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अनूठी परंपरा: देवी को प्रसन्न करने के लिए यहां भक्त बहाते हैं खून

अनूठी परंपरा:  देवी को प्रसन्न करने के लिए यहां भक्त बहाते हैं खून
Sep 03, 2025, 07:52 AM
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Posted By Monisha Rai

क्या आप किसी ऐसे मंदिर के बारे में जानते हैं जहां की अधिष्ठाात्री देवी को उनके भक्त अपना रक्त समर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. मेरे ख्याल में नहीं. तो चलिए हम आपको बताते हैं. यह मंदिर देवभूमी उत्तरराखंड के चंपावत जिले में है, जिसे देवीधुरा मंदिर के रूप में जाना जाता है. इस मंदिर को तंत्र साधना के एक प्रमुख केन्द्र की मान्याता है. देवी वाराही इस मंदिर की अधिष्ठात्री हैं. विविधताओं के देश भारत में प्रचलित मान्यता और परंपरा का यहां एक अनूठा दृश्या देखने को मिलता है.


देवीधुरा मंदिर


पत्थरमार युद्ध के लिए है प्रसिद्ध

हर साल रक्षाबंधन के पर्व पर यहां हजारों की भीड़‍ जुटती है. इस अवसर को बग्वाल मेला या पत्थरमार युद्ध के लिए जाना जाता है. मंदिर के सामने एक बड़ा सा खाली मैदान है. यहीं पर बग्वारल की परंपरा निभायी जाती है. मैदान के चारो कोनों पर मां के भक्त एकत्र होते हैं. फिर एक दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं. जिस जिस भक्त को पत्थर से चोट लगती है वह खुद को बहुत सौभाग्यशाली समझता है. देवी को प्रसन्नत करने के लिए एक व्यक्ति में पाये जाने वाले लगभग साढ़े छह लीटर अपना खून भक्ते बहाते हैं. तकरीबन 15 से 20 मिनट तक भक्त एक दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं. भक्तोंं में हाथों में बेंत या बांस से बनी बड़ी बड़ी छतरियां होती हैं जिससे वो बचने का प्रयास करते है. मंदिर के मुख्य पुजारी के आदेश से ही पत्थरमार युद्ध शुरू होता है और उनके ही आदेश पर बंद भी हो जाता है. चूंकि युद्ध में बड़ी संख्याड में भक्त घायल होते हैं इसलिए परंपरा के निर्वाह के लिए पत्थ रों की जगह फूल और फल फेंके जाने की अपील की जाती है लेकिन भक्ति , श्रद्धा और परंपरा के इस आयोजन में ये अपील बेअसर सी दिखायी देती है.


देवीधुरा मंदिर, उत्तराखण्ड



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सैकड़ों सालों पुरानी है परंपरा


पत्थ़रमार युद्ध की यह परंपरा कब शुरू हुई इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं है लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सैकड़ों सालों से चली आ रही है. स्थापनीय निवासी दिलिप बिष्टा बताते हैं कि उन्हों ने जब से होश संभाला है तब से इस आयोजन को देखते आ रहे हैं. उनके पूर्वज भी मंदिर के इस परंपरा के बारे में बताते रहे हैं. लेकिन इसके शुरूआत का कोई लिखित दस्ताजवेज उपलब्धक नहीं है. हां लोक में यह मान्येता है कि पहले यहां नरबली की परंपरा थी. इस स्थाभन के एक परिवार से किसी एक व्येक्ति का चयन नरबली के लिया किया जाता था. और यह क्रम से तय होता था. एक बार एक वृद्ध महिला जिसका सहारा उसका एक मात्र पोता था. उसका चयन नरबली के लिए किया गया. महिला जाकर देवी के मंदिर में खूब रोई और मां से उसके पोते की बलि न लेने की प्रार्थना की. मां ने प्रकेट होकर महिला को आशीर्वाद दिया उसके पौत्र की बलि नहीं हुई. तब से नरबली की यह परंपरा पत्थरमार युद्ध में बदल गयी और आज तक उस परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है.


