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बीएचयू के वैज्ञानिकों ने बनाई बहु शक्तिशाली स्टेम सेल, लाइलाज बीमारी का खोजेंगे इलाज...

बीएचयू के वैज्ञानिकों ने बनाई बहु शक्तिशाली स्टेम सेल, लाइलाज बीमारी का खोजेंगे इलाज...
Jul 08, 2026, 02:47 PM
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Posted By Diksha Mishra

वाराणसीः बीएचयू के विज्ञान संस्थान के सेंटर फार जेनेटिक डिसआर्डर्स के शोधकर्ताओं ने बहु शक्तिशाली स्टेम सेल (Induced Pluripotent Stem Cell - iPSC) का विकास करने में सफलता प्राप्त किया है. इसमें उनकी मदद “टाटा इंस्टीट्यूट फार जेनेटिक्स एंड सोसाइटी" (टीआईजीएस), बंगलुरु ने किया है. इस नई खोज से अब वैज्ञानिक और औषधि विकासकर्ता “डिश में रोग” (रीढ़ की हड्डी और जोड़ों का रोग) माडल स्थापित कर सकेंगे. इनकी सहायता से जटिल और कठिन-उपचार योग्य रोगों की मूलभूत कार्यप्रणाली का अध्ययन कर सकेंगे.



इसके साथ ही मानव परीक्षणों से पहले नई दवाओं की विषाक्तता और प्रभावशीलता का परीक्षण भी कर सकेंगे.

ऐसे प्रत्यारोपण योग्य ऊतकों का विकास कर सकेंगे जो प्रतिरक्षा-आधारित अस्वीकृति (Immune Rejection) जैसी समस्याओं को कम कर सकें. शोध दल इन स्टेम कोशिकाओं का उपयोग करके त्रि-आयामी सूक्ष्म अंग माडल (आर्गेनाइड्स) विकसित करेगा जो रोगग्रस्त ऊतकों की जीवंत प्रतिकृतियों के रूप में कार्य करेंगे.


ये माडल वैज्ञानिकों को वास्तविक समय में रोग की प्रगति का अवलोकन करने तथा न्यूरोडीजेनेरेशन के लिए जिम्मेदार कारणों की पहचान करने में सक्षम बनाएंगे. इससे वैज्ञानिक समुदाय उन रोगों के लिए उपचार विकसित करने की दिशा में और आगे बढ़ सकेंगे जिनका वर्तमान में कोई प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं है.

इसके जरिए अत्याधुनिक जीनोम एडिटिंग तकनीक का उपयोग करके जटिल न्यूरोडीजेनेरेटिव (तंत्रिका अपक्षयी) रोगों, पार्किंसन रोग और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS), का माडल भी तैयार किया है.

स्टेम कोशिकाएं हमारे शरीर की वे 'मास्टर कोशिकाएं' हैं जो अन्य सभी प्रकार की कोशिकाओं को जन्म देती है. iPSC वे स्टेम कोशिकाएं हैं जो प्राकृतिक रूप से भ्रूण में नहीं, बल्कि प्रयोगशाला में वैज्ञानिक तरीके से विकसित की जाती हैं. प्रयोगशाला में वयस्क सामान्य कोशिकाओं (जैसे त्वचा या रक्त) को रीप्रोग्राम करके बनाई गई विशेष कोशिकाएं हैं. इनमें शरीर के किसी भी ऊतक (tissue) या अंग में बदलने की असीमित क्षमता होती है.


यह शोध दो पीएचडी शोधार्थी सूरजित मालाकार और शैलेयी राय चौधरी ने किया है. इस संयुक्त अध्ययन का नेतृत्व बीएचयू से प्रो. परिमल दास, प्रो. दीपिका जोशी तथा टाटा इंस्टीट्यूट फार जेनेटिक्स एंड सोसाइटी (टीआईजीएस) से डा. वसंत थामोदरन ने किया. दोनों केंद्रों के विशेष संसाधनों को एकीकृत करते हुए शोध दल ने अत्यंत गंभीर रोगों, विशेषकर पार्किंसन रोग और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS), के जैविक रहस्यों को समझने पर अपना ध्यान केंद्रित किया. यह खोज अत्याधुनिक कोशिकीय पुनःप्रोग्रामिंग (Cellular Reprogramming) तकनीक पर आधारित है. यह विधि परिपक्व मानव कोशिकाओं की जैविक घड़ी को प्रभावी ढंग से पीछे ले जाकर उन्हें उनके प्रारंभिक विकासात्मक चरण में वापस पहुंचा देती है.


इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए शोध दल ने विशिष्ट ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर्स के अत्यंत सटीक संयोजन का उपयोग किया, जिन्हें वैज्ञानिक समुदाय में सामूहिक रूप से "यामानाका फैक्टर्स" के नाम से जाना जाता है. इन कारकों को स्वस्थ सोमैटिक (दैहिक) कोशिकाओं, जैसे वयस्क रक्त नमूनों से प्राप्त कोशिकाओं, में प्रविष्ट कराकर वैज्ञानिकों ने उनकी पूर्व विशेषीकृत पहचान को सफलतापूर्वक मिटा दिया. इस प्रक्रिया ने परिपक्व कोशिकाओं को भ्रूण-सदृश, बहु-शक्तिशाली (Pluripotent) अवस्था में परिवर्तित कर दिया. इस मूल अवस्था में नव-विकसित iPSC लाइनों में न खत्म होने की अद्भुत क्षमता होती है. वे अनिश्चितकाल तक विभाजित होती रह सकती हैं और साथ ही मानव शरीर में पाए जाने वाले किसी भी प्रकार के ऊतक में परिवर्तित होने की क्षमता बनाए रखती हैं.


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केवल स्वस्थ कोशिकाओं का विकास करने के बजाय, बीएचयू और टीआईजीएस की संयुक्त टीम ने इस आणविक "कैंची" प्रणाली का उपयोग करके पार्किंसन रोग और ALS से जुड़ी सटीक आनुवंशिक विविधताओं को इनमें सम्मिलित किया.

प्रयोगशाला में आनुवंशिक उत्परिवर्तनों (Mutations) की हूबहू नकल करके शोधकर्ताओं ने न्यूरोडीजेनेरेशन के अत्यंत समान और सटीक माडल तैयार किए.


स्टेम सेल जीवविज्ञान और जीनोम संपादन का यह लक्षित संयोजन वैज्ञानिकों को कोशिकीय क्षरण के शुरुआती चरणों का अध्ययन करने में सक्षम बनाता है, जो किसी मानव रोगी में शारीरिक लक्षण प्रकट होने से बहुत पहले शुरू हो जाते हैं.

