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गोवर्धन पूजा है कल, ना करें ये गलतियां

गोवर्धन पूजा है कल, ना करें ये गलतियां
Oct 21, 2025, 12:03 PM
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Posted By Preeti Kumari

Govardhan Puja 2025: दिवाली के त्योहार में पड़ने वाला गोवर्धन पूजा हर साल की तरह इस बार भी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाएगा. इस बार यह त्योहार 22 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा. इस दिन भगवान श्री कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा का विधि-विधान होता है. गोवर्धन पूजन का यह पर्व सीधा प्रकृति से संबंधित है. ये वह पावन दिन होता है जब हर कोई गोवर्धन पर्वत की उपासना करते हुए उन्हें अपनी रक्षा के लिए धन्यवाद करते हैं. गोवर्धन पूजा में कुछ विशेष चीजों और सामग्री का इस्तेमाल भी किया जाता है, जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण होती है. जिसके काफी नियम होते हैं.


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गोवर्धन पूजा सामग्री लिस्ट


गोवर्धन पूजा के लिए गोबर, गोमूत्र या गंगाजल, दीपक और रुई की बाती, घी और तेल, फूल और माला, तुलसी दल, चावल (अक्षत), दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, नैवेद्य या प्रसाद, धूप, कपूर, अगरबत्ती, नए वस्त्र और शंख या घंटी आदि. की जरूरत होती है.


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जाने क्या है अन्नकूट सामग्री


गोवर्धन पूजा में अन्नकूट को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि इसके बिना गोवर्धन पर्वत की पूजा अधूरी मानी जाती है. अन्नकूट में 56 प्रकार के अन्न और सब्जियों से भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगाया जाता है. अन्नकूट का अर्थ होता है- अन्न का समूह. इस दिन घरों में विशेष रूप से मौसमी सब्जियां जैसे कद्दू, आलू, लौकी, बैंगन आदि पकाई जाती हैं और दाल, चावल, रोटी, रायता, चटनी, मिठाई और खीर जैसी चीजें भी बनाई जाती हैं. यह सारा भोजन घी या तेल में सात्विक ढंग से तैयार किया जाता है. फिर, पीतल के थाल में 56 तरह के व्यंजन सजाकर भगवान को अर्पित किया जाता है. हर थाली में तुलसी का पत्ता जरूर रखा जाता है क्योंकि इसे भगवान को भोग लगाने का सबसे शुद्ध प्रतीक माना गया है.


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गोवर्धन पूजा जाने कैसे की जाती


गोवर्धन पूजा के दिन गाय, गोवर्धन पर्वत और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना की जाती है. इस पूजा की सबसे खास बात तो यह है कि इसमें प्रकृति और अन्न के प्रति आभार जताया जाता है. पूजा की तैयारी के लिए सबसे पहले गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीकात्मक स्वरूप बनाया जाता है. फिर, उसे फूलों, तुलसी दल और रंगोली से सजाया जाता है. पूजा में गोमूत्र या गंगाजल से स्थान को शुद्ध किया जाता है और दीपक, कपूर, धूप या अगरबत्ती से वातावरण को पवित्र बनाया जाता है. फिर, भगवान श्रीकृष्ण को नए वस्त्र पहनाए जाते हैं. इसके बाद पंचामृत से अभिषेक किया जाता है. पूजा के समय अक्षत, फूल, तुलसी, मिठाई और नैवेद्य चढ़ाया जाता है. अंत में आरती करके गोवर्धन पर्वत के चारों ओर परिक्रमा की जाती है, जिसके बाद से भक्तों को प्रसाद बांटा जाता है.


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क्यों की जाती है गोवर्धन पूजा


गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है. जो दिवाली के अगले दिन मनाया जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूजा का उद्देश्य भगवान कृष्ण के प्रति श्रद्धा और आभार प्रकट करना होता है, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठाकर गोकुलवासियों की रक्षा की थी.

