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दिवाली के अगले दिन क्यों होती है पतंगबाजी की परंपरा, जाने कारण

दिवाली के अगले दिन क्यों होती है पतंगबाजी की परंपरा, जाने कारण
Oct 21, 2025, 07:56 AM
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Posted By Preeti Kumari

Jamghat 2025: देशभर में दीवाली के पांच दिवसीय त्योहार की धूम मची हुई है. जहां लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन या अन्नकूट, भाई दूज जैसे पर्व को मनाया जाता है. दिवाली के अगले दिन जमघट की रौनक नजर आती है. अनेक हिस्सों में आसमान में रंग-बिरंगी पतंगे छाई हुई दिखाई देती हैं. पतंगबाजी का पर्व कई त्योहारों और जनजीवन का हिस्सा भी है. आसमान की ऊंचाईयों को छूने वाले पतंगों का पर्व जमघट होता है, इसकी प्रथा बड़ी ही अद्भुत है. वर्षों पुरानी पतंगबाजी की ये रौनक आज भी देखने को मिलती है.


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हालांकि, पहले की तुलना में आज के समय में लोग इतने व्यस्त हो चुके है कि उन्हें पतंगों के शौकीन होने के बाद भी वो अपने काम-काज के चलते उनके पास पतंगबाजी के उत्सव नहीं मना पाते हैं, जिसके चलते आज के दौर में पतंगों का उड़ाना पहले से काफी कम हो गया है. पतंग को लेकर हर किसी के मन में कई सवाल उठता है कि आखिरकार ये पतंगबाजी की प्रथा कहा से शुरू हुई और इसे क्यों उड़ाया जाता है.


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एक रिपोर्ट्स के मुताबिक, पतंग का आरम्भ प्राचीन चीन में हुआ. चीनी स्रोतों में पतंगों का उपयोग लगभग सैकड़ों साल पहले दर्ज हुआ है. बता दें कि पहले पतंग लकड़ी, बांस और रेशम, कागज़ से बनाई जाती थी और सैन्य व वैज्ञानिक प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाई गई. लेकिन, समय के साथ ही पतंगों का रूप और उपयोग मनोरंजन और धार्मिक उद्देश्यों के लिए विकसित हो सका है, जो इस वर्तमान स्थिति में यह एक पॉपुलर खेल के रूप में हमारे सामने है.


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भारत में ऐसे हुई पतंगों की एंट्री


पतंगों की उत्पत्ति चीन से हुई, जिसके बाद से भारत समेत एशिया के अन्य देशों में भी पतंगे बनने लगी. इतिहासकारों और लोक-लेखों के अनुसार, बौद्ध भिक्षुओं, व्यापारी-पथिकों और बाद में पतंग संबंधी तकनीकें भारत में पहुंची. ऐसा भी दावा किया जाता है कि, भारत में पहले से ही पतंगों का खेल काफी प्रचलित बना और बाद के शासक, विशेषकर मुगल दरबार और स्थानीय नवाबों के दौरान, पतंगबाजी शाही शौक और सामाजिक मनोरंजन का हिस्सा बनी. भारत में पतंग उड़ाने की परंपरा का सबसे प्रसिद्ध और व्यवस्थित रूप मकर संक्रान्ति यानी उत्तरायण के समय दिखाई देता है. गुजरात, राजस्थान, पंजाब और अन्य राज्यों में इस दिन व्यापक रूप से पतंगबाजी होती है.


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अहमदाबाद का अंतरराष्ट्रीय पतंग उत्सव इस परंपरा का सबसे मुख्य उदाहरण है. इसका ऐतिहासिक-धार्मिक अर्थ सूरज के उत्तरायण होते समय का प्रतीक और सामुदायिक उत्सव है. कुछ लोगों का मानना है कि पतंगबाजी का खेल सिर्फ मकर संक्रान्ति तक ही सीमित है. लेकिन ऐसा जरा भी नहीं है. क्योंकि कई क्षेत्रों में पतंग उड़ाने का अपनी एक अद्भुत परंपरा है. जैसे कि, बसंत पंचमी, पोंगल (दक्षिण), स्वतंत्रता दिवस इत्यादि मौकों पर भी पतंग उड़ाया जाता हैं.


दिवाली के अगले दिन पतंगबाजी क्यों


दिवाली के दूसरे दिन 'जमघट' लखनऊ की एक खास परंपरा है, जो असल में पतंग उड़ाने और लोगों के एक साथ मिलकर मनाने का एक उत्सव है. यह गोवर्धन पूजा के दिन मनाया जाता है और इसकी शुरुआत लगभग 300 साल पहले नवाबों के दौर में हुई थी. यह एक सामाजिक परंपरा है जिसमें सभी उम्र और धर्मों के लोग इकट्ठा होते हैं. बता दें, 'जमघट' की ये खास परंपरा जो 'नवाबी काल' से चली आ रही पतंगबाजी का एक उत्सव है. इस दिन, सभी धर्मों के लोग एक साथ मिलकर अपनी-अपनी छतों पर पतंग उड़ाते हैं, प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं, और आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाते हैं, जिसे "पेंच लड़ाना" कहते हैं.