दशाश्वमेध के शीतला घाट पर बंद फ्लैट में आग, शॉर्ट सर्किट से भड़की लपटों पर 15 मिनट में काबू
दशाश्वमेध के शीतला घाट पर बंद फ्लैट में आग, शॉर्ट सर्किट से भड़की लपटों पर 15 मिनट में काबू
वाराणसी: दशाश्वमेध थाना क्षेत्र के शीतला घाट के पास रविवार शाम 7 बजे एक कॉम्परेटिव भवन के तीसरे तल स्थित बंद फ्लैट में अचानक आग लगने से इलाके में अफरा-तफरी मच गई। प्रारंभिक जांच में आग लगने का कारण ऐसी में शॉर्ट सर्किट माना जा रहा है। सूचना मिलते ही दशाश्वमेध पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम मौके पर पहुंची और करीब 10 से 15 मिनट की मशक्कत के बाद आग पर पूरी तरह काबू पा लिया। राहत की बात यह रही कि घटना में कोई जनहानि नहीं हुई।जानकारी के अनुसार भवन संख्या डी-17/136 एक कॉम्परेटिव भवन है, जिसे पहले फ्लैट प्रणाली के तहत बनाया गया था। समय के साथ इसमें बने अलग-अलग फ्लैट लोगों को बेच दिए गए और वर्तमान में प्रत्येक निवासी अपने-अपने हिस्से का मालिक है। भवन के भूतल पर कटरे में कई दुकानें संचालित होती हैं, जबकि भवन के बगल में एमआरके होटल (MRK Hotel) स्थित है। जिस फ्लैट में आग लगी, वह भी इसी भवन का हिस्सा है।स्थानीय निवासी महावीर प्रसाद जैपुरिया ने बताया कि घटना के समय वह घर पर नहीं थे। उनकी पत्नी फ्लैट में मौजूद थीं, जिन्हें आसपास के लोगों ने सुरक्षित नीचे उतार दिया। उन्होंने बताया कि जिस फ्लैट में आग लगी, उसमें कोई नहीं रहता था और वह लंबे समय से बंद था। फ्लैट में केवल एक बेड और कुछ पुराना कबाड़ रखा हुआ था, जो आग की चपेट में आकर जल गया। भवन के मालिक धनमल बताए जा रहे हैं, जो वर्तमान में रानीपुर में रहते हैं।घटना की सूचना मिलते ही पुलिस और दमकल विभाग की टीम मौके पर पहुंची। फायर कर्मियों ने तेजी से कार्रवाई करते हुए कुछ ही मिनटों में आग पर काबू पा लिया, जिससे आग आसपास के फ्लैटों और नीचे मौजूद दुकानों तक नहीं फैल सकी।मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारी ने बताया कि शीतला घाट के पास स्थित भवन के दूसरे/ऊपरी तल पर आग लगने की सूचना मिली थी। प्रारंभिक जांच में शॉर्ट सर्किट से आग लगने की बात सामने आई है। मकान उस समय खाली था। आग पर लगभग 10 से 15 मिनट में नियंत्रण पा लिया गया। इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है। केवल एक बेड और कुछ कबाड़ का सामान जलकर नष्ट हुआ है। मामले की जांच की जा रही है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते आग की जानकारी नहीं मिलती और दमकल की टीम तुरंत मौके पर नहीं पहुंचती, तो आग होटल, दुकानों और आसपास के अन्य फ्लैटों तक फैल सकती थी। लोगों की सतर्कता और दमकल विभाग की त्वरित कार्रवाई से एक बड़ा हादसा टल गया।
काशी की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में, सजकर तैयार हुई भगवान जगन्नाथ की पालकी...
काशी की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में, सजकर तैयार हुई भगवान जगन्नाथ की पालकी...
वाराणसी : काशी के प्रसिद्ध लक्खा मेलों में शामिल ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा मेले की तैयारियां तेज हो गई हैं। अस्सी स्थित जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक पालकी को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कारीगर पालकी की साफ-सफाई, रंग-रोगन और सजावट में जुटे हैं। इसी पालकी में विराजमान होकर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा मंदिर से निकलकर रथयात्रा स्थल तक पहुंचेंगे, जहां से ऐतिहासिक रथयात्रा का शुभारंभ होगा।मंदिर के मुख्य पुजारी ने बताया कि भगवान की यह पालकी सेखुआ (साखू) की मजबूत लकड़ी से बनाई जाती है। इसकी विशेषता इसकी मजबूती और लंबी आयु है। वर्तमान में उपयोग की जा रही पालकी लगभग 15 से 20 वर्ष पुरानी है, जिसे पुरानी पालकी के जर्जर होने के बाद तैयार कराया गया था। हर वर्ष रथयात्रा से पहले इसकी विशेष मरम्मत और सजावट की जाती है, ताकि भगवान की यात्रा पूरी गरिमा और भव्यता के साथ संपन्न हो सके।उन्होंने बताया कि 15 जुलाई को पालकी को फूल-मालाओं, रंग-बिरंगी झालरों और पारंपरिक सजावट से अलंकृत किया जाएगा। धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा पहले पालकी में विराजमान होकर मंदिर से निकलते हैं। काशी की संकरी गलियों में विशाल रथ का प्रवेश संभव नहीं होने के कारण श्रद्धालु भगवान की पालकी को अपने कंधों पर उठाकर रथयात्रा स्थल तक ले जाते हैं। इस दौरान पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है और जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।रथयात्रा स्थल पर भगवान का रात्रि विश्राम होता है। अगले दिन प्रातःकाल भगवान भव्य रथ पर आरूढ़ होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। तीन दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक मेले में दूर-दराज़ से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। मेले की समाप्ति के बाद भगवान पुनः इसी पालकी के माध्यम से अपने मंदिर वापस लौटते हैं।