Daily Bulletin Tag
AI गार्गी दैनिक बुलेटिन
रंगभरी विवाद पर कार्रवाई, मंदिर ड्यूटी से नदारद हुए पुलिसकर्मी

रंगभरी विवाद पर कार्रवाई, मंदिर ड्यूटी से नदारद हुए पुलिसकर्मी

वाराणसी: रंगभरी एकादशी के दौरान काशी विश्वनाथ मंदिर में कथित अव्यवस्था और अभद्रता के आरोपों के बीच वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट ने त्वरित एक्‍शन लिया है. घटना का संज्ञान लेते हुए वीडियो में दिखाई दे रहे संबंधित अधिकारी एवं कर्मचारियों को तत्काल मंदिर ड्यूटी से हटाकर पुलिस लाइन से संबद्ध कर दिया गया है. साथ ही पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय विभागीय जांच के निर्देश जारी किए गए हैं.पुलिस कमिश्नरेट ने स्पष्ट किया है कि मामले को गंभीरता से लिया गया है और तथ्यों की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जाएगी. जांच पूरी होने तक संबंधित कर्मियों को फील्ड ड्यूटी से अलग रखा गया है.वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट में तैनात सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को पुनः कुशल एवं शालीन व्यवहार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं. बता दें कि रंगभरी एकादशी के अवसर पर भारी भीड़ के बीच कुछ श्रद्धालुओं और मीडिया कर्मियों ने पुलिसकर्मियों पर अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए थे. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद मामला तूल पकड़ लिया. घटना के बाद पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल के पूर्व निर्देशों के पालन और व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठे.अनुशासन और संवेदनशीलता पर जोरप्रशासन ने दोहराया है कि धार्मिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार सर्वोच्च प्राथमिकता है. भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए निगरानी और जवाबदेही की प्रक्रिया को और सख्त किया जाएगा. कमिश्नरेट की इस कार्रवाई को श्रद्धालुओं और नागरिकों के बीच विश्वास बहाल करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है. जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की अनुशासनात्मक कार्रवाई तय की जाएगी.

होली त्योहार पर रंगों से आंखों को बचाने के लिए करें ये उपाय, जाने टिप्स

होली त्योहार पर रंगों से आंखों को बचाने के लिए करें ये उपाय, जाने टिप्स

वाराणसी: होली त्योहार पर रंगों से अपनी आंखों को बचाने के लिए धूप का चश्मा पहनें, हर्बल रंगों का उपयोग करें और आंखों के आसपास नारियल तेल लगाएं. रंग जाने पर रगड़ें नहीं बल्कि साफ पानी से धोएं. कॉन्टैक्ट लेंस न पहनें और आंखों को सीधे पानी की धार या गुलाल से बचाएं.होली पर आंखों की सुरक्षा के लिए मुख्य टिप्सनेत्र चिकित्‍सक डा. अनुराग टंडन के अनुसार धूप का चश्मा या गॉगल्स पहनेंयह आंखों में रंग जाने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका है.प्राकृतिक/हर्बल रंगरासायनिक रंगों की जगह हर्बल या ऑर्गेनिक रंगों का उपयोग करेंजो आंखों के लिए सुरक्षित होते हैं.आंखों के आसपास तेलआंखों के आसपास नारियल या बादाम का तेल लगाने से रंग सीधे त्वचा/आंखों में नहीं जाते.कॉन्टैक्ट लेंसयदि आप लेंस पहनते हैंतो होली खेलने से पहले इन्हें निकाल दें.रगड़ें नहींअगर आंख में रंग चला जाएतो रगड़ने के बजाय ठंडे और साफ पानी से धोएं.हाथ-मुंह धोनापानी का स्रोत पास रखें और रंग लगने पर तुरंत धोएं.क्या न करेंआंखों में ज़बरदस्ती रंग न डालेंआक्रामक खेल से बचेंऔर गंदे हाथों से आंखों को न छुएं.यदि रंग जाने के बाद भी जलनखुजली या धुंधलापन बना रहेतो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं.