मां के शिलारूप के होते हैं दर्शन


मां वाराही देवी के दशर्न के लिए विशालकाय गोलाकार शिला खण्डों से बनी गुफा में जाना पड़ता है.। इस गुफा के भीतर अनेक मंदिर हैं जिनमें देवी देवताओं और उनके वाहनों के चित्र उकेरे गए हैं। इसी गुफा में मां वाराही देवी भी स्थापित हैं. जिन्हें पिण्ड या शिलारूप में पूजा जाता है. देवी के स्वरूप को कपड़े से ढक कर रखा जाता है. माना जाता है कि देवी पिंड को साक्षात देखने पर उनके तेज से आंखों की रोशनी चली जाती है. अपने अज्ञातवास के दौरान पांडवों के भी यहां आने की मान्य ता है.

मनोकामना पूर्ण होने पर बांधते हैं घंटी

मंदिर के प्रवेश द्वार के खंभों पर हजारों की संख्या में घंटियां बंधी हैं. जो मां के भक्ती अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर बांध देते हैं. लोहाघाट से देवीधुरा मंदिर की दूरी तकरीबन 45 किमी है. जहां प्राइेवट वाहन और टैक्सी के जरिये आसानी से पहुंचा जा सकता है्. नैनीताल टनकपुर से भी यहां के लिए आसानी से वाहन उपलब्ध है.