मंदिर प्रशासन के अनुसार रथयात्रा के समापन के बाद पालकी को मंदिर परिसर में सुरक्षित रखा जाता है और उसकी नियमित देखभाल की जाती है। मंदिर के निर्माण एवं विस्तार कार्य पूर्ण होने के बाद पालकी और उससे जुड़े अन्य धार्मिक उपकरणों के संरक्षण की और बेहतर व्यवस्था की जाएगी।ALSO READ : रंग मल्हार में संदूक पर दिखाया कला कौशल, प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश...धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वर्ष 1790 में मंदिर की स्थापना के साथ ही काशी की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा की परंपरा प्रारंभ हुई थी। तब से लेकर आज तक यह परंपरा निरंतर चली आ रही है और भगवान जगन्नाथ की यह पालकी श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक बनी हुई है। हर वर्ष रथयात्रा से पहले पालकी की सजावट और उसकी तैयारियां इस ऐतिहासिक आयोजन के शुभारंभ का प्रमुख आकर्षण होती हैं।
रंग मल्हार में संदूक पर दिखाया कला कौशल, प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश...
रंग मल्हार में संदूक पर दिखाया कला कौशल, प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश...
वाराणसी : संदूक शब्द से ही लोहे के काले रंग के बक्से की छवि जेहन में आती है जिसका उपयोगी जरूरी सामानों को रखने के लिए किया जाता है. जरा सोचिए इस संदूक पर खूबसूरत कलाकृति हो तो कितना आकर्षक लगेगा. उसका इस्तेमाल करने वाला जितनी बार देखेगा उसका मन खिल उठेगा. ऐसे ही लुभावने संदूक तैयार किए गए बीएचयू के फाइन आट्सर् फैकल्टी के अहिवासी आर्ट गैलरी में. रविवार को यहां दो दिवासीय '17वीं रंग मल्हार' अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला की शुरुआत हुई. इस बार इसका विषय संदूक था जिस पर देश-विदेश के कलाकारों ने अपना कौशल दिखाया. कला के माध्यम से प्रकृति संरक्षण का संदेश देते हुए हरियाली और अच्छी वर्षा की कामना की.कार्यक्रम के संयोजक सुरेश जांगिड़ ने बताया कि 'रंग मल्हार' की अवधारणा भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध राग 'मेघ मल्हार' से प्रेरित है. मान्यता है कि इस राग के गायन और वादन से प्रकृति प्रसन्न होकर वर्षा करती है. इसी सोच के साथ पिछले 17 वर्षों से हर वर्ष जुलाई के दूसरे रविवार को 'रंग मल्हार' का आयोजन किया जाता है, ताकि प्रकृति में संतुलन बना रहे और धरती पर हरियाली कायम रहे.हवा महल तो किसी ने सजाया मोरउन्होंने बताया कि इस वर्ष कलाकारों ने अपनी रचनात्मकता के लिए 'बाक्स' या 'संदूक' को कैनवास के रूप में चुना है. यह बाक्स केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि पुरानी यादों, पारिवारिक विरासत और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है. पुराने समय में लोग इसी संदूक में अपनी बहुमूल्य वस्तुएं, दस्तावेज और बचपन की किताबें-स्लेट आदि संभालकर रखते थे. आज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों, विरासत और प्रकृति से जोड़ने के उद्देश्य से इस विषय का चयन किया गया है.कार्यशाला में कलाकारों ने पुराने संदूकों, जूते के डिब्बों, अटैचियों और अन्य उपयोग से बाहर हो चुकी वस्तुओं को अपनी कला का माध्यम बनाया. कहीं पुराने संदूक पर मोर और प्राकृतिक दृश्यों की मनमोहक आकृतियां बनाई गईं, तो कहीं पारंपरिक और सांस्कृतिक विरासत को रंगों के माध्यम से जीवंत किया गया. कलाकार ने बाक्स पर जयपुर के प्रसिद्ध हवा महल की आकृति उकेरी, जिसने उपस्थित लोगों का विशेष ध्यान आकर्षित किया.17 सालों से चली आ रही रंग मल्हार की परंपरा'रंग मल्हार' की शुरुआत करीब 17 वर्ष पहले प्रसिद्ध कलाकार डा. विद्यासागर उपाध्याय की प्रेरणा से हुई थी. उस समय कम वर्षा होने से लोग चिंतित थे. तब कलाकारों ने मिलकर बारिश के आह्वान के लिए छतरियों को रंगों से सजाया और उनके साथ जुलूस निकाला. संयोगवश उसी दिन शाम को जोरदार बारिश हुई. तभी से यह आयोजन एक परंपरा बन गया.ALSO READ : चाइनीज मांझा की तलाश में पुलिस ने पतंगबाजों को पकड़ाकार्यक्रम की विशेषता यह भी रही है कि हर वर्ष किसी नए माध्यम पर पेंटिंग की जाती है. अब तक छतरियों, मास्क, साइकिल, लालटेन, झंडे, थाली, चाय की केतली और यहां तक कि कार को भी रंगों से सजाया जा चुका है. इन कलाकृतियों के माध्यम से समाज में पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जाता है.आयोजकों ने युवाओं से अपनी संस्कृति, परंपराओं और उन चीजों को सहेजने की अपील की, जिनसे उनकी भावनाएं और संस्कार जुड़े हैं. उन्होंने कहा कि कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने और प्रकृति से जोड़ने का सशक्त साधन भी है.