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जल-रहित मौसम और उपयुक्त हवा


कई क्षेत्रों में दिवाली के आसपास मौसम ठंडा पर शुष्क रहता है और दिन के समय स्थितियां छतों से पतंग उड़ाने के लिए अनुकूल होती हैं. इससे सामूहिक पतंगबाजी संभव होती है.


शौक और प्रतियोगिता


पतंगबाज़ी में प्रतिस्पर्धात्मक भावना है. इस पतंगबाजी के दौरान फोकस रहता है तो सिर्फ इस बात की कि, किसकी डोर बची और किसकी कटी. इस उत्सव के मौकों पर यह प्रतिस्पर्धा स्थानीय रूप से बढ़ जाती है जिससे जमघट बनते हैं.


ऐतिहासिक और स्थानीय परंपरा


कुछ शहरों में यह परंपरा सदियों पुरानी हो सकती है. स्थानीय मेलों, नवाबी तहजीब, परिवारों के रिवाज़ों से जुड़ी हुई है. यही कारण हैं कि दीवाली के बाद पतंगबाजी की प्रथा गुजरात के उत्तरायण जैसी बड़े पैमाने की पतंग परंपरा जितनी व्यापक नहीं बन पाती, पर कई नगरों और मोहल्लों में दैनिक स्थानीय स्तर पर दिखाई देती है.


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सुरक्षा के साथ आधुनिक चुनौतियां


पतंगबाजी के साथ सुरक्षा और पर्यावरणीय चिंताएं भी जुड़ी हैं. मांझे को लेकर अक्सर ये दिक्कत देखने को मिलती है कि पतंगों का ये मांझा लोगों, पक्षियों और वाहनों के लिए खतरनाक साबित होता है. जिसे देखते हुए जागरूकता अभियानों की आवश्यकता रही है. आधुनिक केमिकल-आधारित सामग्रियों और प्लास्टिक पतंगों से पर्यावरणीय प्रभाव बढ़े हैं. इसी कारण सामुदायिक आयोजन और उत्सवों में सुरक्षा-नियम, ‘ग्रीन’ विकल्प और जिम्मेदार व्यवहार पर ज़ोर बढ़ा है.

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वाराणसी : राजस्व आसूचना निदेशालय (डीआरआई) ने वाराणसी के लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर 491.290 ग्राम विदेशी मूल का सोना जब्त किया है. यह कार्रवाई 26 जुलाई 2026 को की गई, जब अधिकारियों को जानकारी मिली कि एक भारतीय यात्री शारजाह से तस्करी कर सोना भारत ला रहा है.डीआरआई के अधिकारियों ने सुनियोजित अभियान के तहत उस भारतीय नागरिक को रोका, जो शारजाह से वाराणसी पहुंचा था. यात्री की तलाशी और विमान की गहन जांच के दौरान, उसकी सीट के नीचे से पेस्ट/कम्पाउंड के रूप में छिपाकर रखा गया सोना बरामद किया गया. इस निकासी के दौरान कुल 491.290 ग्राम (शुद्ध) 24 कैरेट विदेशी मूल का सोना जब्त किया गया, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग ₹70 लाख है. इसके बाद, उक्त यात्री को सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के प्रावधानों के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया.डीआरआई ने इस मामले में सिंडिकेट से जुड़े अन्य सदस्यों की पहचान और उनकी संलिप्तता का पता लगाने के लिए आगे की जांच जारी रखी है. इससे पहले, 23 जुलाई 2026 को, डीआरआई ने कूच बिहार से नई दिल्ली जा रही एक महिला यात्री को गिरफ्तार किया था, जो बांग्लादेश से तस्करी कर विदेशी मूल का सोना ले जा रही थी. इस कार्रवाई में लगभग 4.98 किलोग्राम विदेशी मूल का सोना बरामद किया गया, जिसकी अनुमानित कीमत ₹7.11 करोड़ थी.ALSO READ:मंडुआडीह में किराए के विवाद को लेकर निकली तलवार, हमले का लगा आरोप...डी.आर.आई द्वारा जनवरी 2026 से अब तक उत्तर प्रदेश में आठ विभिन्न मामलों में लगभग 13.267 किलोग्राम तस्करी का विदेशी मूल का सोना जब्त किया गया है, जिसकी अनुमानित कीमत 19 करोड़ है. इन मामलों में नौ व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया है. डीआरआई की यह कार्रवाई तस्करी के खिलाफ उनकी सख्त नीति को दर्शाती है और यह संकेत देती है कि वे इस प्रकार के अपराधों को रोकने के लिए गंभीर हैं. अधिकारियों का कहना है कि वे तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने के लिए लगातार प्रयासरत हैं और इस दिशा में सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं.
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