प्रेमचंद जयंती पर राष्ट्रीय परिसंवाद “प्रेमचंदः मेरे लिए” का आयोजन, विद्वानों ने किया प्रेमचंद के साहित्य पर विमर्श...

वाराणसीः बीएचयू के कला संकाय के अंतर्गत संचालित मुंशी प्रेमचंद स्मारक एवं शोध संस्थान, लमही द्वारा शुक्रवार को तीन दिवसीय कार्यक्रम 'प्रेमचंद जयंती समारोह-2026' का शुभारम्भ किया गया. समारोह के पहले दिन राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमें विद्वानों ने मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक अवदान, सामाजिक दृष्टि, उनकी विरासत पर विमर्श किया.
“प्रेमचंदः मेरे लिए” विषय पर आयोजित परिसंवाद के प्रथम सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने की. उन्होंने कहा कि आज हम जिस समाज में जी रहे हैं तथा जिस सामाजित बदलाव को महसूस कर पाते हैं, वहां तक का सफर तय करने में प्रेमचंद की लेखनी का अतुलनीय योगदान है. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने सामाजिक रूढ़ियों का विरोध किया और अपने जीवन तथा साहित्य के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाने का प्रयास किया और उनके विचार आज भी लोगों के निर्णयों, दृष्टिकोणों और जीवन-मूल्यों को प्रभावित करते हैं.
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प्रख्यात आलोचक, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. आशुतोष कुमार ने कहा कि बीसवीं शताब्दी में आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में तीन प्रमुख व्यक्तित्वों का विशेष योगदान रहा है— गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अल्लामा इकबाल और प्रेमचंद. प्रो. कुमार ने कहा कि प्रेमचंद केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माता और सामाजिक चिंतक भी थे. उन्होंने बताया कि वर्ष 1917 के बाद चंपारण सत्याग्रह और रूस की क्रांति जैसी घटनाओं का प्रभाव प्रेमचंद के लेखन पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. प्रख्यात कथाकार अखिलेश ने कहा कि एक सामान्य नागरिक के रूप में महात्मा गांधी जिस प्रकार उनके लिए प्रेरणा के स्रोत हैं, उसी प्रकार एक लेखक के रूप में प्रेमचंद उनके सबसे बड़े पूर्वज और पथप्रदर्शक हैं. प्रो. अरुण कमल ने कहा कि जिस तरह काशी एक तीर्थ है, प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही साहित्य का तीर्थ है. प्रो. सुषमा घिल्डियाल, संकाय प्रमुख, कला संकाय, ने अपने संबोधन में कहा कि प्रेमचंद जयंती समारोह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि साहित्य और समाज के बीच संवाद स्थापित करने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद किसी एक वर्ग, समुदाय या विचारधारा के नहीं हैं, बल्कि वे हम सभी के हैं.. कार्यक्रम के समन्वयक प्रो. नीरज खरे रहे. परिसंवाद का दूसरा सत्र, प्रेमचंद की पत्रकारिता, विषय पर आधारित रहा. मुख्य वक्ता प्रो. अनुराग दवे सहित डॉ. अविनाश कुमार सिंह, प्रो. प्रभाकर सिंह ने प्रेमचंद की पत्रकारिता विषय पर अपने विचार व्यक्त किए. सत्र की अध्यक्षता प्रो. आशीष त्रिपाठी और संचालन डॉ. किरण तिवारी ने किया.



