एनजीटी का बड़ा फैसला: बीएचयू में अवैध रुप से पेड़ों को काटने पर 2.65 करोड़ का मुआवजा वसूलनें को कहा

वाराणसी: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बीएचयू परिसर में 33 पेड़ों जिसमें 7 चंदन के पेड़ भी शामिल हैं की अवैध कटाई के लिए विश्वविद्यालय से ₹2.65 करोड़ का पर्यावरणीय मुआवजा वसूलने और इस प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर अंतिम रूप देने का निर्देश दिया है.
यह आदेश एनजीटी प्रधान पीठ नई दिल्ली के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज़ अहमद की पीठ ने 7 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान जारी किया.0आदेश कि कापी को 9 जुलाई को अपलोड किया गया.
एनजीटी, याचिकाकर्ता सौरभ तिवारी द्वारा दायर एक निष्पादन याचिका पर सुनवाई कर रही थी. जिसमें ट्रिब्यूनल के पिछले आदेश दिनांक 11 अगस्त 2025 के आदेश का पालन कराने की मांग की गई थी. अपने पिछले आदेश में एनजीटी ने पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति राशि तय करने व उसकी वसूली 3 माह में करनें का आदेश पारित किया था. पिछले आदेश का पालन नहीं होनें पर विधि संकाय बीएचयू के पूर्व छात्र एवं अधिवक्ता सौरभ तिवारी ने निष्पादन याचिका (अनुपालन याचिका ) एनजीटी के समक्ष इस वर्ष मार्च माह में दाखिल किया था.
परिसर में काटे गए थे 33 पेड़
यह पूरा मामला अधिवक्ता सौरभ तिवारी द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें बीएचयू परिसर के भीतर अवैध रूप से विभिन्न प्रजाति के पेड़ जिसमें चन्दन भी शामिल है के अवैध रूप से काटे जाने का मुद्दा उठाया गया था. एनजीटी द्वारा गठित एक संयुक्त समिति की जांच में यह पुष्टि हुई थी कि परिसर में बिना अनुमति के 33 पेड़ काटे गए थे. इन पेड़ों में आम, महुआ, गुलमोहर (गोल्ड मोहर), सागौन, कटहल और 7 मूल्यवान सफेद चंदन के पेड़ शामिल थे.
11 अगस्त 2025 को पारित अपने मुख्य आदेश में, एनजीटी ने बीएचयू पर दोहरी कार्रवाई का निर्देश दिया था:
1. काटे गए प्रत्येक पेड़ के बदले कम से कम 20 पेड़ लगाए जाएं.
2. यूपीपीसीबी (उत्तर प्रदेश प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड ) द्वारा पर्यावरणीय मुआवजा तय करके बीएचयू से तीन माह में वसूली किया जाय.
निष्पादन याचिका पर सुनवाई के दौरान, संभागीय वनाधिकारी (डीएफओ), वाराणसी के वकील ने अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की। 4 जुलाई 2026 के एक हलफनामे के अनुसार, क्षेत्रीय वन अधिकारी मोहम्मद इब्राहिम के नेतृत्व में एक 6-सदस्यीय संयुक्त समिति ने 29 जून 2026 को साइट का निरीक्षण किया था.हलफनामें के अनुसार निरीक्षण में पाया गया कि बीएचयू ने वर्ष 2025 में विभिन्न प्रजातियों के 978 पौधे लगाए थे. इनमें से 859 पेड़ सुरक्षित और जीवित पाए गए। ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में माना कि जीवित पेड़ों की यह संख्या कानून के तहत अनिवार्य 20 गुना क्षतिपूर्ति वनीकरण के लक्ष्य को पूरा करती है.
पर्यावरणीय जुर्माना: ₹2.65 करोड़ (2 करोड़ 65 लाख 6 हजार 877 रूपए 8 पैसा ) की तीन माह में वसूली का आदेश.
भले ही बीएचयू ने वृक्षारोपण का काम पूरा कर लिया हो, लेकिन पारिस्थितिक नुकसान के लिए उसे भारी वित्तीय दंड का सामना करना पड़ रहा है. यूपीपीसीबी ने डीएफओ की रिपोर्ट के आधार पर तने के क्षेत्र , प्रजाति कारक , स्थिति कारक , और स्थान कारक के आधार पर एक विस्तृत गणना रिपोर्ट पेश की. इसके तहत कुल पर्यावरणीय मुआवजा ₹2,65,26,877.08 (दो करोड़ पेंसठ लाख छब्बीस हजार आठ सौ सतहत्तर रुपये और आठ पैसे) तय किया गया है.
प्रमुख पेड़ों के मूल्यांकन का विवरण:
गणितीय मूल्यांकन के आधार पर परिपक्व और मूल्यवान पेड़ों पर भारी जुर्माना लगाया गया है:
• महुआ के पेड़: कुछ पेड़ों के लिए व्यक्तिगत जुर्माना ₹31.39 लाख प्रति पेड़ तक आंका गया।
• आम के पेड़: इनके लिए जुर्माना ₹18.57 लाख से ₹28.22 लाख प्रति पेड़ के बीच तय किया गया।
• गुलमोहर (गोल्ड मोहर) के पेड़: इनका मूल्यांकन ₹21.46 लाख प्रति पेड़ तक किया गया।
• सागौन और चंदन: कई सागौन और चंदन के पेड़ों के तनों के व्यवस्थित मूल्यांकन के कारण कुल जुर्माने में लाखों रुपये की राशि जोड़ी गई।
एनजीटी ने यूपीपीसीबी को दी अंतिम मोहलत
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हालांकि यूपीपीसीबी ने स्वीकार किया कि 2025 में दिए गए शुरुआती तीन महीने के समय के भीतर कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी थी, लेकिन ट्रिब्यूनल ने परिस्थितियों को देखते हुए समय सीमा को आगे बढ़ा दिया है.
एनजीटी बेंच ने आदेश दिया, "हालांकि यूपीपीसीबी ने पिछले आदेश की तारीख से तीन महीने के भीतर कार्यवाही पूरी करने के ट्रिब्यूनल के निर्देश का पालन नहीं किया था, लेकिन सामने आई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, हम समय को आगे बढ़ाते हैं और यूपीपीसीबी को पर्यावरणीय मुआवजे की वसूली से संबंधित कार्यवाही तीन महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश देते हैं.
इन निर्देशों के साथ, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने निष्पादन आवेदन का निपटारा कर दिया और मुआवजे की वसूली प्रक्रिया को अक्टूबर 2026 तक पूरा करने की जिम्मेदारी यूपीपीसीबी को सौंप दी है.



