बीएचयू के वैज्ञानिकों ने बनाई बहु शक्तिशाली स्टेम सेल, लाइलाज बीमारी का खोजेंगे इलाज...

वाराणसीः बीएचयू के विज्ञान संस्थान के सेंटर फार जेनेटिक डिसआर्डर्स के शोधकर्ताओं ने बहु शक्तिशाली स्टेम सेल (Induced Pluripotent Stem Cell - iPSC) का विकास करने में सफलता प्राप्त किया है. इसमें उनकी मदद “टाटा इंस्टीट्यूट फार जेनेटिक्स एंड सोसाइटी" (टीआईजीएस), बंगलुरु ने किया है. इस नई खोज से अब वैज्ञानिक और औषधि विकासकर्ता “डिश में रोग” (रीढ़ की हड्डी और जोड़ों का रोग) माडल स्थापित कर सकेंगे. इनकी सहायता से जटिल और कठिन-उपचार योग्य रोगों की मूलभूत कार्यप्रणाली का अध्ययन कर सकेंगे.
इसके साथ ही मानव परीक्षणों से पहले नई दवाओं की विषाक्तता और प्रभावशीलता का परीक्षण भी कर सकेंगे.
ऐसे प्रत्यारोपण योग्य ऊतकों का विकास कर सकेंगे जो प्रतिरक्षा-आधारित अस्वीकृति (Immune Rejection) जैसी समस्याओं को कम कर सकें. शोध दल इन स्टेम कोशिकाओं का उपयोग करके त्रि-आयामी सूक्ष्म अंग माडल (आर्गेनाइड्स) विकसित करेगा जो रोगग्रस्त ऊतकों की जीवंत प्रतिकृतियों के रूप में कार्य करेंगे.
ये माडल वैज्ञानिकों को वास्तविक समय में रोग की प्रगति का अवलोकन करने तथा न्यूरोडीजेनेरेशन के लिए जिम्मेदार कारणों की पहचान करने में सक्षम बनाएंगे. इससे वैज्ञानिक समुदाय उन रोगों के लिए उपचार विकसित करने की दिशा में और आगे बढ़ सकेंगे जिनका वर्तमान में कोई प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं है.
इसके जरिए अत्याधुनिक जीनोम एडिटिंग तकनीक का उपयोग करके जटिल न्यूरोडीजेनेरेटिव (तंत्रिका अपक्षयी) रोगों, पार्किंसन रोग और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS), का माडल भी तैयार किया है.
स्टेम कोशिकाएं हमारे शरीर की वे 'मास्टर कोशिकाएं' हैं जो अन्य सभी प्रकार की कोशिकाओं को जन्म देती है. iPSC वे स्टेम कोशिकाएं हैं जो प्राकृतिक रूप से भ्रूण में नहीं, बल्कि प्रयोगशाला में वैज्ञानिक तरीके से विकसित की जाती हैं. प्रयोगशाला में वयस्क सामान्य कोशिकाओं (जैसे त्वचा या रक्त) को रीप्रोग्राम करके बनाई गई विशेष कोशिकाएं हैं. इनमें शरीर के किसी भी ऊतक (tissue) या अंग में बदलने की असीमित क्षमता होती है.
यह शोध दो पीएचडी शोधार्थी सूरजित मालाकार और शैलेयी राय चौधरी ने किया है. इस संयुक्त अध्ययन का नेतृत्व बीएचयू से प्रो. परिमल दास, प्रो. दीपिका जोशी तथा टाटा इंस्टीट्यूट फार जेनेटिक्स एंड सोसाइटी (टीआईजीएस) से डा. वसंत थामोदरन ने किया. दोनों केंद्रों के विशेष संसाधनों को एकीकृत करते हुए शोध दल ने अत्यंत गंभीर रोगों, विशेषकर पार्किंसन रोग और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS), के जैविक रहस्यों को समझने पर अपना ध्यान केंद्रित किया. यह खोज अत्याधुनिक कोशिकीय पुनःप्रोग्रामिंग (Cellular Reprogramming) तकनीक पर आधारित है. यह विधि परिपक्व मानव कोशिकाओं की जैविक घड़ी को प्रभावी ढंग से पीछे ले जाकर उन्हें उनके प्रारंभिक विकासात्मक चरण में वापस पहुंचा देती है.
इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए शोध दल ने विशिष्ट ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर्स के अत्यंत सटीक संयोजन का उपयोग किया, जिन्हें वैज्ञानिक समुदाय में सामूहिक रूप से "यामानाका फैक्टर्स" के नाम से जाना जाता है. इन कारकों को स्वस्थ सोमैटिक (दैहिक) कोशिकाओं, जैसे वयस्क रक्त नमूनों से प्राप्त कोशिकाओं, में प्रविष्ट कराकर वैज्ञानिकों ने उनकी पूर्व विशेषीकृत पहचान को सफलतापूर्वक मिटा दिया. इस प्रक्रिया ने परिपक्व कोशिकाओं को भ्रूण-सदृश, बहु-शक्तिशाली (Pluripotent) अवस्था में परिवर्तित कर दिया. इस मूल अवस्था में नव-विकसित iPSC लाइनों में न खत्म होने की अद्भुत क्षमता होती है. वे अनिश्चितकाल तक विभाजित होती रह सकती हैं और साथ ही मानव शरीर में पाए जाने वाले किसी भी प्रकार के ऊतक में परिवर्तित होने की क्षमता बनाए रखती हैं.
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केवल स्वस्थ कोशिकाओं का विकास करने के बजाय, बीएचयू और टीआईजीएस की संयुक्त टीम ने इस आणविक "कैंची" प्रणाली का उपयोग करके पार्किंसन रोग और ALS से जुड़ी सटीक आनुवंशिक विविधताओं को इनमें सम्मिलित किया.
प्रयोगशाला में आनुवंशिक उत्परिवर्तनों (Mutations) की हूबहू नकल करके शोधकर्ताओं ने न्यूरोडीजेनेरेशन के अत्यंत समान और सटीक माडल तैयार किए.
स्टेम सेल जीवविज्ञान और जीनोम संपादन का यह लक्षित संयोजन वैज्ञानिकों को कोशिकीय क्षरण के शुरुआती चरणों का अध्ययन करने में सक्षम बनाता है, जो किसी मानव रोगी में शारीरिक लक्षण प्रकट होने से बहुत पहले शुरू हो जाते हैं.