बीएचयू में 'नयी चाल की हिन्दी' विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ.
बीएचयू में 'नयी चाल की हिन्दी' विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ.
वाराणसी : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग एवं अंतर सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में मंगलवार से महामना सभागार, मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र में 'नयी चाल की हिन्दी' विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। 28 से 30 जुलाई तक चलने वाली इस संगोष्ठी में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वान हिन्दी भाषा, साहित्य, संस्कृति, आलोचना, अनुवाद, लोक परंपरा और डिजिटल युग में हिन्दी के बदलते स्वरूप पर विचार-विमर्श करेंगे।उद्घाटन सत्र में हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. राजकुमार ने स्वागत वक्तव्य एवं विषय-प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए कहा कि नामवर सिंह के बिना हिन्दी का कोई भी गंभीर अकादमिक विमर्श पूर्ण नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि उनसे सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन उन्हें दरकिनार कर हिन्दी के बौद्धिक विमर्श को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह भारतीय और पाश्चात्य दोनों ज्ञान परंपराओं के अद्वितीय अध्येता थे और एक आदर्श शिक्षक के रूप में उनकी पहचान सदैव बनी रहेगी।मुख्य वक्ता एवं आईएसीएलएलएस के पूर्व सचिव प्रो. हरीश त्रिवेदी ने कहा कि महादेवी वर्मा, अज्ञेय और नामवर सिंह जैसे विद्वानों को सुनकर हिन्दी भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता का वास्तविक आभास होता था। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की बहुभाषिक दृष्टि, ज्ञान के प्रति समर्पण और वैचारिक स्वतंत्रता उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताएं थीं।संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भाषा का स्वभाव निरंतर परिवर्तनशील होता है। आज व्हाट्सऐप, एसएमएस और ई-मेल जैसे त्वरित संचार माध्यम भाषा के सामने नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के सकारात्मक और रचनात्मक उपयोग पर बल देते हुए कहा कि तकनीक का उपयोग भाषा और ज्ञान के विकास के लिए किया जाना चाहिए। कला संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने डिजिटल युग में साहित्य की प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे।द्वितीय सत्र 'नामवर स्मरण' के रूप में आयोजित किया गया, जिसमें संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र की उक्ति 'हिन्दी नई चाल में ढली' केवल भाषाई बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय समाज और आधुनिक चेतना के व्यापक परिवर्तन का संकेत थी। उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम, आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना-दृष्टि और भक्ति परंपरा की मानवीय संवेदनाओं पर विस्तार से चर्चा की।प्रो. मनोज कुमार सिंह ने नामवर सिंह के व्यक्तित्व और उनकी आलोचना दृष्टि को याद करते हुए बनारस से उनके गहरे आत्मीय संबंधों का उल्लेख किया। आईआरएस अधिकारी शैलेश कुमार ने नामवर सिंह से जुड़े संस्मरण साझा किए, जबकि वरिष्ठ कथाकार एवं 'तद्भव' के संपादक अखिलेश ने प्रेमचंद की कहानी ईदगाह पर नामवर सिंह की आलोचनात्मक दृष्टि का उल्लेख करते हुए उनके प्रसिद्ध कथन "सौन्दर्य वही है, जो हमारे अस्तित्व की रक्षा कर सके" को रेखांकित किया।तृतीय अकादमिक सत्र में आरंभिक आधुनिक हिन्दी साहित्य, हिंदवी प्रेमाख्यान, भारतीय भक्ति आंदोलन और सांस्कृतिक इतिहास पर गंभीर विमर्श हुआ। टेक्सॉस विश्वविद्यालय की गुंजन मल्होत्रा, कुमार नीरज, प्रो. माधव हाड़ा और प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने शोधपरक व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा और भक्ति आंदोलन के विविध आयामों पर प्रकाश डाला।चतुर्थ सत्र में 'विश्वविद्यालय की अवधारणा' विषय पर चर्चा हुई। इसमें डी. वेंकट राव, संजय कुमार तथा स्वाति गांगुली ने भारतीय शिक्षा दर्शन, नालंदा से लेकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तक की ज्ञान परंपरा और वैकल्पिक विश्वविद्यालय अवधारणा पर अपने विचार प्रस्तुत किए।ALSO READ : काशी विद्यापीठ के कुलानुशासक प्रो. के.के. सिंह को मिला 'विशिष्ट शिक्षक सम्मान...संगोष्ठी के दौरान नामवर सिंह के शिष्य शैलेश कुमार की पुस्तक 'चंद तस्वीर-ए-बुताँ' (नामवर जी का जीवन—तस्वीरों के आईने में) का विमोचन भी किया गया। साथ ही पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। तीन दिनों तक चलने वाली इस संगोष्ठी में हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े समकालीन मुद्दों पर देश-विदेश के विद्वानों के बीच शोधपरक चर्चा जारी रहेगी.