देवी वाराही, देवीधुरा मंदिर,उत्तराखण्ड

घर के गमले में भी उगा सकते है ड्रैगन फ्रूट, जाने तरीका
घर के गमले में भी उगा सकते है ड्रैगन फ्रूट, जाने तरीका
Dragon Gardening Tips : सर्द भरे मौसम में ड्रैगन फ्रूट एक सुपरफूड माना जाता है. क्योंकि यह फल सिर्फ स्वाद में बेहतरीन नहीं होता, बल्कि पोषक तत्वों से भी भरपूर होता है. कुछ लोगों का मानना है कि, ड्रैगन फ्रूट सिर्फ बड़े खेतों या गर्म इलाकों में ही उगाया जा सकता है, लेकिन सही देखभाल और कुछ खास उपायों से इसे सर्दियों में आप अपने घर के गमले में भी आसानी से उगा सकते है. अगर आप गार्डनिंग के शौकीन हैं और अपने घर की बालकनी या छत पर कुछ नया उगाना चाहते हैं, तो ये उपाय आपके लिए बेहद खास हैं.कैक्टस परिवार का पौधा है ड्रैगन फ्रूट बता दें, ड्रैगन फ्रूट कैक्टस परिवार का पौधा है, इसलिए इसके लिए बड़े और मजबूत गमले की जरूरत होती है. कम से कम 12–15 इंच का गमला लें, जिसमें नीचे पानी निकासी के लिए छेद हों. मिट्टी के लिए सामान्य मिट्टी में रेत और वर्मी कंपोस्ट मिलाकर हल्की और अच्छी ड्रेनेज वाली मिट्टी तैयार करें. ड्रैगन फ्रूट को बीज के बजाय कटिंग से उगाना ज्यादा आसान और सफल होता है. 10–12 इंच लंबी हेल्दी कटिंग लें और उसे 2–3 दिन छांव में सुखा लें. इसके बाद कटिंग को गमले की मिट्टी में 2–3 इंच गहराई तक लगाएं और हल्का पानी दें.ड्रैगन फ्रूट उगाने का जाने तरीकाअक्सर सर्दियों में ड्रैगन फ्रूट के पौधे को रोजाना 5–6 घंटे धूप मिलना बहुत जरूरी होता है. गमले को ऐसी जगह रखें जहां सुबह की धूप अच्छी मिले. बहुत ज्यादा ठंडी हवा या पाला पड़ने से पौधे को बचाएं, नहीं तो पौधा बेजान सा हो जाता है, जरूरत हो तो रात में गमले को सुरक्षित जगह पर रख दें. ड्रैगन फ्रूट को ज्यादा पानी पसंद नहीं होता.सर्दियों में हफ्ते में सिर्फ 1–2 बार पानी देना पर्याप्त होता है. ध्यान रखें कि मिट्टी पूरी तरह सूखने के बाद ही पानी दें, वरना जड़ें सड़ सकती हैं. हर 20–25 दिन में थोड़ी सी गोबर खाद या वर्मी कंपोस्ट डालें. साथ ही ड्रैगन फ्रूट बेल की तरह बढ़ता है, इसलिए गमले में लकड़ी या सीमेंट का सहारा जरूर लगाएं, ताकि पौधा अच्छे से ऊपर की ओर बढ़ सकेगा.
एक्ट्रेस मृणाल ठाकुर बनने जा रही दुल्हन, खास होगा वेलेंटाइन डे
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बिहार की सियासत के बीच तेजस्वी की बैठक, इन मुद्दों पर हुई चर्चा
बिहार की सियासत के बीच तेजस्वी की बैठक, इन मुद्दों पर हुई चर्चा
बिहार की राजनीति में कुछ दिनों से तहलका मचा हुआ है. ऐसे में आज शुक्रवार का दिन बिहार की सियासत के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा है. जी हां, एक तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी 'समृद्धि यात्रा' पर निकल पड़े है, तो दूसरी ओर राजद के लाल नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी अपने सरकारी आवास पर राजद की कोर कमेटी की एक अहम बैठक बुलाई है. इस मीटिंग के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं. यह बैठक ऐसे समय में आयोजित की गई जब खरमास खत्म हो गया है.ऐसे में तो इस खरमास के बाद से बिहार में आगे क्या कुछ खेला होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन तेजस्वी यादव फिर से सियासी मैदान में उतर चुके हैं. तेजस्वी के इस बैठक में चुनाव के नतीजों की समीक्षा की गई. साथ ही नए साल में आरजेडी की आगे की रणनीति क्या होगी इसको लेकर भी चर्चा की गई."समीक्षा का दिखावा से ज्यादा जरूरी 'खुद' आत्म-मंथन"हालांकि, इस बीच राजद और लालू परिवार से अलग हो चुकीं रोहिणी ने भी बिना नाम लिए भाई पर कुछ दिनों पहले निशाना साधा था, जिसने राजनीतिक गलियारों में शोर मचाकर रख दिया. ऐसे में तेजस्वी के इस मीटिंग को भी रोहिणी आचार्य ने 'दिखावा' करार दिया है. रोहिणी ने सोशल मीडिया के एक्स प्लेटफॉर्म पर लिखा- "समीक्षा का दिखावा करने से ज्यादा जरूरी 'खुद' आत्म-मंथन ' करने और जिम्मेदारी लेने की जरूरत है, 'अपने' इर्द-गिर्द कब्जा जमाए बैठे चिह्नित 'गिद्धों' को ठिकाने लगाने का साहस दिखाने के बाद ही किसी भी प्रकार की समीक्षा की सार्थकता साबित होगी, ये जो पब्लिक है न, वो सब जानती और समझती है.राहिणी के पोस्ट ने फिर किया सियासी पारा हाई दरअसल, बीते 10 जनवरी को भी लालू की बेटी रोहिणी आचार्य ने अपने सोशल मीडिया के एक पोस्ट के जरिए सियासी पारा हाई कर दिया था. क्योंकि, रोहिणी ने अपने पोस्ट में ये लिखा था कि, बड़ी शिद्दत से बनाई और खड़ी की गई "बड़ी विरासत" को तहस-नहस करने के लिए परायों की जरूरत नहीं होती, "अपने" और अपनों के चंद षड्यंत्रकारी "नए बने अपने" ही काफी होते हैं.हैरानी तो तब होती है , जब "जिसकी" वजह से पहचान होती है , जिसकी वजह से वजूद होता है , उस पहचान, उस वजूद के निशान को बहकावे में आ कर मिटाने और हटाने पर "अपने" ही आमादा हो जाते हैं... जब विवेक पर पर्दा पड़ जाता है, अहंकार सिर पर चढ़ जाता है.. तब "विनाशक" ही आंख-नाक और कान बन बुद्धि-विवेक हर लेता है. इसी पोस्ट को लेकर विपक्षियों ने लालू परिवार पर जमकर निशाना भी साधा था.