 वाराणसी में तीन लाख पौधरोपण...350 बीघा जमीन पर हरियाली

वाराणसी में तीन लाख पौधरोपण...350 बीघा जमीन पर हरियाली

वाराणसी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व में गोद लिए गांव डोमरी एक मार्च को इतिहास रचा गया. इस दिन 20 हजार लोग एक साथ पौधरोपण किए. इस कार्यक्रम में करीब 350 बीघा जमीन को हरा भरा किया गया और लगभग तीन लाख पौधे रोपे गए जिसके चलते यह वर्ल्ड रिकॉर्ड बन गया.नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के लिए मध्यप्रदेश की एमबीके संस्था के साथ समझौता किया गया है. यह तीसरे वर्ष से निगम को दो करोड़ रुपये की आय देगी और सातवें वर्ष तक वार्षिक आय सात करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है. यहां मियावाकी तकनीक के साथ-साथ औषधीय पौधों और फूलों की खेती भी होगी. यह केवल एक बगीचा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर इको-सिस्टम विकसित करने का प्रयास है. इसमें फलों के बाग, आयुर्वेदिक खेती और फूलों की खेती का समन्वय होगा.योजना में फलदार पौधे...परियोजना के तीसरे वर्ष आम, अमरूद, पपीता, अनार जैसे फलदार पेड़ और अश्वगंधा, शतावरी, गिलोय, एलोवेरा जैसे औषधीय पौधे तथा गुलाब, चमेली और पारिजात के फूलों से राजस्व आरंभ . तीसरे वर्ष निगम को दो करोड़ रुपये, पांचवें वर्ष पांच करोड़, छठे वर्ष छह करोड़ और सातवें वर्ष तक सात करोड़ रुपये वार्षिक अनुमानित आय होगी.

BHU में छात्र की मौत, अंधेरे में बैरिकेडिंग से टकराई बाइक, प्रदर्शन जारी...

BHU में छात्र की मौत, अंधेरे में बैरिकेडिंग से टकराई बाइक, प्रदर्शन जारी...

वाराणसी: काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शनिवार की देर रात एक दर्दनाक सड़क हादसे में एमएससी एग्रीकल्चर के छात्र की मौत हो गई. घटना के बाद ट्रामा सेंटर की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए छात्र मुआवजे एवं उचित कार्रवाई की मांग करने लगे.एग्रीकल्चर सेकंड ईयर का था छात्र जानकारी के मुताबिक छात्र, एग्रीकल्चर सेकंड ईयर का छात्र था. देर रात लगभग 12:30 बजे अपने दो दोस्तों के साथ अवेंजर बाइक से बाल गंगाधर तिलक हॉस्टल से निकला था. जैसे ही वह जे.सी. बोस हॉस्टल के पास पहुंचा, वहां पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था न होने के कारण उसकी बाइक बैरिकेडिंग से टकरा गई.ALSO READ : वाराणसी में तीन लाख पौधरोपण...350 बीघा जमीन पर हरियालीचिकित्सकों पर लापरवाही का आरोपइस दुर्घटना में सूरज प्रताप को सीने और पेट में गंभीर चोटें आईं. घटना के बाद साथियों ने तत्काल एंबुलेंस की मदद से उन्हें ट्रामा सेंटर पहुंचाया. आरोप है कि वहां समय पर इलाज न मिलने और औपचारिकताओं में देरी के कारण उसकी मौत हो गई.

 काशी ने रचा कीर्तमान, चीन का तोडा रिकॉर्ड...

काशी ने रचा कीर्तमान, चीन का तोडा रिकॉर्ड...

वाराणसी: पर्यावरण संरक्षण में काशी ने आज अपनी अमिट छाप छोड़ दी है. नगर निगम द्वारा सुजाबाद डोमरी क्षेत्र के 350 बीघा में विकसित किए जा रहे आधुनिक ‘शहरी वन’ में 245103 पौधे लगा कर चाइना का रिकॉर्ड तोड़ दिया. इससे पहले चीन ने 2018 में 153981 पौधे लगाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था.महापौर व नगर आयुक्त ने किया कार्यक्रम का नेतृत्वबता दें कि, इस पूरे कार्यक्रम का नेतृत्व महापौर अशोक कुमार तिवारी व नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने किया. वहीँ, इस ऐतिहासिक पल को दर्ज करने के लिए 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' की टीम ऋषि नाथ के नेतृत्व में डोमारी में मौजूद रही. इस रिकॉर्ड को महज एक घंटे में पूरा कर लिया गया.गंगा घाटों के नाम पर होंगे 60 सेक्टरइस 'शहरी वन' की सबसे अनूठी विशेषता इसकी बनावट है. पूरे वन क्षेत्र को 60 सेक्टरों में विभाजित किया गया है. प्रत्येक सेक्टर का नाम काशी के प्रसिद्ध गंगा घाटों जैसे-दशाश्वमेध, ललिता घाट, नया घाट, केदार घाट, चौशट्टी घाट, मानमंदिर घाट और शीतला घाट के नाम पर रखा गया है. प्रत्येक सेक्टर में पांच हजार पौधे रोपे जाएंगे. यह न केवल पौधों का समूह होगा, बल्कि गंगा किनारे एक हरा-भरा 'मिनी काशी' का स्वरूप नजर आएगा.also read : होली त्योहार पर रंगों से आंखों को बचाने के लिए करें ये उपाय, जाने टिप्सस्मार्ट सिंचाई और आधुनिक तकनीकतीन लाख पौधों को जीवित रखने के लिए मियावाकी पद्धति के साथ आधुनिक सिंचाई प्रणाली का जाल बिछाया गया है. करीब 10,827 मीटर लंबी पाइपलाइन, 10 बोरवेल और 360 'रेन गन' सिस्टम लगाए गए हैं. साथ ही नदी किनारे की मिट्टी को बचाने के लिए शीशम, अर्जुन, सागौन और बांस जैसी 27 देशी प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई है. पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए वन के भीतर चार किलोमीटर लंबा पाथवे भी बनाया गया है.

