भी नहीं सुना था तब काशी की धरती पर महर्षि सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा (सर्जरी) पर ग्रंथ की रचना कर दी. उसमें उल्लेखित चिकित्सा पद्धति इतनी बेहतर थीं कि उनका उपयोग आज भी किया जाता है. इसी वजह से महर्षि सुश्रुत को "शल्य चिकित्सा का जनक" कहा जाता है.
महर्षि सुश्रुत द्वारा रचित सुश्रुत संहिता चिकित्सा विज्ञान का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है. इसमें शरीर की बनावट, शल्य चिकित्सा की विभिन्न विधियों और सैकड़ों चिकित्सा उपकरणों का विस्तार से वर्णन मिलता है. इस ग्रंथ में नाक के पुनर्निर्माण (राइनोप्लास्टी) जैसी जटिल सर्जरी का भी उल्लेख है.

बीएचयू के आयुर्वेद विभाग के प्रोफेसर लक्ष्मण सिंह बताते हैं कि 2800 साल पहले महर्षि सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता की रचना की थी. इस ग्रंथ में केवल सर्जरी ही नहीं, बल्कि शरीर की रचना (एनाटामी), शरीर संरक्षण और आपरेशन की पूरी प्रक्रिया का भी विस्तार से वर्णन किया गया है. उन्होंने बताया कि महर्षि सुश्रुत के गुरु भगवान धन्वंतरि थे, जिनसे उन्होंने शल्य चिकित्सा का ज्ञान प्राप्त किया. सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है. शल्य क्रिया के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे. सुश्रुत ने तीन सौ प्रकार की आपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की. सुश्रुत ने कास्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता हासिल कर ली थी. सुश्रुत नेत्र शल्य चिकित्सा भी करते थे. सुश्रुतसंहिता में मोतियाबिंद के ओपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया गया है. उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था. सुश्रुत को टूटी हुई हड्डियों का पता लगाने और उनको जोडऩे में विशेषज्ञता प्राप्त थी. शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्यपान या विशेष औषधियां देते थे। मद्य संज्ञाहरण का कार्य करता था। इसलिए सुश्रुत को संज्ञाहरण का पितामह भी कहा जाता है. इसके अतिरिक्त सुश्रुत को मधुमेह व मोटापे के रोग की भी विशेष जानकारी थी. इन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर सरंचना, काय चिकित्सा, बाल रोग, स्त्री रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी.
प्रो. लक्ष्मण सिंह ने बताया कि आयुर्वेद में उपचार की दो प्रमुख पद्धतियां बताई गई हैं. आचार्य चरक ने दवाओं के माध्यम से चिकित्सा पद्धति को आगे बढ़ाया, जबकि आचार्य सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा को वैज्ञानिक रूप दिया. उस समय जब दुनिया में सर्जरी की शुरुआत भी नहीं हुई थी, तब उन्होंने आपरेशन की पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित किया. उन्होंने शल्य चिकित्सा को पूर्वकर्म, प्रधानकर्म और पश्चातकर्म जैसे तीन चरणों में बांटा. पूर्वकर्म में मरीज को आपरेशन के लिए तैयार किया जाता था, प्रधानकर्म में शल्य क्रिया की जाती थी और पश्चातकर्म में मरीज की देखभाल की जाती थी. प्रोफेसर लक्ष्मण सिंह के अनुसार आधुनिक सर्जरी की प्रक्रिया भी काफी हद तक इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित है.

उन्होंने बताया कि महर्षि सुश्रुत ने घाव सिलने की कई तकनीकों का भी वर्णन किया है. उस समय धागों के अलावा पेड़ों के रेशों और विशेष परिस्थितियों में चींटियों की मदद से भी घाव बंद किए जाते थे. यह उस दौर की उन्नत शल्य चिकित्सा का प्रमाण है.
इतिहास विभाग के प्रोफेसर डा. विनोद जायसवाल बाताते हैं कि वाराणसी में चिकित्सा शिक्षा की समृद्ध परंपरा रही है. महर्षि सुश्रुत की रचना सुश्रुत संहिता इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण है कि उस समय भारत में चिकित्सा और सर्जरी का ज्ञान काफी विकसित था. उन्होंने बताया कि महर्षि सुश्रुत का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश के कन्नौज में हुआ था. लेकिन उन्होंने अपनी कर्मभूमि काशी को बनाया. यहां उन्होंने हिंदू धर्म में चिकित्सा और आयुर्वेद का देवता माने जाने वाले भगवान धनवंतरि से चिकित्सा और शल्य विद्या का ज्ञान प्राप्त किया और आगे चलकर शल्य चिकित्सा को नई दिशा दी.
ALSO READ : करोड़ों रुपये से चमकेगी शहर के 15 वार्डों की 62 सड़कें, नगर निगम ने तेज की टेंडर प्रक्रिया...
महर्षि सुश्रुत का जीवन औषधि और चिकित्सा ज्ञान को समर्पित था. उन्होंने चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर शल्य चिकित्सा को व्यवस्थित रूप दिया, जिसका प्रभाव आज भी चिकित्सा विज्ञान में देखा जा सकता है.
महर्षि सुश्रुत ने सर्जरी के अलग-अलग प्रकार के बारे में भी बताया है जिसमे.

छेदन: सटीक कट लगाकर शरीर को कम नुकसान पहुंचाकर प्रभावित अंग को निकालना.
भेदन: प्रभावित टिश्यू या बाहरी वस्तु (पस या रक्त) को बाहर निकालना.
लेखन: प्रभावित टिश्यू, गंदगी या बाहरी वस्तु को बाल की जड़ की तरफ खुरचकर उतारना.
वेधन: संक्रमित फ्लूइड या टॉक्सिन को छेद करके बाहर निकालना.
एष्यन: बाडी के अंदर के प्रभावित हिस्से या कैविटी का पता करने के लिए सर्जरी करना.
आह्यन: बाहरी या दूषित चीज से होने वाली बाधा को बाहर निकालना.
विश्राव्यन: सूजन कम करने या रिकवरी तेज करने के लिए तरल को नियंत्रित तरीके से बाहर निकालना.
सीव्यन - धागे और सुई की मदद से खुले जख्म को बंद करना.
महर्षि सुश्रुत बताए गए सर्जिकल टूल
सर्जरी के लिए 101 औजारों को 6 प्रकार में किया विभाजित
स्वस्तिक यंत्र (चिमटी या क्रास आकार के 24 टूल)
संदंश यंत्र (पकड़ने वाली चिमटी वाले 2 टूल) ताल यंत्र (चम्मच या प्लेट के आकार वाले 2 टूल)
नाड़ी यंत्र (खोखली नलिकाओं वाले 20 टूल) शलाका यंत्र (छड़ के आकार वाले 28 टूल) उपयंत्र (रस्सी, धागे, कपड़े जैसे 25 टूल)
इसके अलावा उन्होंने 20 पैने औजार तैयार किये इसमे मुख्य हैं.
मण्डलाग्र (गोल सिरे वाला चाकू)
उत्पलपत्र (कमल की पंखुडी की तर पतला चाकू)
अर्धधार (एक तरफ धार वाला चाकू), नखशस्त्र (नाखून के आकार का चाकू)
मुद्रिका (अंगूठी के आकार का चाकू)
करपत्र (हड्डियों को काटने वाली आरी)
शरारिमूख (एक तरह की कैंची)



