व्योमेश शुक्ल की पुस्तक 'नागरी' असाधारण चित्त से उपजी संपादन कला का उदाहरण

वाराणसी: संकट मोचन संगीत समारोह के दूसरे दिन मंगलवार को 'साहित्य मंच' पर युवा कवि और रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल द्वारा संपादित पुस्तक 'नागरी' का लोकार्पण सह परिचर्चा का आयोजन किया गया. इस अवसर पर संपादकीय वक्तव्य देते हुए व्योमेश शुक्ल ने कहा कि इस पत्रिका के सफल संपादन का श्रेय मैं राजेश्वर आचार्य जी को देना चाहता हूँ. काशी में मरण भी मंगल है. मोक्ष भी मंगल है. मैं इस घर का बच्चा हूँ, मेरे शरीर में संकट मोचन का लड्डू खून बनकर दौडता है. नागरी पत्रिका में काशी की संस्कृति है.

"व्योमेश की नहीं बनारस की पत्रिका"
इस आयोजन के अवसर पर अध्यक्ष के रूप बोलते हुए कवि व प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि यह व्योमेश की नहीं बनारस की पत्रिका है. ये पत्रिका एक असाधारण चित्त से उपजी संपादन कला का उदाहरण है. इनकी उड़ान बहुत ऊँची है लेकिन जमीन बनारस है. यह बहुवचनात्मक स्वरूप की और लोक लय में लीन होने की पत्रिका है. यह बौद्धिक ताप और तेवर की पत्रिका है.

काशी की बस्तियों में संस्कृति की झलक
बता दें, वर्तमान में काशी जिन चीजों के लिए जानी जाती है इसमें वो सभी संदर्भ आए है. यहाँ की बस्तियों में संस्कृति दिखाई देती है और बनारस की सांस्कृतिक निजता में अगर कुछ है तो वो है यहाँ का विजुअल्स. इसी विजुअल्स को समझे बिना कोई भी बनारसी नहीं हो सकता है. संवाद धर्मिता इस बनारस की संस्कृति का धर्म है जो इस पत्रिका में भी आया है. मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रो विजयनाथ मिश्र ने कहा कि आने वाले दिनों में 'नागरी' बनारस में मैनुअल की तरह काम आएगा. बनारस मे विरोध भी स्वागत का एक तरीका है. इन्ही तौर- तरीकों को समझने में नागरी पत्रिका सहायक सिद्ध होगा. मैं चाहता हूँ कि पांडुलिपियों को भी इस पत्रिका में आगे से प्रकाशित किया जाए.

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वहीं, डॉ महेंद्र कुशवाहा ने कहा कि संकट मोचन संगीत समारोह के 103 वें आयोजन में साहित्य का पदार्पण हुआ है और आज नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने पत्रिकाओं के संपादन की जो परंपरा शुरू की है वह पुनर्नवा होकर सामने आई हैं. पत्रिका को कई स्तंभ के रूप में खंडों मे बाँटा गया है. इसके माध्यम से व्योमेश जी नए तेवर के साथ हमारे सामने आते हैं. इनका बहुआयामी व्यक्तित्व है और ये साहित्य कला और संगीत तीनों के महत्व को बखूबी समझते हैं. इनका परंपरा से जुड़ाव है और इसकी झलक पत्रिका में स्पष्ट दिखता है. संचालन डॉ आर्यपुत्र दीपक ने किया और स्वागत मनीष खत्री ने किया. धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी राकेश गुप्ता ने किया.