होलिका दहन में 'रेढ़' का महत्व और औषधीय गुण: जानिए क्यों खास है गांवों का पारंपरिक विधि-विधान

होलिका दहन में 'रेढ़' का महत्व और औषधीय गुण: जानिए क्यों खास है गांवों का पारंपरिक विधि-विधान

वाराणसी: आधुनिकता के इस दौर में जहाँ त्योहार अब केवल सोशल मीडिया पोस्ट और औपचारिकता तक सिमटते जा रहे हैं, वहीं देश के ग्रामीण इलाकों में आज भी होली अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है.गांवों में होलिका दहन से लेकर रंग खेलने तक की परंपराएं आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती हैं.'रेढ़' से होती है शुद्ध शुरुआतवाराणसी के स्थानीय निवासी अभिषेक गुप्ता ने ग्रामीण होली की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि होलिका दहन की प्रक्रिया में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है. उन्होंने बताया, "होलिका दहन की शुरुआत सबसे पहले 'रेढ़' (एक प्राकृतिक वनस्पति) लगाने से होती है, जिसे सबसे शुद्ध माना जाता है. इसके साथ गोइठा (उपले), कपूर और देसी घी का मिश्रण अग्नि को समर्पित किया जाता है."क्या है 'रेढ़'?अभिषेक के अनुसार, रेढ़ एक औषधीय वनस्पति है जिसकी कई स्थानों पर खेती भी की जाती है. इसका उपयोग जड़ी-बूटी के रूप में होता है और होलिका दहन में इसका प्रयोग वातावरण को शुद्ध करने के लिए किया जाता है.ठंडाई और भांग: मिटते हैं आपसी मतभेदगांवों में होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि आपसी गिले-शिकवे दूर करने का जरिया है. उत्सव के दौरान पटाखे जलाए जाते हैं और घर-घर में भांग पीसकर ठंडाई तैयार की जाती है. अभिषेक कहते हैं कि मिल-बांटकर ठंडाई पीने से आपसी मतभेद कम होते हैं और भाईचारा बढ़ता है. शाम को 'होली मिलन' के दौरान ग्रामीण एक-दूसरे की समस्याओं को साझा करते हैं और यथासंभव मदद का हाथ बढ़ाते हैं.पकवानों की खुशबू और बदलता दौरहोली के खान-पान पर चर्चा करते हुए अमित सिंह ने बताया कि गांवों में आज भी पारंपरिक गुजिया, आलू के पापड़ और मूंग की पापड़ मुख्य आकर्षण होते हैं. बड़े-बुजुर्गों और युवाओं की टोली साथ मिलकर भांग की ठंडाई तैयार करती है, जो उत्सव के आनंद को दोगुना कर देती है.ALSO READ : वाराणसी: त्यौहार के सीजन में भी फूलों का बाज़ार ठंडाबढ़ती जिम्मेदारियां और लुप्त होते बैंड-बाजेहालांकि, बदलते समय के साथ कुछ परंपराएं फीकी भी पड़ रही हैं. अविनाश पटेल ने चिंता जताते हुए कहा, "पहले लोग बैंड-बाजे के साथ पूरे गांव का भ्रमण करते थे, लेकिन आज का युवा इन परंपराओं से दूर होता जा रहा है."उन्होंने इसके पीछे का कारण 'जिम्मेदारी' को बताया. शिक्षा और रोजगार के लिए बाहर गए युवा त्योहारों पर घर नहीं लौट पाते. परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य पर काम का बोझ इतना अधिक है कि वे चाहकर भी होली के उल्लास का पूरा आनंद नहीं ले पा रहे हैं.