महाशिवरात्रि - नवग्रहों की मौजूदगी में शिव-पार्वती का विवाहोत्सव, विशेष काष्ठपीठिका पर बाबा का आसन

वाराणसी : काशी पुराधिपति महादेव भगवान शिव के विवाहोत्सव की तैयारियां जोरशोर से चल रही है. इस अवसर का साक्षी नवग्रह भी बनेंगे. इस बार बाबा विश्वनाथ नौग्रहों के प्रतिनिधि काष्ठ सहित कुल 11 प्रकार काष्ठ से निर्मित काष्ठपीठिका पर बैठकर मां गौरा संग ब्याह रचाएंगे. पूर्व महंत आवास पर होने वाले इस अनूठे आयोजन के लोकाचारों की श्रृंखला हल्दी के साथ 13 फरवरी शुक्रवार से आरंभ होगी. बाबा को हल्दी भी इसी काष्ठपीठिका पर लगाई जाएगी. इस बार नासिक से खास हल्दी आई है.
पवित्र वृक्षों व वनस्पतियों की लकड़ियों की पीढ़ा
बाबा विश्वनाथ व मां गौरा के लिए इस विशेष काष्ठपीठिका (पीढ़ा) का निर्माण नवग्रहों से संबंधित पवित्र वृक्षों व वनस्पतियों की लकड़ियों से किया गया है. धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का प्रयोग ग्रहदोष शांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोककल्याण का प्रतीक होता है।इनमें सूर्य के लिए अर्क (मदार), चंद्र के लिए पलाश (ढाक), मंगल के लिए खदिर (खैर), बुध के लिए अपामार्ग (लटजीरा), गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए औदुंबर (गूलर), शनि के लिए शमी, राहु के लिए दुर्वा और केतु के लिए कुशा का चयन किया गया है. इसके साथ ही अक्षोड (अखरोट) और शाक (सागवान) की लकड़ी को सम्मिलित कर कुल 11 प्रकार के पावन काष्ठों से यह काष्ठपट्ट तैयार किया गया है.
पूर्व महंत डा. कुलपति तिवारी के सुपुत्र पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया कि काशी की परंपरा में बाबा विश्वनाथ के प्रत्येक लोकाचार में शास्त्र, प्रकृति और लोकजीवन का गहरा अंतरसंबंध दिखाई देता है. इसी भाव के साथ इस वर्ष विशेष काष्ठपीठिका का निर्माण नौ ग्रहों से संबंधित पवित्र वृक्षों और वनस्पतियों की लकड़ियों से किया गया है. धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का प्रयोग ग्रहदोष शांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोककल्याण का प्रतीक होता है.
देशभर के शिवभक्तों की श्रद्धा से सजी काष्ठपीठिका
पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया इस विशेष काष्ठपट्ट के निर्माण में केवल काशी ही नहीं, देश के विभिन्न हिस्सों की आस्था भी जुड़ी है. उत्तर प्रदेश के साथ-साथ राजस्थान, कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार और असम से इन पवित्र लकड़ियों को एकत्र किया गया. शिवभक्तों ने श्रद्धा भाव से इन लकड़ियों को महंत आवास तक पहुंचाया, जिसके बाद पारंपरिक विधि से काष्ठपीठिका का निर्माण कराया गया.
पूर्व महंत आवास पर इसे धार्मिक मर्यादाओं और लोकाचार के अनुरूप अंतिम रूप दिया जा रहा है. इसमें किसी प्रकार की आधुनिक सजावट के बजाय शास्त्रीय परंपराओं और काशी की लोकसंस्कृति का विशेष ध्यान रखा गया है.
वाराणसी - काशी पुराधिपति महादेव भगवान शिव के विवाहोत्सव की तैयारियां जोरशोर से चल रही है. इस अवसर का साक्षी नवग्रह भी बनेंगे. इस बार बाबा विश्वनाथ नौग्रहों के प्रतिनिधि काष्ठ सहित कुल 11 प्रकार काष्ठ से निर्मित काष्ठपीठिका पर बैठकर मां गौरा संग ब्याह रचाएंगे. पूर्व महंत आवास पर होने वाले इस अनूठे आयोजन के लोकाचारों की श्रृंखला हल्दी के साथ 13 फरवरी शुक्रवार से आरंभ होगी. बाबा को हल्दी भी इसी काष्ठपीठिका पर लगाई जाएगी. इस बार नासिक से खास हल्दी आई है.
पवित्र वृक्षों व वनस्पतियों की लकड़ियों की पीढ़ा
बाबा विश्वनाथ व मां गौरा के लिए इस विशेष काष्ठपीठिका (पीढ़ा) का निर्माण नवग्रहों से संबंधित पवित्र वृक्षों व वनस्पतियों की लकड़ियों से किया गया है. धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का प्रयोग ग्रहदोष शांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोककल्याण का प्रतीक होता है।इनमें सूर्य के लिए अर्क (मदार), चंद्र के लिए पलाश (ढाक), मंगल के लिए खदिर (खैर), बुध के लिए अपामार्ग (लटजीरा), गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए औदुंबर (गूलर), शनि के लिए शमी, राहु के लिए दुर्वा और केतु के लिए कुशा का चयन किया गया है. इसके साथ ही अक्षोड (अखरोट) और शाक (सागवान) की लकड़ी को सम्मिलित कर कुल 11 प्रकार के पावन काष्ठों से यह काष्ठपट्ट तैयार किया गया है.
पूर्व महंत डा. कुलपति तिवारी के सुपुत्र पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया कि काशी की परंपरा में बाबा विश्वनाथ के प्रत्येक लोकाचार में शास्त्र, प्रकृति और लोकजीवन का गहरा अंतरसंबंध दिखाई देता है. इसी भाव के साथ इस वर्ष विशेष काष्ठपीठिका का निर्माण नौ ग्रहों से संबंधित पवित्र वृक्षों और वनस्पतियों की लकड़ियों से किया गया है. धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का प्रयोग ग्रहदोष शांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोककल्याण का प्रतीक होता है.
देशभर के शिवभक्तों की श्रद्धा से सजी काष्ठपीठिका
पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया इस विशेष काष्ठपट्ट के निर्माण में केवल काशी ही नहीं, देश के विभिन्न हिस्सों की आस्था भी जुड़ी है. उत्तर प्रदेश के साथ-साथ राजस्थान, कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार और असम से इन पवित्र लकड़ियों को एकत्र किया गया. शिवभक्तों ने श्रद्धा भाव से इन लकड़ियों को महंत आवास तक पहुंचाया, जिसके बाद पारंपरिक विधि से काष्ठपीठिका का निर्माण कराया गया.
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पूर्व महंत आवास पर इसे धार्मिक मर्यादाओं और लोकाचार के अनुरूप अंतिम रूप दिया जा रहा है. इसमें किसी प्रकार की आधुनिक सजावट के बजाय शास्त्रीय परंपराओं और काशी की लोकसंस्कृति का विशेष ध्यान रखा गया है.



