नक्कटैया लक्खा मेला: पूरी रात जागी काशी, बरसात के बीच सड़कों पर आस्था का उमड़ा जनसैलाब

वाराणसी : लक्खा मेला में शुमार विश्व प्रसिद्ध चेतगंज की नक्कटैया के दौरान गुरुवार की रात रिमझिम फुहारों और सुहानी हवाओं के बीच काशी की अगाध आस्था मौसम की हर दुश्ववारी पर भारी पड़ गई. हाथों में छाता थामे और रेनकोट पहने आस्थावानों का हुजूम इस पारंपरिक आयोजन के ऐतिहासिक गवाह बनने के लिए सड़कों पर उतर आया. अर्नब चक्रवात की वजह से रात भर बारिश का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था, लेकिन न तो कलाकारों का जोश डिगा और न ही अपनी प्राचीन परंपराओं को सजीव रूप में देखने का बनारसियों का चिर-परिचित अल्हड़ मिजाज कम हुआ. भींगने से बचने के लिए लोग दुकानों के शेड, मकानों के बारजों और छज्जों के नीचे जमे रहे, लेकिन अपनी जगहों से टस से मस नहीं हुए.

रात में टोटो और पारंपरिक वाहनों से लीला के पात्र चेतगंज पहुंचे. भगवान श्रीराम के रथ के समीप जैसे ही रामायणकालीन प्रसंग के तहत शूर्पणखा के नासिका छेदन की सजीव लीला का मंचन हुआ, पूरा इलाका 'जय श्रीराम' और 'हर हर महादेव' के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा. इसके बाद शूर्पणखा की भव्य झांकी मलदहिया पटेल चौराहा होते हुए चेतगंज थाने के समीप पहुंची, जहां पारंपरिक लाग-विमानों का औपचारिक शुभारंभ किया गया.

आधी रात को रंग-बिरंगे झालरों और बहुरंगी रोशनी से नहाई सड़कों पर रामधुन की गूंज के बीच जब सौ से अधिक लाग-विमानों का कारवां आगे बढ़ा, तो बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी की रात जगमगा उठी. मलदहिया से शुरू होकर लहुराबीर, चेतगंज और पानदरीबा तक करीब पांच किलोमीटर के इस विस्तृत दायरे में भोर तक मेले का यह अद्भुत और विहंगम उल्लास बना रहा.
तेजस, सुखोई और राफेल की झलक
इस बार के 140वें ऐतिहासिक पड़ाव में प्राचीन परंपरा के साथ-साथ समकालीन गौरव और सामाजिक सरोकारों का बेजोड़ संगम देखने को मिला. हाल ही में गंगा के ऊपर वायु वीरों के शौर्य प्रदर्शन की गूंज के बीच नक्कटैया में भी एयर शो का विशेष आकर्षण छाया रहा. लाग-विमानों में भारत के आधुनिक रक्षा सामर्थ्य के प्रतीक तेजस, सुखोई और राफेल जैसे लड़ाकू विमानों की भव्य और कलात्मक प्रतिकृतियों ने भारतीय वायुसेना के पराक्रम को जीवंत कर दिया.
झांकी ने दिए संदेश
इसके साथ ही, आध्यात्मिक आस्था के केंद्र कैंची धाम के बाबा नीम करौली की अलौकिक झांकी और वर्तमान समय में बच्चों व युवाओं पर मोबाइल के बढ़ते दुष्प्रभावों को बेहद संजीदगी से दर्शाती लाग ने उपस्थित जनमानस को गहराई से झकझोरा. इस मेले में काशी सहित प्रयागराज, मिर्जापुर, जौनपुर, भदोही, आजमगढ़, चंदौली और सोनभद्र से आए कलाकारों ने अपने हैरतअंगेज करतबों और जीवंत प्रस्तुतियों से दर्शकों को भोर तक बांधे रखा.
ठेला पटरी पर असर
हालांकि, इस बार झमाझम बारिश ने मेले की रंगत में थोड़ी बाधा जरूर डाली. बारिश के कारण मेला परिसर में ठेला-पटरी लगाकर अपनी आजीविका चलाने वाले दुकानदार दुकानें नहीं सजा सके. चौबेपुर से मिट्टी के सुंदर खिलौने लेकर आए राजहंस ने दर्द साझा करते हुए बताया कि वे पिछले तीन महीने से इस मेले की तैयारी कर रहे थे और दुकान लगाने का इंतजार करते रहे, लेकिन बारिश ने थमने का नाम नहीं लिया. वहीं, चाट का ठेला लेकर खड़े रामचंद्र ने कहा कि लगातार बारिश ने मेले के बड़े आनंद को फीका कर दिया.
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चेतगंज नक्कटैया मेला की नींव पराधीन भारत में वर्ष 1888 में स्व. बाबा फतेह राम द्वारा अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों और दमनकारी नीतियों के मुखर विरोध के लिए रखी गई थी. ब्रिटिश काल की तमाम बंदिशों को धता बताते हुए स्वांग, लाग-विमान और लोक प्रदर्शनों के जरिए आम जनमानस में चेतना जगाने की यह अनूठी परंपरा शुरू की गई थी, जो आज भी अपनी पूरी भव्यता के साथ जीवित है.