काशी विद्यापीठ के कुलानुशासक प्रो. के.के. सिंह को मिला 'विशिष्ट शिक्षक सम्मान...
काशी विद्यापीठ के कुलानुशासक प्रो. के.के. सिंह को मिला 'विशिष्ट शिक्षक सम्मान...
वाराणसी : महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के 48वें दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय के कुलानुशासक एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ के निदेशक प्रो. के.के. सिंह को उनके उत्कृष्ट शैक्षणिक, शोध एवं प्रशासनिक योगदान के लिए 'विशिष्ट शिक्षक सम्मान' से सम्मानित किया गया। मंगलवार को रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर, सिगरा में आयोजित भव्य दीक्षांत समारोह में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय की कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया।प्रो. के.के. सिंह लंबे समय से महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में शिक्षा, शोध और प्रशासन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय में कुलानुशासक के साथ-साथ पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ के निदेशक के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। इसके अतिरिक्त वे गृहपति, छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष तथा आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी) के सदस्य सहित कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्वों का भी प्रभावी ढंग से निर्वहन कर चुके हैं।ALSO READ : श्रीकाशी विश्‍वनाथ धाम में लगे एयर प्‍यूरीफायर श्‍मशान का धुआं बन रही शुद्ध हवा...शैक्षणिक क्षेत्र में भी प्रो. सिंह का योगदान उल्लेखनीय रहा है। उनकी अब तक आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि 30 से अधिक शोध पत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उनके शोध कार्यों और अकादमिक योगदान को व्यापक स्तर पर सराहना मिली है।दीक्षांत समारोह में मिले इस सम्मान पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों, अधिकारियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने प्रो. के.के. सिंह को बधाई देते हुए इसे पूरे विश्वविद्यालय परिवार के लिए गौरव का विषय बताया। समारोह में प्रदेश सरकार के मंत्रीगण, विश्वविद्यालय के अधिकारी, शिक्षक, छात्र-छात्राएं तथा बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे.
श्रीकाशी विश्‍वनाथ धाम में लगे एयर प्‍यूरीफायर  श्‍मशान का धुआं बन रही शुद्ध हवा...
श्रीकाशी विश्‍वनाथ धाम में लगे एयर प्‍यूरीफायर श्‍मशान का धुआं बन रही शुद्ध हवा...
वाराणसी : सावन में श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर धाम में प्रदूषण का शुद्धीकरण हो रहा है. इसके तहत अब श्रद्धालुओं को शुद्ध हवा मिलने की कवायद की गई है. इसके लिए स्टेनलेस स्टील से निर्मित 20 से ज्यादा एयर प्यूरीफायर लगाए गए हैं. ये मशीनें मणिकर्णिका घाट की चिताओं से उठने वाले धुएं को भी साफ हवा में बदलती हैं. ये एयर प्यूरीफायर हर घंटे 3 लाख घनमीटर हवा को शुद्ध कर रहे हैं. मणिकर्णिका के पास में ही गंगा द्वार के पास बने रैंप भवन में इस अत्याधुनिक स्वदेशी वायु शुद्धिकरण सिस्टम को लगाया गया है.यह स्वदेशी तकनीक वातावरण में मौजूद कई प्रकार के प्रदूषकों को अपनी ओर खींचकर उन्हें हवा से समाप्त करती है. यह 100 नैनोमीटर से 50 माइक्रोन आकार तक के सूक्ष्म कणों, जैसे नैनो ब्लैक कार्बन, परागकण (पोलन), जैविक कणों को हटाने में सक्षम है. यह बजड़ों से निकलते वाले धुएं के सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों को भी निष्क्रिय करते हैं. साथ ही हवा में मौजूद वायरस और बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीवों को भी मारता है. मंदिर में कुल 58 एयर प्यूरीफायर स्थापित किए जाने हैं.ALSO READ : वाराणसी में लेनदेन के विवाद ने लिया हिंसक रूप कार से कुचलने का प्रयास...शुद्ध पेयजल, बराबर होती है जांच सावन से पहले मंदिर एसडीएम शंभू शरण ने यूनिट का निरीक्षण कर व्यवस्था की समीक्षा की और कर्मचारियों को निर्देश भी दिए. वहीं, पूरी व्यवस्था को परखकर गुणवत्ता की जांच भी की. भक्तों को हवा के साथ शुद्ध पानी भी मिलेगा. हर सप्ताह मंदिर में लगे वाटर कूलर के पानी की गुणवत्ता जांची जा रही है. रीजनल वाटर एनालिसिस लेबोरेटरी में इसका सैंपल भेजा जा रहा है और इसकी रिपोर्ट वाटर कूलर पर ही चिपका दिया जा रहा है. इसमें भक्तों को पानी के पीएच, टीडीएस, टर्बिडिटी, हार्डनेस, क्लोराइड, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आयरन समेत कई मानकों का परीक्षण किया जा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार सभी प्रमुख पैरामीटर निर्धारित मानकों के अनुरूप मिले हैं. मंदिर प्रशासन के अनुसार, बाबा विश्वनाथ के दर्शन के दौरान भक्तों को सुरक्षित पानी ही मिलेगा.